श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जल्दसामने दीख पड़ता है, कि स्थितप्रज्ञ अथवा भक्तिमान् पुरुषके समानही सच्चा भिक्षुभी 'शान्त', 'निष्काम', 'निर्मम', 'निराशी' (निर्लिप्सित), 'समदुःखसुख', 'निग्गब्भ', 'अनिकेतन' या 'अनिवेशन अथवा 'समाननिन्दा-स्तुति', और 'मान- अपमान तथा लाभ-अलाभको समान माननेवाला' रहता है (धम्मपद ८०, ८१ ९; मुत्तनि. मुनिसुत्त १. ३. १४; द्वयतानुपस्सनसुत्त २१-२३; और विनयपिटक चुल्लवग्ग. ७. ४. ३)। द्वयतानुपस्सनसुत्तके ७०वें श्लोकका यह विचार - ज्ञानी पुरुषके लिये जो प्रकाश है, वही अज्ञानीको अंधकार है - गीताके (गीता २. ६९) "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी" इस श्लोकान्तर्गत विचारके सदृश है। और मुनिसुत्तके १० वें श्लोकका यह वर्णन - "अरोसनेय्यो न रोमेति" अर्थात् न तो स्वयं कष्ट पाता है और न दूसरोंकोभी कष्ट देता है - गीताके "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः" (गीता १२. १५) इस वर्णनके समान है। इसी प्रकार सेल्लसुत्तके ये विचार, कि "जो कोई जन्म लेता है वह मरता है" और "प्राणियोंका आदि तथा अन्त अव्यक्त है, इसलिये उसका शोक करना वृथा है" (सेल्लसुत्त १. ९, गी. २. २७, २८), कुछ शब्दोंके हेरफेरसे गीताकेही विचार हैं। गीताके दसवे अध्यायमें अथवा अनुगीतामें (मभा अश्व. ४३, ४४) "ज्योतिष्मानांमें सूर्य, नक्षत्रोंमें चंद्र, और वेद-मंत्रोंमें गायत्री" आदि जो वर्णन है, वही सेल्लसुत्तके २१ वे और २२ वे श्लोकोंमें तथा महावग्गमें (६. ३५. ८) ज्यों- का-त्यों आया है। इसके सिवा शब्दसादृश्यके तथा अर्थसमानताके छोटे-मोटे उदाहरण परलोकवासी तेलंगने गीताके अपने अंग्रेजी अनुवादकी टिप्पणियोंमें दे दिये हैं। तथापि प्रश्न होते हैं, कि यह सदृशता हुई कैसे? ये विचार असलमें बौद्ध धर्मके हैं या वैदिक धर्मके? और इनसे अनुमान क्या निकलता है? किंतु इन प्रश्नोंको हल करनेके लिये उस समय जो साधन उपलब्ध थे वे अपूर्ण थे। यही कारण है, जो उपर्युक्त चमत्कारिक शब्दसादृश्य और अर्थ-सादृश्य दिखला देनेके सिवा परलोकवासी तेलंगने इस विषयमें और कोई विशेष बात नहीं लिखी। परंतु अब बौद्ध धर्मकी जो अधिक बातें उपलब्ध हो गई हैं, उनके उक्त प्रश्न हल किये जा सकते हैं इसलिये यहाँ पर बौद्ध धर्मकी उन बातोंका संक्षिप्त वर्णन किया जाता है। परलोकवासी तेलंगकृत गीताका अंग्रेजी अनुवाद जिस 'प्राच्यधर्म-ग्रंथमाला' में प्रकाशित हुआ था, उसीमें आगे चलकर पश्चिमी विद्वानोंने बौद्ध धर्म-ग्रंथोंके अंग्रेजी अनुवाद प्रसिद्ध किये हैं। ये बातें प्रायः उन्हींमें एकत्रित की गई हैं; और प्रमाणमें बौद्ध ग्रंथोंके जो स्थल बतलाये गये हैं, उनका मिलनाभी इसी मालाके अनुवादोंमें मिलेगा। कुछ स्थानोंपर पाली शब्दों तथा वाक्योंके अवतरण मूल पाली ग्रंथोंसेही उद्धृत किये गये हैं। अब यह बात निर्विवाद सिद्ध हो चुकी है, कि जैन धर्मके समान बौद्ध धर्मभी अपने वैदिक धर्म-रूप पिताकाही पुत्र है, जो जितनी चाहिये उतनी संपत्तिका हिस्सा