श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 612, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६७ पुराण हैं, उनमेंभी भगवद्गीता कम-से-कम सौ-दो-सौ वर्ष अधिक प्राचीन अवश्य होगी। पुराण-कालका आरंभ-समय सन ईसवीके दूसरे शतकसे अधिक अर्वाचीन नहीं माना जा सकता, अतएव गीताका काल कम-से-कम शकारंभके कुछ थोड़ा पहलेही मानना पड़ता है। (५) ऊपर यह बतला चुके हैं, कि कालिदास और बाण गीतासे परिचित थे। कालिदाससे पुराने भास कविके नाटक हालहीमें प्रकाशित हुए हैं। उनमेंसे 'कर्णभार' नाटकमें बारहवाँ श्लोक इस प्रकार है :- हतोऽपि लभते स्वर्गं जित्वा तु लभते यशः । उभे बहुमते लोके नास्ति निष्फलता रणे ॥ यह श्लोक गीताके “हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्” (गीता २.३७) श्लोकके समाना- र्थक है; और जब कि भास कविके अन्य नाटकोंमें यह प्रकट होता है, कि वह महा- भारतसे पूर्णतया परिचित था; तब तो यही अनुमान किया जा सकता है, कि उप- र्युक्त श्लोक लिखने समय उसके मनमें गीताका उक्त श्लोक अवश्य आया होगा। अर्थात् यह सिद्ध होता है, कि भास कविके पहलेभी महाभारत और गीताका अस्तित्व था। पंडित गणपतिशास्त्रीने यह निश्चित किया है, कि भास कविका काल शक-के दो-तीन सौ वर्ष पहले रहा होगा। परंतु कुछ लोगोंका मत है, कि वह शकके सौ-दो सौ वर्ष बाद हुआ है। यदि हम दूसरे मतको सत्य माने, तोभी उपर्युक्त प्रमाणसे सिद्ध हो जाता है, कि भाससे कम-से-कम सौ-दोसौ वर्ष पहले अर्थात् शक-कालके आरंभमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ सर्वमान्य हो गये थे। (६) परंतु प्राचीन ग्रंथकारों-द्वारा गीताके श्लोक लिये जानेका औरभी अधिक दृढ़ प्रमाण, परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने गुरुकुलकी 'वैदिक मेग- जीन' नामक अंग्रेजी मासिक पुस्तक (पुस्तक ३, अंक ६-७, पृष्ठ ५०८-५३२, मार्गशीर्ष और पौष, संवत् १९७०) में प्रकाशित किया है। इसके पहले पश्चिमी संस्कृत पंडितोंका यह मत था, कि संस्कृत काव्य-पुराणोंकी अपेक्षा किन्हीं अधिक अथवा प्राचीन ग्रंथोंमें, उदाहरणार्थ सूत्र-ग्रंथोंमेंभी, गीताका उल्लेख नहीं पाया जाता; और इसलिये यह कहना पड़ता है, कि सूत्र-कालके बाद, अर्थात् अधिकसे अधिक सन् ईसवीके पहले, दूसरी सदीमें गीता बनी होगी। परंतु परलोकवासी कालेने प्रमाणोंसे सिद्ध कर दिया है, कि यह मत ठीक नहीं है। बौधायन-गृह्यशेष- सूत्रमें (२.२२.९) गीताका (९.२६) निम्नलिखित श्लोक 'तदाह भगवान्' कहकर स्पष्ट रूपसे लिया गया है :- देशाभावे द्रव्याभावे साधारणे कुर्यान्मनसा वार्चयेदिति । तदाह भगवान् - पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ इति