श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहलेकी कुछ बातें स्थिर रह जाती हैं; और कुछ बदल जाती हैं। अतएव इस न्यायके अनुसार अब इस बातका विचार करना चाहिये, कि बौद्ध धर्ममें वैदिक धर्मकी किन किन बातोंको स्थिर रख लिया है; और किनको छोड़ दिया है। यह विचार गार्हस्थ्य धर्म और संन्यास इन दोनोंकी पृथक् पृथक् दृष्टियोंसे, करना चाहिये। परंतु बौद्ध धर्म मूलमें संन्यास-मार्गीय अथवा केवल निवृत्ति-प्रधान है, इसलिये पहले दोनोंके संन्यास-धर्मका विचार करके अनंतर दोनोंके गार्हस्थ्य धर्मके तारतम्यपर विचार किया जायगा। वैदिक संन्यास-धर्मपर दृष्टि डालनेसे दीख पड़ता है, कि कर्ममय सृष्टिके सब व्यवहार तृष्णामूलक अतएव दुःखमय हैं; उसमें अर्थात् जन्म-मरणके भवचक्रसे आत्माका सर्वथा छुटकारा होनेके लिये मन निष्काम और विरक्त करना चाहिये तथा उसको दृश्यसृष्टिके मूलमें रहनेवाले आत्मस्वरूपी नित्य परब्रह्ममें स्थिर करके सांसारिक कर्मोंका सर्वथा त्याग करना उचित है, इस आत्मनिष्ठ स्थितिहीमें सदा निमग्न रहना संन्यास-धर्मका मुख्य तत्त्व है। दृश्य-सृष्टि नामरूपात्मक तथा नाशवान् है; और कर्मविपाकके कारणही उसका अखंडित व्यापार जारी है। कम्मना वत्तती लोको कम्मना वत्तती पजा ( प्रजा ) । कम्मनिबंधना सत्ता ( सत्त्वानि ) रथस्साऽणीव यायतो ॥ “कर्महीसे लोग और प्रजाभी जारी हैं। जिस प्रकार चलती हुई गाड़ी रथकी कीलसे नियंत्रित रहती है, उसी प्रकार प्राणिमात्र कर्मसे बंधा हुआ है” ( सुत्तनि. वासेठसुत्त ६१ )। वैदिक धर्मके ज्ञानकांडका उक्त तत्त्व, अथवा जन्म-मरणका चक्कर, या ब्रह्मा, इंद्र, महेश्वर, यम आदि अनेक देवता और उनके भिन्न भिन्न स्वर्ग-पाताल आदि लोकोंका ब्राह्मण-धर्ममें वर्णित अस्तित्वभी बुद्धको मान्य था; और इसी कारण नामरूप, कर्मविपाक, अविद्या, उपादान और प्रकृति वगैरह वेदान्त या सांख्य- शास्त्रके शब्द तथा ब्रह्मादि वैदिक देवताओंकी कथाएँभी ( बुद्धकी श्रेष्ठताको स्थिर रखकर ) कुछ हेरफेरसे बौद्ध ग्रंथोंमें पाई जाती हैं। यद्यपि बुद्धको वैदिक धर्मके कर्म सृष्टिविषयक ये सिद्धान्त मान्य थे, कि दृश्य सृष्टि नाशवान् और अनित्य है; एवं उसके व्यवहार कर्मविपाकके कारण जारी हैं; तथापि वैदिक धर्म अर्थात् उपनिषत्कारोंका यह सिद्धान्त उन्हें मान्य न था, कि नामरूपात्मक नाशवान् सृष्टिके मूलमें नामरूपसे व्यतिरिक्त आत्मस्वरूपी परब्रह्मके समान एक नित्य और सर्वव्यापक वस्तु है - इन दोनों धर्मोंमें जो विशेष भिन्नता है, वह यही है। गौतम- बुद्धने यह बात स्पष्ट रूपसे कह दी है, कि आत्मा या ब्रह्म यथार्थमें कुछ नहीं है - केवल भ्रम है, इसलिये आत्म-अनात्मके विचारमें या ब्रह्म-चिंतनके पचड़ेमें पड़कर किसीकोभी अपना समय न खोना चाहिये ( मघ्घामवमुत्त ९-१३ )। दीघनि- कायके ब्रह्मजालसुत्तोमेंभी यही बात स्पष्ट होती है, कि आत्माविषयक कोईभी