श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७३ लेकर किसी कारणसे विभक्त हो गया है; अर्थात् वह कोई पराया नहीं है, किंतु उसके पहले यहाँपर जो ब्राह्मण-धर्म था, उसीकी यही उपजी हुई यह एक शाखा है। लंकाके महावंस या दीपवंस आदि प्राचीन पाली भाषाके ग्रंथोंमें बुद्धके पश्चा- द्वर्ती राजाओं तथा बौद्ध आचार्योंकी परंपराका जो वर्णन है, उसका हिसाब लगा कर देखनेसे ज्ञात होता है, कि गौतमबुद्धने अस्सी वर्षकी आयु पाकर ईसवी सनसे ५४३ वर्ष पहले अपना शरीर छोड़ा। परंतु इसमें कुछ बातें असंबद्ध हैं। इसलिये प्रोफेसर मेक्समूलरने इस गणनापर सूक्ष्म विचार करके बुद्धका यथार्थ निर्वाण- काल इसवी सनसे ४७३ वर्ष पहले बतलाया है; और डॉक्टर बुल्हरभी अशोकके शिलालेखोंमें इसी कालका सिद्ध होना प्रमाणित करते हैं। तथापि प्रोफेसर व्हिसडे- विड्स् या डॉ. केर्नके समान कुछ खोज करनेवाले इस कालको उक्त कालसे ३५ या १०० वर्ष औरभी आगे हटाना चाहते हैं। प्रोफेसर गायगरने हालहीमें इन सब मतोंकी जाँच करके बुद्धका यथार्थ निर्वाण-काल ईसवी सनसे ४८३ वर्ष पहले माना है।* इनमेंसे कोईभी काल क्यों न स्वीकार कर लिया जाय, यह निर्विवाद है, कि बुद्धका जन्म होनेके पहलेही वैदिक धर्म पूर्ण अवस्थामें पहुंच चुका था; और न केवल उप- निषदही किंतु धर्म-सूत्रोंके समान ग्रंथभी उससे पहलेही तैयार हो चुके थे। क्योंकि, पाली भाषाके प्राचीन बौद्ध धर्म-ग्रंथोंहीमें लिखा है, कि - "चारो वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास और निघंटु" आदि विषयोंमें प्रवीण कुछ सत्वशील ब्राह्मण गृहस्थों तथा जटिल तपस्वियोंसे स्वयं गौतमबुद्धने वाद करके उनको अपने धर्मकी दीक्षा दी (सुत्तनिपातोंमेंसे सेल्लसुत्तके सेल्लका वर्णन तथा वत्थुगाथा ३०-४५ देखो)। कठ आदि उपनिषदोंमें (कठ १. १८; मुंड. १. २. १०) अथवा उन्हींको लक्ष्य करके गीतामें (२. ४०-४५; ९. २०-२१) जिस प्रकार यज्ञयाग आदि श्रौतकर्मोंकी गौणताका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार तथा कुछ अंशोंमें उन्हीं शब्दोंके द्वारा तेविज्जसुत्तोंमें (त्रैविद्य-सूत्रों) बुद्धनेभी अपने मतानुसार 'यज्ञयागादि'को निरुपयोगी तथा त्याज्य बतलाया है; और इस बातका निरूपण किया है, कि ब्राह्मण जिसे ('ब्रह्मसहव्यत्यता'=ब्रह्मसायुज्यता) कहते हैं, वह अवस्था कैसे प्राप्त होती है। इससे यह बात स्पष्ट विदित होती है, कि ब्राह्मण-धर्मके कर्मकांड तथा ज्ञानकांड - अथवा गार्हस्थ्य-धर्म और संन्यास-धर्म, अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्ति - इन दोनों शाखाओके पूर्णतया रूढ हो जानेपर उनमें सुधार करनेके लिये बौद्ध धर्म उत्पन्न हुआ है। सुधारके विषयमें सामान्य नियम यह है, कि उसमें
- बुद्ध-निर्वाणकालविषयक वर्णन प्रो. मेक्समूलरने अपने 'धम्मपद'के अंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनामें (S. B. E. Vol. X. Intro. pp. xxxv-xlv) किया है; और उसकी परीक्षा डॉ. गायगरने सन् १९१२ में प्रकाशित अपने 'महावंश'के अनु- वादकी प्रस्तावनामें की है (The Mahavamsa by Dr. Geiger, Pali Text Society, Intro. p. xxii f).