भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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५८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विचार जब बौद्ध ग्रंथोंमें इस प्रकार - कई बार तो बिलकुल शब्दशः - लिये गये हैं, तब यह अनुमान सहजही हो जाता है, कि ये असलमें महाभारतकेही हैं। बौद्ध-ग्रंथ- प्रणेताओंने इन्हें वहींसे उद्धृत कर लिया होगा। वैदिक धर्म-ग्रंथोंके जो भाव और श्लोक बौद्ध-ग्रंथोंमें पाये जाते हैं, उनके कुछ उदाहरण ये हैं :- "जैसे बैरकी वृद्धि होती है; और बैरसे बैर शांत नहीं होता" (मभा. उद्यो. ७१. ५९, ६३), "दूसरेके क्रोधको शांतिसे जीतना चाहिये" आदि विदुरनीति ( मभा. उद्योग. ३८. ७३ ) तथा जनकका यह वचन कि "यदि मेरी एक भुजामें चंदन लगाया जाय और दूसरी काटकर अलगकर दी जाय, तोभी मुझे दोनो बातें समानही है" ( मभा. शां. ३२०. ३६); इनके अतिरिक्त महाभारतके औरभी बहुतसे श्लोक बौद्ध-ग्रंथोंमें शब्दशः पाये जाते हैं (धम्मपद ५, २२३; मिलिंदप्रश्न ७. ३. ५) । इसमें कोई संदेह नहीं, कि उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा मनुस्मृति आदि वैदिक ग्रंथ बुद्धकी अपेक्षा प्राचीन हैं, इसलिये उनके जो विचार तथा श्लोक बौद्ध-ग्रंथोंमें पाये जाते हैं, उनके विषयमें विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है, कि उन्हें बौद्ध-ग्रंथकारोंने उपर्युक्त वैदिक ग्रंथोंहीसे लिया है; किंतु यह बात महाभारतके विषयमें नहीं कही जा सकती । महाभारतमेंही बौद्ध डागोबाओंका जो उल्लेख है, उससे स्पष्ट होता है, कि महा- भारतका अंतिम संस्करण बुद्धके बाद रचा गया है। अतएव केवल श्लोकके सादृश्यके आधारपर यह निश्चय नहीं किया जा सकता, कि वर्तमान महाभारत बौद्ध-ग्रंथोंके पहलेहीका है; और गीता महाभारतकाही एक भाग है, इसलिये यही न्याय गीताकोभी उपयुक्त हो सकेगा । इसके सिवा, यह पहलेही कहा जा चुका है, कि गीतामेंही ब्रह्म- सूत्रोंका उल्लेख है; और ब्रह्म-सूत्रोंमें है बौद्ध धर्मका खंडन। अतएव स्थितप्रज्ञके वर्णन प्रभृतिकी (वैदिक और बौद्ध) दोनोंकी समताको छोड़ देते हैं, और यहाँ अब इस बातका विचार करते हैं, कि उक्त शंकाको दूर करने एवं गीताको निर्विवाद रूपसे बौद्ध- ग्रंथोंसे पुरानी सिद्ध करनेके लिये बौद्ध-ग्रंथोंमें कोई अन्य साधन मिलता है या नहीं । ऊपर कह चुके हैं, कि बौद्ध धर्मका मूल स्वरूप शुद्ध निरात्मवादी और निवृत्ति- प्रधान है। परंतु उसका यह स्वरूप बहुत दिनोंतक टिक न सका। भिक्षुओंके आचरणके विषयमें मतभेद हो गया; और बुद्धकी मृत्युके पश्चात् उसमें अनेक उपपंथोंका निर्माणही नहीं होने लगा, किंतु धार्मिक तत्त्वज्ञानके विषयमेभी इसी प्रकारका मतभेद उपस्थित हो गया । आजकल कई लोग तो यहभी कहने लगे हैं, कि "आत्मा नहीं है" इस कथनके द्वारा बुद्धको मनसे यही बतलाना है, कि "अचिन्त्य आत्मज्ञानके शुष्क- वादमें मत पड़ों; वैराग्य तथा अभ्यासके द्वारा मनको निष्काम करनेका प्रयत्न पहले करो; आत्मा हो चाहे न हो; मनके निग्रह करनेका कार्य मुख्य है; और उसे सिद्ध करनेका प्रयत्न पहले करना चाहिये।" उनके कहनेका यह मतलब नहीं है, कि ब्रह्म या आत्मा बिलकुल हैही नहीं। क्योंकि तेविज्जसुत्तमें स्वयं बुद्धनेही 'ब्रह्मसहव्यताय' स्थितिका उल्लेख किया है; और सेल्लसुत्त तथा थेरगाथामेंभी उन्होंने कहा है, कि