भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 615

५७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यति लोग परोपकारके काम किया करें । अतएव 'सौंदरानंद' (सौ. १८. ५४) काव्यके अंतमें, जब नंद अर्हतावस्थामें पहुँच गया, तब उसे बुद्धने जो उपदेश दिया, है, उसमें पहले यह कहा है :- अवाप्तकार्योऽसि परां गतिं गतः न तेऽस्ति किंचित्करणीयम्वपि । "तेरा कर्तव्य हो चुका, तुझे उत्तम गति मिल गई, अब तेरे लिये तिलभरभी कर्तव्य नहीं रहा ।" और आगे स्पष्ट-रूपसे यह उपदेश किया है, कि :- विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरु स्थिरात्मन्परकार्यमप्यथो ॥ "अतएव अब तू अपना कार्य छोड़, बुद्धिको स्थिर करके परकार्य किया कर" (सौ. १८ ५७) । प्राचीन धर्म-ग्रंथोंमें पाये जानेवाले बुद्धके कर्मत्यागविषयक उपदेशमें तथा कर्मयोगविषयक इस उपदेशमें कि जिसे 'सौंदरानंद' काव्यमें अश्व घोषने बुद्धके मुखसे कहलाया है, अत्यंत भिन्नता है। और, अश्वघोषकी इन दलीलोंमें तथा गीताके तीसरे अध्यायमें जो युक्ति-प्रयुक्तियाँ हैं, उनमें - "तस्य कार्यं न विद्यते... तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" तेरे लिये कुछ रह नहीं गया है, इसलिये जो कर्म प्राप्त हों, उनको निष्काम बुद्धिसे किया कर (गीता ३. १७, १९) न केवल अर्थदृष्टिसेही, किंतु शब्दशःभी समानता है। अतएव इससे यह अनुमान होता है, कि ये दलीलें अश्वघोषको गीताहीसे मिली हैं। इसका कारण ऊपर बतलाही चुके हैं, कि अश्वघोषसेभी पहले महाभारत था। परंतु इसे केवल अनुमानही न समझिये। बौद्ध धर्मानुयायी तारानाथने बौद्ध धर्मविषयक इतिहाससंबंधी जो ग्रंथ तिब्बती भाषामें लिखा है, उसमे लिखा है, कि बौद्धोंके पूर्वकालीन संन्यास-मार्गमें महायान पंथने जो कर्मयोगविषयक सुधार किया था. उसे महायान-पंथके मुख्य पुरस्कर्ता नागार्जुनके गुरु राहुलभद्रने 'ज्ञानी श्रीकृष्ण और गणेश'से जाना था। इस ग्रंथका अनुवाद रूसी भाषामें जर्मन भाषामें किया गया है- अंग्रेजीमें अभीतक नहीं हुआ है। डॉ. केर्नने १८९६ ईसवीमें बौद्ध धर्मपर एक पुस्तक लिखी थी।* यहाँ उसीसे हमने यह अवतरण लिया है। डॉक्टर केर्नकाभी यही मत है, कि यहाँपर श्रीकृष्णके नामसे भगवद्गीताहीका उल्लेख किया गया है। महायान- पंथके बौद्ध ग्रंथोमेसे 'सद्धर्मपुंडरीक' नामक ग्रंथमेभी भगवद्गीताके श्लोकोंके किया समान कुछ श्लोक हैं। परंतु इन बातोंका और अन्य बातोंका विवेचन अगले भागमें जायगा। यहाँपर केवल यही बतलाना है, कि बौद्ध-ग्रंथकारोंकेही मतानुसार मूल बौद्ध-धर्मके संन्यास-प्रधान होने परभी उसमे भक्ति-प्रधान तथा कर्म-प्रधान महायान-पंथकी उत्पत्ति भगवद्गीताके कारणही हुई है; और अश्वघोषके काव्यमे

  • See Dr. Kern's Manual of Indian Buddhism (Grundriss, III.
  1. P. 122 महायान ग्रंथके 'अमिताभसूत्र' नामक मुख्य ग्रंथका अनुवाद चीनी भाषामें सन १४८ के लगभग किया गया था।