भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७९ गये हों, उनका ‘पवत्त’ (सं. प्रवृत्त) अर्थात् “तैयार किया हुआ मांस” (हाथी, सिंह, आदि कुछ प्राणियोंको छोड़कर) बुद्ध स्वयं खाया करते थे; ‘पवत्त’ मांस तथा मछलियाँ खानेकी आज्ञा बौद्ध भिक्षुओंकोभी दी गई है; एवं बिना वस्त्रोंके नंग-धड़ंग घूमना बौद्ध-भिक्षु-धर्मके नियमानुसार अपराध है; (महावग्ग. ६. ३१. १४; ८. २८. १)। सारांश, यद्यपि बुद्धका निश्चित उपदेश था, कि अनात्मवादी भिक्षु बनो; तथापि काया-क्लेशमय उग्र तपसे बुद्ध सहमत नहीं थे (महावग्ग. ५. १. १६; गीता ६. १६); बौद्ध भिक्षुओंके विहारों अर्थात् उनके रहनेके मठोंकी सारी व्यवस्थाभी ऐसी रखी जाती थी, कि जिससे उनको कोई विशेष शारीरिक कष्ट न सहना पड़े; और प्राणायाम आदि योगाभ्यास सरलतापूर्वक हो सके। तथापि बौद्ध धर्ममें यह तत्त्व पूर्णतया स्थिर है, कि अर्हतावस्था या निर्वाणसुखकी प्राप्तिके लिये गृहस्थाश्रमको त्यागनाही चाहिये, इसलिये यह कहनेमें कोई प्रत्यवाय नहीं, कि बौद्ध धर्म संन्यास-प्रधान धर्म है। यद्यपि बुद्धका निश्चित मत था, कि ब्रह्मज्ञान अथवा आत्म-अनात्म-विचार भ्रमका एक बड़ा-सा जाल है; तथापि इस दृश्य कारणके लिये, अर्थात् दुःखमय संसार- चक्रसे छूटकर निरंतर शांति तथा सुख प्राप्तिके लिये, उपनिषदोंमें वर्णित संन्यास- मार्गवालोंके इसी साधनको उन्होंने मान लिया था, कि वैराग्यसे मनको निर्विषय रखना चाहिये; और जब यह सिद्ध हो गया, कि चातुर्वर्ण्य भेद या हिंसात्मक यज्ञ- यागको छोड़कर बौद्ध धर्ममें वैदिक गार्हस्थ्य-धर्मके नीतिनियमही कुछ हेरफेर करके लिये गये हैं, तब यदि उपनिषद् तथा मनुस्मृति आदि ग्रंथोंमें वैदिक संन्यासियोंके जो वर्णन हैं, वे वर्णन, एवं बौद्ध भिक्षुओं या अर्हंतोंके वर्णन, अथवा अहिंसा आदि नीति-धर्म, दोनों धर्मोंमें एकहीसे - और कई स्थानोंपर शब्दशः एकहीसे - दीख पड़ें, तो आश्चर्यकी बात नहीं है। ये सब बातें मूल वैदिक धर्महीकी हैं। परंतु बौद्धोंने केवल इतनीही बातें वैदिक धर्मसे नहीं ली हैं; प्रत्युत बौद्ध धर्मके दशरथ-जातकके समान जातक-ग्रंथभी प्राचीन वैदिक पुराण-इतिहासकी कथाओंके, बुद्ध धर्मके अनुकूल तैयार किये हुए, रूपांतर हैं। न केवल बौद्धोंनेही, किंतु जैनोंनेभी अपने अभिनव- पुराणोंमें वैदिक कथाओंके ऐसेही रूपांतर कर लिये हैं। सेल* साहबने तो यह लिखा है, कि ईसाके अनंतर प्रचलित हुए मुहंमदी धर्ममें ईसाके चरित्रका इसी प्रकार विपर्यास कर लिया गया है। वर्तमान समयकी खोजसे यह सिद्ध हो चुका है, कि पुरानी बाइबलमें सृष्टिकी उत्पत्ति, प्रलय तथा नूह आदिकी जो कथाएँ हैं, वे सब प्राचीन खाल्दी जातिकी धर्म-कथाओके रूपांतर हैं, कि जिनका वर्णन यहूदी लोगोंका किया हुआ है। उपनिषद्, प्राचीन धर्म-सूत्र, तथा मनुस्मृतिके वर्णन कथाएँ अथवा

  • See Sele's Koran, “To the Reader” (Preface), p. x. and the Preliminary Discourse, See IV. p. 58. (Chandos Classics Edition.)