भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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५८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (मि. प्र. ३. ७ २) यहभी कहा है, कि "किसी मनुष्यकी सारी उम्र दुराचरणोंमे क्यों न बीत गई हो; परंतु मृत्युके समय यदि वह बुद्धकी शरणमें जावे, तो उसे स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी"; और सद्धर्मपुंडरीकके दूसरे तथा तीसरे अध्यायोंमें इस बातका विस्तृत वर्णन है, कि सब लोगोंका "अधिकार, स्वभाव तथा ज्ञान एकही प्रकारका नहीं होता; इसलिये अनात्मपर निवृत्ति-प्रधान-मार्गके अतिरिक्त भक्तिके इस मार्गको (यान) बुद्धनेही दया करके अपनी-"उपायचातुरीमे निर्मित किया है।" स्वयं बुद्धके बतलाये हुए इस धर्म-तत्त्वको एकदम छोड़ देना कभीभी संभव नहीं था, कि निर्वाणपदकी प्राप्ति होनेके लिये भिक्षु-धर्महीको स्वीकार करना चाहिये; क्योंकि यदि ऐसा किया जाता, तो मानो बुद्धके मूल उपदेशपरही हरताल पोता जाता। परंतु यह कहना कुछ अनुचित नहीं था, कि भिक्षु हो गया तो क्या हुआ; उसे जंगलमें 'गैंडे'के समान अकेले तथा उदासीन न बने रहना चाहिये; किंतु धर्मप्रसार आदि लोकहित तथा परोपकारके काम 'निरिस्सित' बुद्धिमे करते जानाही बौद्ध भिक्षुओंका कर्तव्य है;† इसी मतका प्रतिपादन महायान-पंथके सद्धर्मपुंडरीक आदि ग्रंथोंमें किया गया है; और नागसेनने मिलिंदसे कहा है, कि "गृहस्थाश्रममें रहते हुए निर्वाण- पदको पा लेना बिल्कुल अशक्य नहीं है - और इसके कितनेही उदाहरणभी है" (मि. प्र. ६. २. ४)। यह बात किसीकेभी ध्यानमें सहजही आ जायगी, कि ये विचार अनात्मवादी तथा केवल संन्यास-प्रधान मूल बौद्ध धर्मके नहीं हैं, अथवा शून्यवाद या विज्ञान-वादको स्वीकार करकेभी इनकी उपपत्ति नहीं जानी जा सकती; और पहले पहल अधिकांश बौद्ध धर्मवालोंको स्वयं मालूम पड़ता था, कि ये विचार बुद्धके मूल उपदेशसे विरुद्ध हैं। परंतु फिर यही नया मतही स्वभावमे अधिकाधिक लोकप्रिय होने लगा; और बुद्धके मूल उपदेशके अनुसार आचरण करनेवालेको 'हीनयान' (हल्का मार्ग) तथा इस नये पंथको 'महायान' (बड़ा मार्ग) नाम प्राप्त हो गया।* चीन, तिब्बत और जापान आदि देशोंमें आजकल जो बौद्ध धर्म प्रचलित † सुत्तनिपातमे खग्गविसाणसुत्तके ४१ वे श्लोकका ध्रुवपद "एको चरे खग्गविसाणकप्पो" है। उसका यह अर्थ है, कि खग्गविसाण याने गेंडा और उसीके समान बौद्ध भिक्षुको जंगलमें अकेले रहना चाहिये।

  • हीनयान और महायान-पंथोंका भेद बतलाते हुए डॉक्टर केर्नने कहा है, कि:- "Not the Arhat, who has shaken off all human feeling, but the generous self-sacrificing, active Bodhisattva is the ideal of the Mahayanists, and this attractive side of the creep has, more per- haps than anything else, contributed to their wide conquests, whereas S. Buddhism has not been able to make converts except where the soil had been prepared by Hindusism and Mahayanism"-Manual of Indian Buddhism, p. 69. Southern Buddhism अर्थात् हीनयान है। महायान-पंथमे भक्तिकाभी समावेश हो चुका था। "Mahayanism lays