भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

५६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और आगे चलकर कहा है, कि भक्तिसे नम्र होकर इन मंत्रोंको पढ़ना चाहिये - “भक्तिनम्रः एतान्मन्त्रानधीयीत ।” इसी गृह्यशेष-सूत्रके तीसरे प्रश्नके अंतमें यह भी कहा है, कि “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर-मंत्रका जप करनेसे अश्वमेधका फल मिलता है। इससे यह बात पूर्णतया सिद्ध होती है, कि बौधायनके पहले गीता प्रचलित थी; और वासुदेव-पूजाभी सर्वमान्य समझी जाती थी। इसके- सिवा बौधायनके पितृमेध-सूत्रके तृतीय प्रश्नके आरंभहीमें यह वाक्य है :- जातस्य वै मनुष्यस्य ध्रुवं मरणमिति विजानीयात्तस्माज्जाते न प्रहृष्येन्मृते च न विषीदेत् । इससे सहजही दीख पड़ता है, कि वह गीताके “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥” इस श्लोकसे सूझ पड़ा होगा; और उसमें उपर्युक्त 'पत्रं पुष्पं' श्लोकका योग कर देनेसे तो कुछ शंकाही नहीं रह जाती। ऊपर बतला चुके हैं, स्वयं महाभारतका एक श्लोक बौधायन- सूत्रोंमें पाया जाता है। बुल्हर साहबने निश्चित किया है* कि बौधायनका काल आपस्तंबके सौ-दोसौ वर्ष पहले होगा; और आपस्तंबका काल ईसाके पहले तीन सौ वर्षसे कम हो नहीं सकता। परंतु हमारे मतानुसार उसे कुछ इस ओर हटाना चाहिये। क्योंकि महाभारतमें मेष-वृषभ आदि राशियाँ नहीं हैं और ‘काल- माधव’में तो बौधायनका “मीनमेषयोर्मेषवृषभोर्वा वसंतः” यह वचन दिया गया है; यही वचन परलोकवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितके ‘भारतीय ज्योतिषशास्त्र’ मेंभी (पृष्ठ १०२) लिया गया है। इससेभी यही निश्चित अनुमान किया जाता है, कि महाभारत बौधायनके पहलेका है, तथा शकारंभके कम-से-कम चार सौ वर्ष पहले बौधायनका समय होना चाहिये; और पाँच सौ वर्ष पहले महाभारत तथा गीताका अस्तित्व था। परलोकवासी कालेने बौधायनका काल ईसाके सात-आठ सौ वर्ष पहलेका निश्चित किया है; किंतु वह ठीक नहीं है। जान पड़ता है, कि बौधायनका राशिविषयक वचन उनके ध्यानमें न आया होगा। (७) उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह बात किसीकोभी स्पष्ट रूपसे विदित हो जायगी, कि वर्तमान गीता शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहले अस्तित्वमें थी; बौधायन तथा आश्वलायनभी उससे परिचित थे; और उस समयसे श्रीशंकराचार्यके समय- तक उसकी परंपरा अविच्छिन्न रूपसे दिखलाई जा सकती है। परंतु अब तक जिन प्रमाणोंका उल्लेख किया गया है, वे सब वैदिक धर्मके ग्रंथोंसे लिये गये हैं। अब आगे चलकर जो प्रमाण दिया जायगा, वह वैदिक धर्म-ग्रंथोंसे भिन्न अर्थात् बौद्ध साहित्यका है। इससे गीताकी उपर्युक्त प्राचीनता स्वतंत्र रीतिसे औरभी अधिक दृढ़ तथा

  • See Sacred Books of the East Series, Vol. II, Intro. p. xliii and also the same Series, Vol. XIV, Intro. p. xliii.