श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७७ कल्पना बुद्धको मान्य न थी।* इन सुत्तोंके अंतमें कहा है, कि आत्मा और ब्रह्म एक है या दो, फिर ऐसेही भेद बतलाते हुए आत्माकी भिन्न भिन्न ६२ प्रकारकी कल्पनाएं बतलाकर कहा है, कि ये सभी मिथ्या 'दृष्टि' हैं; और मिलिंदप्रश्नमेंभी (मि. प्र २. ३, ६, २. ७. १५) बौद्ध धर्मके अनुयायी नागसेनने यूनानी मिलिंदसे (मिनांदर) साफ़ साफ़ कह दिया है, कि "आत्मा तो कोई यथार्थ वस्तु नहीं है।" यदि मान लें, कि आत्मा और उसी प्रकार ब्रह्मभी, दोनों भ्रमही हैं, यथार्थ नहीं हैं, तो वस्तुतः धर्मकी नींवही गिर जाती है। क्योंकि, फिर सभी अनित्य वस्तुएंही बच रहती हैं; और नित्य-सुख या उसका अनुभव करनेवाला कोईभी नहीं रह जाता। यही कारण है, जो श्रीशंकराचार्यने तर्कदृष्टिसेभी इस मतको अग्राह्य निश्चित किया है; परंतु अभी हमें केवल यही देखना है, कि असली बुद्ध धर्म क्या है ? इसलिये इस वादको यहीं छोड़कर देखेंगे, कि बुद्धने आगे अपने धर्मकी क्या उपपत्ति बतलाई है। यद्यपि बुद्धको आत्माका अस्तित्व मान्य न था; तथापि इन बातोंसे वे पूर्णतया सहमत थे, कि (१) कर्मविपाकके कारण नाम-रूपात्मक देहको (आत्माको नहीं) नाशवान् जगत्के प्रपंचमें बार बार जन्म लेना पड़ता है; और (२) पुनर्जन्मका यह चक्कर या मार्ग संसारीही दुःखमय है, इससे छुटकारा पा कर स्थिर शांति या सुखको प्राप्त कर लेना अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार इन दो बातों-अर्थात् सांसारिक दुःखके अस्तित्व और उसके निवारण करनेकी आवश्यकताको मान लेनेसे वैदिक धर्मका यह प्रश्न फिरभी ज्यों-का-त्यों बनाही रहता है, कि दुःखनिवारण करके अत्यंत सुख प्राप्तकर लेनेका मार्ग कौन-सा है? और उसका कुछ-न-कुछ ठीक ठीक उत्तर देना आवश्यक हो जाता है। उपनिषत्कारोंने कहा है, कि यज्ञयाग आदि कर्मोंके द्वारा संसारचक्रसे छुटकारा हो नहीं सकता; और बुद्धने इससेभी कहीं आगे बढ़कर इन सब कर्मोंका हिंसात्मक अतएव सर्वथा त्याज्य और निषिद्ध बतलाया है। इसी प्रकार यदि स्वयं 'ब्रह्म' हीको एक बड़ा भारी भ्रम मानें, तो दुःख- निवारणार्थ जो ब्रह्मज्ञान-मार्ग है, वहभी भ्रांतिकारक या असंभव निर्णीत होता है। फिर दुःखमय भवचक्रसे छूटनेका मार्ग कौन-सा है? बुद्धने इसका यह उत्तर दिया है, कि किसी रोगको दूर करनेके लिये उस रोगका मूल कारण ढूंढ कर उसीको हटानेका प्रयत्न जिस प्रकार चतुर वैद्य किया करता है, उसी प्रकार सांसारिक दुःखके रोगको दूर करनेके लिये (३) उसके कारणको जानकर, (४) उसी कारणको दूर करनेवाले मार्गका अवलंब बुद्धिमान् पुरुषको करना चाहिये। इन कारणोंका विचार करनेसे दीख पड़ता है, कि तृष्णा या कामनाही इस जगत्के सब दुःखोंकी जड़ है; और एक नामरूपात्मक शरीरका नाश हो जानेपर बचे हुए इस वासनात्मक
* ब्रह्मजालसुत्तका अंग्रेजीमें अनुवाद नहीं है; परंतु उसका संक्षिप्त विवेचन ऱ्हिस्डेव्हिड्सने S. B. E. Vol. XXVI. Intro. pp. xxiii-xxv में किया है।