श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५८३ है, वह महायान-पंथका है; और बुद्धके निर्वाणके पश्चात् महायान-पंथी भिक्षुसंघके दीर्घोद्योगके कारणही बौद्ध धर्मका इतनी शीघ्रतासे फैलाव हो गया । डॉक्टर केर्नकी राय है, कि बौद्ध धर्ममें इस सुधारकी उत्पत्ति शालिवाहन शकके लगभग तीन सौ वर्ष पहले हुई होगी ।† क्योंकि बौद्ध-ग्रंथोंमें इसका उल्लेख है, कि शक राजा कनिष्कके शासन-कालमें बौद्ध-भिक्षुओंकी जो एक महापरिषद् हुई थी, उसमें महायान-पंथके भिक्षु उपस्थित थे । इस महायान-पंथके 'अमितायुसुत्त' नामक प्रधान सूत्र-ग्रंथका वह अनुवाद अभी उपलब्ध है, जो कि चीनी भाषामें सन् १४८ इसवीके लगभग किया गया था । परंतु हमारे मतानुसार यह काल इससेभी प्राचीन होना चाहिये । क्योंकि, सन ईसवीसे लगभग २३० वर्ष पहले प्रसिद्ध किये गये अशोकके शिलालेखों में संन्यास-प्रधान निरीश्वर बौद्ध धर्मका विशेष रीतिसे कोई उल्लेख नहीं मिलता; उनमें सर्वत्र प्राणिमात्रपर दया करनेवाले प्रवृत्ति-प्रधान बौद्ध धर्महीका उपदेश किया गया है । तब यह स्पष्ट है, कि पहलेही बौद्ध धर्मको महायान- पंथके प्रवृत्ति-प्रधान स्वरूपका प्राप्त होना आरंभ हो गया था । बौद्ध यति नागार्जुन इस पंथका मुख्य पुरस्कर्ता था, न कि मूल उत्पादक । ब्रह्म या परमात्माके अस्तित्वको न मानकर, उपनिषदोंके मतानुसार, केवल मनको निर्विषय करनेवाले निवृत्ति-मार्गके स्वीकारकर्ता मूल निरीश्वरवादी बुद्ध धर्महीमेंसे यह कब संभव था, कि आगे क्रमशः स्वाभाविक रीतिसे भक्ति-प्रधान प्रवृत्ति-मार्ग निकल पड़ेगा; इसलिये बुद्धका निर्वाण हो जानेपर बौद्ध धर्मको शीघ्रही जो यह कर्म-प्रधान भक्ति-स्वरूप प्राप्त हो गया, उससे प्रकट होता है, कि इसके लिये बौद्ध धर्मके बाहरका तत्कालीन कोई न कोई अन्य कारण निमित्त हुआ होगा; और इस कारणको ढूँढ़ते समय भगवद्गीतापर दृष्टि पहुँचेबिना नहीं रहती । क्योंकि, जैसे हमने गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें स्पष्टीकरण कर दिया है, हिंदुस्थानमें तत्कालीन प्रचलित धर्मोंमेंसे जैन तथा उपनिषद्-धर्म पूर्णतया निवृत्ति-प्रधानही थे; और वैदिक धर्मके पाशुपत अथवा शैव आदि पंथ यद्यपि भक्ति-प्रधान थे तो सही; पर प्रवृत्ति-मार्ग और भक्तिका मेल भगवद्गीताके अतिरिक्त अन्यत्र कहींभी नहीं पाया जाता था । गीतामें भगवानने अपने लिये पुरुषोत्तम नामका उपयोग किया है; और a great stress on devotion in this respect as in many others harmonising with the current of feeling in India which led to the growing importance of Bhakti." Ibid, p. 124. † See Dr. Kern's Manual of Indian Buddhism, pp. 6, 69 and 119. ( मिलिंद मिनँडेर नामी यूनानी राजा ) सन् ईसवीसे लगभग १४० या १५० वर्ष पहले हिंदुस्थानकी वायव्यकी ओर, बॅक्ट्रिया देशमें राज्य करता था । मिलिंदप्रश्नमें इस बातका उल्लेख है, कि नागसेनने इसे बौद्ध धर्मकी दीक्षा दी थी । बौद्ध धर्म फैलानेके ऐसे काम महायान-पंथके लोगही किया करते थे, इसलिये स्पष्टही है. कि तब महायान-पंथ प्रादुर्भूत हो चुका था ।