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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 629

५८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ये विचार भगवद्गीतामेंही आये हैं, कि "मैं पुरुषोत्तमही सब लोगोंका 'पिता' और 'पितामह' हूँ (गीता ९. ७) ; सबको 'सम' हूँ, मुझे न तो कोई द्वेष्यही है और न कोई प्रिय (गीता ९. २९) ; मैं यद्यपि अज और अव्यय हूँ, तथापि धर्म-संरक्षणार्थ समय-समयपर अवतार लेता हूँ (४. ६-८) ; मनुष्य कितनाही दुराचारी क्यों न हो, पर मेरा भजन करनेसे वह साधुही हो जाता है (९. ३०) : अथवा मुझे भक्ति- पूर्वक एक-आध फूल, फल, पत्ता या थोड़ासा पानी अर्पण कर देनेसेभी मैं उसे बड़ेही संतोषपूर्वक ग्रहण करता हूँ (गीता ९. २६) ; और अज्ञ लोगोंके लिये भक्ति एक सुलभ मार्ग है" (गीता १२. ५) ; इत्यादि । इसी प्रकार इस तत्त्वका विस्तृत प्रतिपादन गीताके अतिरिक्त कहींभी नहीं किया गया है, कि ब्रह्मनिष्ठ पुरुष लोक- संग्रहके लिये प्रवृत्त-धर्महीको स्वीकार करें। अतएव यह अनुमान करना पड़ता है, कि जिस प्रकार मूल बुद्ध धर्ममें वासनाका क्षय करनेका निरा निवृत्ति-प्रधान-मार्ग उपनिषदोंसे लिया गया है, उसी प्रकार जब महायान-पंथ निकाला तब उसमें प्रवृत्ति- प्रधान भक्ति-तत्त्वभी भगवद्गीताहीसे लिया गया होगा । परंतु यह बात केवल अनुमानोंपरही अवलंबित नहीं है। तिब्बती भाषामें बौद्ध धर्मके इतिहासपर बौद्ध- धर्मी तारानाथ-लिखित जो ग्रंथ है, उसमें स्पष्ट लिखा है, कि महायान-पंथके मुख्य पुरस्कर्ताका अर्थात् "नागार्जुनका गुरु राहुलभद्र नामक बौद्ध पहले ब्राह्मण था; और इस ब्राह्मणको (महायान-पंथकी) कल्पना सूझ पड़नेके लिये ज्ञानी श्रीकृष्ण तथा गणेश कारण हुए।" इसके सिवा, एक दूसरे तिब्बती ग्रंथमेंभी यही उल्लेख पाया जाता है।* यह सच है, कि तारानाथका ग्रंथ बहुत प्राचीन नहीं है; परंतु यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि उसका वर्णन प्राचीन ग्रंथोंके आधारको छोड़ कर नहीं किया गया है। क्योंकि, यह संभव नहीं है, कि कोईभी बौद्ध ग्रंथकार स्वयं अपने धर्मपंथके तत्त्वोंको बतलाते समय, बिना किसी कारणके, परधर्मियोंका इस प्रकार उल्लेख कर दे । इसलिये स्वयं बौद्ध ग्रंथकारोंहीके द्वारा इस विषयमें श्रीकृष्णके नामका उल्लेख किया जाना बड़े महत्त्वका है। क्योंकि, भगवद्गीताके अतिरिक्त श्रीकृष्णोक्त दूसरा प्रवृत्ति-प्रधान भक्ति-ग्रंथ वैदिक धर्ममें हैही नहीं, अतएव इससे

  • See Dr. Kern's Manual of Indian Buddhism, p. 122. "He (Nagarjuna) was a pupil of the Brahmana Rahula- bhadra, who himself was a Mahayanist. This Brahmana was much indebted to the sage Krishna and still more to Ganesha. This quassi-historical notice, reduced to its less allegorical expression means that Mahayanism is much indebted to the Bhagavadgita and more even to Shivaism." जान पड़ता है, कि डॉ. केर्न 'गणेश' शब्दसे शैव पंथ समझते हैं। डॉ. केर्नने प्राच्यधर्म-पुस्तक-मालामें 'सद्धर्मपुंडरीक' ग्रंथका अनुवाद किया है; और उसकी प्रस्तावनामें इसी मतका प्रतिपादन किया है। (S. B. E. Vol. XXI, Intro. pp. xxv-xxviii ).