भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७७ यह तत्त्वभी (कौषी. ब्रा. ३. १), कि “आत्मनिष्ठ पुरुष पाप-पुण्यसे सदैव अलिप्त रहता है” (बृ. ४. ४. २३); “इसलिये उसे मातृवध तथा पितृवधसरीखे पातकोंकाभी दोष नहीं लगता”, धम्मपदमें शब्दशः ज्यों-का-त्यों बतला गया है (धम्म. २९४, २९५; मिलिन्दप्रश्न ४. ५. ७)। सारांश, यद्यपि ब्रह्म तथा आत्माका अस्तित्व बुद्धको मान्य नहीं था, तथापि मनको शांत, विरक्त तथा निष्काम करना प्रभृति मोक्ष-प्राप्तिके जिन साधनोंका उपनिषदोंमें वर्णन है, वेही साधन बुद्धके मतसे निर्वाण-प्राप्तिके लियेभी आवश्यक हैं; इसीलिये बौद्ध यति तथा वैदिक संन्यासियोंके वर्णन मानसिक स्थितिकी दृष्टिसे एकहीसे होते हैं; और इसी कारण पाप-पुण्यकी जिम्मेदारीके संबंधमें तथा जन्म-मरणके चक्करसे छुटकारा पानेके विषयमें वैदिक संन्यास-धर्मके जो सिद्धान्त हैं, वेही बौद्ध धर्ममें स्थिर रखे गये हैं। परंतु वैदिक धर्म गौतमबुद्धसे पहलेका है, अतएव इस विषयमें कोई शंका नहीं, कि ये विचार असलमें वैदिक धर्मकेही हैं। वैदिक तथा बौद्ध संन्यास-धर्मोंकी विभिन्नताका वर्णन हो चुका। अब देखना चाहिये, कि गार्हस्थ्य-धर्मके विषयमें बुद्धने क्या कहा है। आत्म-अनात्म-विचारके तत्त्वज्ञानको महत्त्व न देकर सांसारिक दुःखोंके अस्तित्व आदि दृश्य आधारपरही यद्यपि बौद्ध धर्म खड़ा किया गया है; तथापि स्मरण रखना चाहिये, कि कोंटसरीखे आधुनिक पश्चिमी पंडितोंके निरे आधिभौतिक धर्मके अनुसार — अथवा गीता- धर्मके अनुसारभी बौद्ध धर्म मूलमें प्रवृत्ति-प्रधान नहीं है। यह सच है कि, बुद्धको उपनिषदोंके आत्मज्ञानकी ‘तात्त्विक दृष्टि’ मान्य नहीं है। परंतु बृहदारण्यक उपनिषद्मे (बृ. ४. ४. ६) वर्णित याज्ञवल्क्यका यह सिद्धान्त कि, “संसारको बिलकुल छोड़ करके मनको निर्विषय तथा निष्काम करनाही इस जगतमें मनुष्यका केवल एक परम कर्तव्य है”, बौद्ध धर्ममेंभी सर्वथा स्थिर रखा गया है, इसीलिये बौद्ध धर्म मूलमें केवल संन्यास-प्रधान हो गया है। यद्यपि बुद्धके समग्र उपदेशोंका तात्पर्य यह है, कि संसारका त्याग कियेबिना, केवल गृहस्थाश्रममेही बने रहनेसे, परम सुख अर्हन्तावस्था कभी प्राप्त हो नहीं सकती; तथापि यह न समझ लेना चाहिये कि उसमें गार्हस्थ्यवृत्तिका बिलकुल विवेचनही नहीं है। जो मनुष्य बिना भिक्षु बने बुद्ध, उसके धर्म, और बौद्ध भिक्षुओंके संघ अर्थात् मेले या मंडलियों, इन तीनोंपर विश्वास रखे; और “बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” इस संकल्पके उच्चारण द्वारा उक्त तीनोंकी शरणमे जाय, उसको बौद्ध-ग्रंथोंमें उपासक कहा है। येही लोग बौद्ध धर्मावलंबी गृहस्थ हैं। प्रसंग-प्रसंगपर स्वयं बुद्धनेभी कुछ स्थानोंपर उपदेश किया है, कि उन उपासकोंको अपना गार्हस्थ्य-व्यवहार कैसा रखना चाहिये (महापरिनिव्वाणसुत्त १. २४)। वैदिक गार्हस्थ्य-धर्ममेंसे हिंसात्मक श्रौत यज्ञयाग और चारों वर्णोंका भेद बुद्धको ग्राह्य नहीं था। इन बातोंको छोड़ देनेसे स्मार्त पंचमहायज्ञ, दान आदि परोपकार धर्म और नीतिपूर्वक आचरण गी. र. ३७