भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६९

निःसंदिग्ध हो जाती है। बौद्ध धर्मके पहलेही भागवत धर्मका उदय हो गया था, इस विषयमें बुल्हर और प्रसिद्ध फ्रेंच पंडित सेनार्तके मतोंका उल्लेख पहले हो चुका है; तथा प्रस्तुत प्रकरणके अगले भागमें इन बातोंका विवेचन स्वतंत्र रीतिसे किया जायगा, कि बौद्ध धर्मकी वृद्धि कैसे हुई? तथा हिंदू धर्मसे उसका क्या संबंध है? यहाँ केवल गीता-कालके संबंधमेंही आवश्यक उल्लेख संक्षिप्त रूपमें किया जायगा। भागवत धर्म बौद्ध धर्मके पहलेका है, तथापि केवल इतना कह देनेसेही इस बातका निश्चय नहीं किया जा सकता, कि गीताभी बुद्धके पहले थी। क्योंकि यह कहनेके लिये कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, कि भागवत धर्मके साथही गीता-ग्रंथकाभी उदय हुआ। अतएव यह देखना आवश्यक है कि बौद्ध ग्रंथकारोंने गीता-ग्रंथका स्पष्ट उल्लेख कहीं किया है या नहीं? प्राचीन बौद्ध ग्रंथोंमें यह स्पष्ट रूपसे लिखा है, कि बुद्धके समय चार वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास, निघंटु आदि वैदिक धर्मग्रंथ प्रचलित हो चुके थे; अतएव इसमें संदेह नहीं, कि बुद्धके पहलेही वैदिक धर्म पूर्णावस्थामें पहुँच चुका था। इसके बाद बुद्धने जो नया पंथ चलाया, वह अध्यात्मकी दृष्टिसे अनात्मवादी था; परंतु जैसे अगले भागमें बतलाया जायगा आचरण-दृष्टिसे उसमें उपनिषदोंके संन्यास-मार्गहीका अनुकरण किया गया था। परंतु अशोकके समय बौद्ध धर्मकी यह दशा बदल गई थी; बौद्ध भिक्षुओंने जंगलमें रहना छोड़ दिया था – धर्म प्रसारार्थ तथा परोपकारके काम करनेके लिये वे लोग पूर्वकी ओर चीनमें और पश्चिमकी ओर अलेक्जेंड्रिया तथा ग्रीसतक चले गये थे। बौद्ध धर्मके इतिहासमें यह एक अत्यंत महत्त्वका प्रश्न है, कि जंगलोंमें रहना छोड़कर लोकसंग्रहके काम करनेके लिये बौद्ध यति कैसे प्रवृत्त हो गये? बौद्ध धर्मके प्राचीन ग्रंथोंपर दृष्टि डालिये। सुत्तनिपातके खग्गविसाणसुत्तमें कहा है, कि जिस भिक्षुने पूर्ण अर्हतावस्था प्राप्त कर ली है, वह कोईभी काम न करे; केवल गेंडेके सदृश्य जंगलमें निवास किया करे; और महावग्गमें (५. १. २७) बुद्धके प्रमुख शिष्य सोनकोलीविसकी कथामें कहा है, कि जो भिक्षु निर्वाणपदतक पहुँच चुका है, उसके लिये न तो कोई कामही अवशिष्ट रह जाता है; और न किया हुआ कर्मही भोगना पड़ता है – “कतस्स पटिचयो नत्थि करणीयं न विज्जति।” यह शुद्ध संन्यास-मार्ग है, और हमारे औपनिषदिक संन्यास-मार्गसे इसका पूर्णतया मेल मिलता है। यह “करणीयं न विज्जति” वाक्य, गीताके “तस्य कार्यं न विद्यते” इस वाक्यसे केवल समानार्थकही नहीं है, किंतु शब्दशःभी एकही है। परंतु जब बौद्ध भिक्षुओंका यह मूल संन्यास-प्रधान आचार बदल गया और जब वे परोपकारके काम करने लगे, तब नये तथा पुराने मतमें झगड़ा हो गया; पुराने लोग अपनेको ‘थेरवाद’ (वृद्धपंथ) कहने लगे; और नवीन मत-वादी लोग अपने पंथका ‘महायान’ नाम रख करके पुराने पंथको ‘हीनयान’ (अर्थात् हीन पंथके) नामसे संबोधित करने लगे। अश्वघोष महायान पंथका था; और वह इस मतको मानता था, कि बौद्ध