भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७१ गीताकी जो ऊपर समता बतलाई गई है, उसमे इस अनुमानको औरभी दृढ़ता प्राप्त हो जाती है। पश्चिमी पंडितोंका निश्चय है, कि महायान-पंथका पहला पुरस्कर्ता नागार्जुन शकके लगभग सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले हुआ होगा; और यह तो स्पष्टही है, कि इस पंथका बीजारोपण अशोकके राजशासनके समयमें हुआ होगा। बौद्ध ग्रंथोंसे तथा स्वयं बौद्ध ग्रंथकारोंके लिखे हुए उस धर्मके इतिहाससे यह बात स्वतंत्र रीतिसे सिद्ध हो जाती है, कि भगवद्गीता महायान बौद्ध-पंथके जन्मसे पहले - अशोकसेभी पहले - याने सन ईसवीसे लगभग ३०० वर्ष पहलेही अस्तित्वमें थी। इन सब प्रमाणोंपर विचार करनेसे इसमें कुछभी शंका नही रह जाती, कि वर्तमान भगवद्गीता शालिवाहन शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहलेही अस्तित्वमें थी। डॉक्टर भांडारकर, परलोकवासी तेलंग, रावबहादुर चिंतामणराव वैद्य और पर- लोकवासी दीक्षितका मतभी इसमे बहुत-कुछ मिलता-जुलता है; और उसीको यहाँ ग्राह्य मानना चाहिये। हाँ, प्रोफेसर गार्वेका मत भिन्न है। उन्होंने उसके प्रमाणमें गीताके चौथे अध्यायवाले संप्रदाय-परंपराके श्लोकोंमेंसे 'योगो नष्टः' - योगका नाश हो गया - इस वाक्यको लेकर योग शब्दका अर्थ 'पातंजल योग' किया है। परंतु हमने प्रमाणसहित पहलेही बतला दिया है, कि वहाँ योग शब्दका अर्थ 'पातंजल- योग' नहीं - 'कर्मयोग' है। इसलिये प्रो गार्वेका मत भ्रममूलक अतएव अग्राह्य है। यह बात निर्विवाद है, कि वर्तमान गीताका काल शालिवाहन शकके पाँच सौ वर्ष पहलेकी अपेक्षा और कम नहीं माना जा सकता। पिछले भागमें यह बतलाही चुके हैं कि मूल गीता इससेभी कुछ सदियोंसे पहलेकी होनी चाहिये। भाग ६ - गीता और बौद्ध ग्रंथ वर्तमान गीताका काल निश्चित करनेके लिये पिछले भागमें जिन बौद्ध ग्रंथोंके प्रमाण दिये गये हैं, उनका पूरा पूरा महत्त्व समझनेके लिये गीता और बौद्ध ग्रंथ या बौद्ध धर्मकी साधारण समानता तथा विभिन्नता परभी यहाँ विचार करना आवश्यक है। पहले कई बार बतला चुके हैं, कि गीता-धर्मकी विशेषता यह है, कि गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ प्रवृत्तिमार्गावलंबी रहता है। परंतु इस विशेष गुणको थोड़ी देरके लिये अलग रख दें; और उक्त पुरुषके केवल मानसिक तथा नैतिक गुणोंहीका विचार करें, तो गीतामें स्थितप्रज्ञके (गीता २. ५५-७२), ब्रह्मनिष्ठ पुरुषके (४. १९-२३; ५. १८-२८) और भक्तियोगी पुरुषके (१२. १३- १९) जो लक्षण बतलाये हैं, उनमें और निर्वाणपदके अधिकारी अर्हतोंके अर्थात् पूर्णावस्थाको पहुंचे हुए बौद्ध भिक्षुओंके जो लक्षण भिन्न भिन्न बौद्ध ग्रंथोंमें दिये हुए हैं, उनमें विलक्षण समता दीख पड़ती है (धम्मपद श्लोक ३६०-४२३ और सुत्त- निपातोंमेंसे मुनिसुत्त तथा धम्मिकसुत्त देखो)। इतनाही नही; किंतु इन वर्णनोंके