भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 611

५६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उक्त भाष्यके आरंभहीमें श्रीशंकराचार्यने कहा है, कि इन टीकाकारोंके मतोंका खंडन करके हमने नया भाष्य लिखा है। अतएव आचार्यका जन्मकाल चाहे शक ६१० लीजिये या ७१०; इसमे तो कुछभी संदेह नहीं, कि उस समयके कम-से-कम दो-तीन सौ वर्ष पहले अर्थात् शक ४०० के लगभग गीता प्रचलित थी। अब देखना चाहिये, कि इस कालकेभी और पहले कैसे और कितना जा सकते हैं। (२) परलोकवासी तेलंगने यह दिखलाया है, कि कालिदास और बाणभट्ट गीतासे परिचित थे। कालिदासकृत रघुवंशमें (१०.३१) विष्णुकी स्तुतिके विषयमें जो “अनवाप्तमवाप्तव्यं न ते किंचन विद्यते” यह श्लोक है, वह गीताके (३.२२) “नानवाप्तमवाप्तव्यं” श्लोकसे मिलता है; और बाणभट्टकी कादंबरीके “महाभारतमिवानन्तगीताकर्णनानन्दितनरं” इस एक श्लेष-प्रधान वाक्यमें गीताका स्पष्ट-रूपसे उल्लेख किया गया है। कालिदास और भारविका उल्लेख स्पष्टरूपसे संवत् ६९१ के (शक ५५६) एक शिलालेखमें पाया जाता है; और अब यहभी निश्चित हो चुका है, कि बाणभट्टभी संवत् ६६३ के (शक ५२८) लगभग हर्ष राजाके पास था। इस बातका विवेचन परलोकवासी पांडुरंग गोविंद- शास्त्री पारखीने बाणभट्टपर लिखे हुए अपने एक मराठी निबंधमें किया है। (३) जावा द्वीपमें जो महाभारत ग्रंथ यहाँसे गया है, उसके भीष्मपर्वमें एक गीता प्रकरण है, जिसमें गीताके भिन्न भिन्न अध्यायोंके लगभग सौ-सव्वा सौ श्लोक अक्षरशः मिलते हैं। सिर्फ १२, १५, १६ और १७-इन चार अध्यायोंके श्लोक उसमें नहीं हैं। इससे यह कहनेमें कोई आपत्ति नहीं दीख पड़ती, कि उस समयभी गीताका स्वरूप वर्तमान गीताके सदृशही था। क्योंकि कवि-भाषामें गीताका यह अनुवाद है; और उसमें जो संस्कृत श्लोक मिलते हैं, वे बीच-बीचमें उदाहरण तथा प्रतीकके तौरपर ले लिये गये हैं। इससे यह अनुमान करना युक्तिसंगत नहीं, कि उस समय गीतामें केवल उतनेही श्लोक थे। जब डॉक्टर नरहर गोपाल सरदेसाई जावा द्वीपको गये थे, तब उन्होंने इस बातकी खोज की है। इस विषयका वर्णन कल- कत्तेके 'मॉडर्न रिव्यू' नामक मासिक पत्रके जुलाई १९१४के अंकमें तथा उसके पूर्व पूनाके 'चित्रमय-जगत्' मासिकपत्रमेंभी प्रकाशित हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है; कि शक चार-पाँच सौके कम-से-कम दो सौ वर्ष पहले महाभारतके भीष्मपर्वमें गीता थी; और उसके श्लोकभी वर्तमान गीताके श्लोकोंके क्रमानुसारही थे। (४) विष्णुपुराण और पद्मपुराण आदि ग्रंथोंमें भगवद्गीताके नमूनेपर बनी हुई जो अन्य गीताएं दीख पडती हैं, अथवा उनके उल्लेख पाये जाते हैं, उनका वर्णन इस ग्रंथके पहले प्रकरणमे किया गया है। इससे यह बात स्पष्टतया विदित होती है, कि उस समय भगवद्गीता प्रमाण तथा पूजनीय मानी जाती थी, इसीलिये उसका उक्त प्रकारसे अनुकरण किया गया है, और यदि ऐसा न होता, तो उसका कोईभी अनुकरण न करता। अतएव सिद्ध है, कि इन पुराणोंमें जो अत्यंत प्राचीन