भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५८१ में ब्रह्मभूत हूं (सेल्लसुत्त १६; थेरगाथा ८३१)। परंतु मूल हेतु चाहे जो हो; यह निर्विवाद है, कि ऐसे अनेक प्रकारके मत, वाद तथा आग्रही पंथ तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे आगे निर्मित हो गये; जो कहते थे, कि “आत्मा या ब्रह्ममेसे कोईभी नित्य वस्तु जगतके मूलमें नहीं है; जो कुछ दीख पड़ता है, वह क्षणिक या शून्य है; अथवा जो कुछ दीख पड़ता है, वह ज्ञान है; ज्ञानके अतिरिक्त – जगतमें कुछभी नहीं है”, इत्यादि (वे. सू. शां. भा. २. २. १८–२६)। इस निरीश्वर या अनात्मवादी बौद्ध मतकोही क्षणिकवाद, शून्यवाद और विज्ञानवाद कहते हैं। परंतु यहाँपर इन सब पंथोंके विचार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है। हमारा प्रश्न ऐतिहासिक है। अतएव उसका निर्णय करनेके लिये 'महायान' नामक पंथका वर्णन, जितना आवश्यक है उतनाही, यहाँपर किया जाता है। बुद्धके मूल उपदेशमें आत्मा या ब्रह्मका (अर्थात् परमात्मा या परमेश्वर) अस्तित्वही अग्राह्य अथवा गौण माना गया है, इसलिये स्वयं बुद्ध अपने जीवन-कालमेंसेही भक्तिके द्वारा परमेश्वरकी प्राप्ति करनेके मार्गका उपदेश किया जाना संभव नहीं था; और जबतक बुद्धकी भव्य मूर्ति एवं चरित्रक्रम लोगोंके सामने प्रत्यक्ष रीतिसे उपस्थित था, तबतक उस मार्गकी कुछ आवश्यकताही नहीं थी। परंतु आगे यह आवश्यक हो गया, कि यह धर्म सामान्य जनोंको प्रिय हो; और उसका अधिक प्रचारभी होवे। अतः घरदार छोड़, भिक्षु बन करके मनो- निग्रहसे बैठे-बिठाये निर्वाण पाने – यह न समझकर कि किसमें ? – के इस निरीश्वर निवृत्ति-मार्गकी अपेक्षा किसी सरल और प्रत्यक्ष मार्गकी आवश्यकता हुई। बहुत संभव है, कि साधारण बुद्ध-भक्तोंने तत्कालीन प्रचलित वैदिक भक्ति-मार्गका अनुकरण करके, बुद्धकी उपासनाका आरंभ पहले पहल स्वयं कर दिया हो; अतएव बुद्धके निर्वाण पानेके पश्चात् शीघ्रही बौद्ध पंडितोंने बुद्धहीको “स्वयंभू तथा अनादि, अनंत पुरुषोत्तम"का रूप दे दिया, और वे कहने लगे, कि बुद्धका निर्वाण होना तो उन्हींकी लीला है, “असली बुद्धका कभी नाश नहीं होता – वह तो सदैव अचल रहता है।" इसी प्रकार बौद्ध-ग्रंथोंमें यह प्रतिपादन किया जाने लगा, कि असली बुद्ध “सारे जगतका पिता है; और जनसमूह उनकी संतान है", इसलिये वहभी सभीको “समान है, न वह किसीसे प्रेमही करता है और न किसीसे द्वेषभी करता है।” “धर्मकी व्यवस्था बिगड़नेपर 'धर्मकृत्य'के लिये वही समय-समयपर बुद्धके रूपमें प्रकट हुआ करता है", और इसी देवाधिदेव बुद्धकी "भक्ति करनेसे, उनके ग्रंथोंकी पूजा करनेसे और उसके डागोबाके संमुख कीर्तन करनेसे" अथवा "उसे भक्तिपूर्वक दो-चार कमल या एक फूल समर्पण कर देनेभीसे मनुष्यको सद्गति प्राप्त होती है (सद्धर्मपुंडरीक २. ७७–९८; ५. २२; १५. ५–२२; मिलिंदप्रश्न ३. ७. ७)।* मिलिंदप्रश्नमें

  • प्राच्यधर्म-पुस्तकमालाके २१वें खंडमें 'सद्धर्मपुंडरीक' ग्रंथका अनुवाद प्रकाशित हुआ है। यह मूल ग्रंथ संस्कृत भाषाका है। अब मूल संस्कृत ग्रंथभी प्रकाशित हो चुका है।