श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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करनाही गृहस्थका कर्तव्य रह जाता है; तथा गृहस्थोंके धर्मका वर्णन करते समय केवल इन्ही बातोंका उल्लेख बौद्ध-ग्रंथोंमें पाया जाता है। बुद्धका मत है, कि प्रत्येक गृहस्थ अर्थात् उपासकको पंचमहायज्ञ करनाही चाहिये। उनका स्पष्ट कथन है, कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सर्वभूतानुकंपा और (आत्मा मान्य न हो, तथापि) आत्मौपम्य-दृष्टि, शौच या मनकी पवित्रता, तथा विशेष करके सत्पात्रों याने बौद्ध- भिक्षुओंको एवं बौद्ध भिक्षु-संघको अन्न-वस्त्र आदिका दान देना प्रभृति नीति- धर्मोकाभी पालन बौद्ध उपासकोंको करना चाहिये। बौद्ध धर्ममें इसीको 'शील' कहा है; और दोनोंकी तुलना करनेसे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि पंचमहायज्ञके समान ये नीति-धर्मभी ब्राह्मण-धर्मके धर्म-सूत्रों अथवा प्राचीन स्मृति-ग्रंथोंसे (मनु. ६. ९२; १०. ६३) बुद्धने लिये हैं।* और तो क्या, इस आचारके विषयमें प्राचीन ब्राह्मणोंकी स्तुति स्वयं बुद्धनेही ब्राह्मणधम्मिकसुत्तोंमें की है; तथा मनुस्मृतिके कुछ श्लोक तो धम्मपदमें अक्षरशः पाये जाते हैं (मनु. २. १२१; ५. ४५; धम्मपद १०९, १३१) बौद्ध धर्ममें वैदिक ग्रंथोंमें न केवल पंचमहायज्ञ और नीति-धर्मही लिये गये हैं; किंतु वैदिक धर्ममें पहले कुछ उपनिषत्कारों-द्वारा प्रतिपादित इस मतकोभी बुद्धने स्वीकार किया है, कि गृहस्थाश्रममें पूर्ण मोक्ष-प्राप्ति कभीभी नहीं होती। उदाहरणार्थ, सुत्तनिपातके धम्मिकसुत्तमें भिक्षुके साथ उपासककी तुलना करके बुद्धने साफ़ साफ़ कह दिया है, कि गृहस्थको उत्तम शीलके द्वारा बहुत हुआ तो 'स्वयंप्रकाश' देवलोककी प्राप्ति हो जावेगी; परंतु जन्म-मरणके चक्करसे पूर्णतया छुटकारा पानेके लिये संसार तथा लड़के-बच्चे, स्त्री आदिको छोड़ करके अंतमें उसको भिक्षु-धर्मही स्वीकार करना चाहिये (धम्मिकसुत्त १७, २९; बृ. ४. ४. ६; महा. वन. २. ६३)। तेविज्जसुत्तमें (ते. सु. १. ३५. ३. ५) यह वर्णन है, कि कर्म-मार्गीय वैदिक ब्राह्मणोंमें वाद करते समय अपने उक्त संन्यास-प्रधान मतको सिद्ध करनेके लिये बुद्ध ऐसी युक्तियाँ पेश करते थे, कि "यदि तुम्हारे ब्रह्मके बाल-बच्चे-स्त्री तथा क्रोध- लोभ नहीं हैं, तो स्त्री-पुत्रोंमें रहकर तथा यज्ञ-याग आदि काम्य कर्मोंके द्वारा तुम्हें ब्रह्मकी प्राप्ति होगीही कैसे ?" और यहभी प्रसिद्ध है, कि स्वयं बुद्धने युवावस्थामेंही अपनी स्त्री, अपने पुत्र तथा राजपाटकोभी त्याग दिया था, एवं भिक्षु-धर्म स्वीकार- कर लेनेपर छः वर्षके बाद उन्हें बुद्धावस्था प्राप्त हुई थी। बुद्धके समकालीन, परंतु उनसे पहलेही समाधिस्थ हो जानेवाले, महावीर नामक अंतिम जैन तीर्थंकरकाभी ऐसाही उपदेश है। परंतु वह बुद्धके समान अनात्मवादी नहीं था; और इन दोनों धर्मोंमें महत्त्वका भेद यह है, कि वस्त्रप्रावरण आदि ऐहिक सुखोंका त्याग और अहिंसाव्रत प्रभृति धर्मोंका पालन बौद्ध भिक्षुओंकी अपेक्षा जैन यति अधिक दृढ़तासे किया करते थे; एवं अबभी करते रहते हैं। खानेहीकी नियतसे जो प्राणी न मारे
- See Dr. Kern's Manual of Buddhism (Grundriss III. 8) p. 68.