भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 630

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५८५ यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है, कि महायान-पंथके अस्तित्वमें आनेसे पहलेही न केवल भागवत धर्मही किंतु भागवत धर्मविषयक श्रीकृष्णोक्त ग्रंथ अर्थात् भगवद्- गीताभी उस उमय प्रचलित थी; और डॉक्टर केर्नभी इसी मतका समर्थन करते हैं। जब गीताका अस्तित्व बुद्ध धर्मीय महायान-पंथसे पहलेका निश्चित हो गया; तब अनुमान किया जा सकता है, कि उसके साथ महाभारतभी रहा होगा। बौद्ध-ग्रंथोंमें कहा गया है, कि बुद्धकी मृत्युके पश्चात् शीघ्रही उनके मतोंका संग्रह कर लिया गया; परंतु इससे वर्तमान समयमें पाये जानेवाले अत्यंत प्राचीन बौद्ध-ग्रंथोंकाभी उसी समयमें रचा जाना सिद्ध नहीं होता। महापरिनिव्वाणसुत्तको वर्तमान बौद्ध-ग्रंथोंमे प्राचीन मानते हैं। परंतु उसमें पाटलिपुत्र शहरके विषयमें जो उल्लेख है, उससे प्रोफेसर ऱ्हिस्डेविड्स्ने दिखलाया है, कि यह ग्रंथ बुद्धका निर्वाण हो चुकनेपर कम-से-कम सौ वर्ष पहले तैयार न किया गया होगा और बुद्धके अनंतर सौ वर्ष बीतनेपर बौद्ध- धर्मीय भिक्षुओंकी जो दूसरी परिषद् हुई थी, उसका वर्णन विनयपिटकमें चुल्लवग्ग ग्रंथके अंतमें है। इससे विदित होता है,† कि लंकाद्वीपके पाली भाषामें लिखे हुए विनयपिटकादि प्राचीन बौद्ध-ग्रंथ इस परिषदके हो चुकनेपर रचे गये हैं। इस विषयमें बौद्ध ग्रंथकारोंनेहीने कहा है, कि अशोकके पुत्र महेंद्रने ईसाकी सदीमे लगभग २४१ वर्ष पहले जब प्रथम सिंहलद्वीपमें बौद्ध धर्मका प्रचार करना आरंभ किया, तब ये ग्रंथभी वहाँ पहुँचाये गये, और फिर कोई डेढ़ सौ वर्षके बाद ये यहाँ पहले पहल पुस्तकके रूपमें लिखे गये। यदि मान लें, कि इन ग्रंथोंको मुखाग्र रट डालनेकी चाल थी, इसलिये महेंद्रके समयसे उनमें कुछ भी फेरफार न किया गया होगा, तोभी यह कैसे कहा जा सकता है, कि बुद्धके निर्वाणके पश्चात् ये ग्रंथ जब पहले पहल तैयार किये गये, तब अथवा आगे महेंद्र या अशोक-कालतक, तत्कालीन प्रचलित वैदिक-ग्रंथोंसे इनमें कुछभी नहीं लिया गया ? अतएव यदि महाभारत बुद्धके पश्चात्का हो तोभी अन्य प्रमाणोंसेभी उसका सिकंदर बादशाहसे पहलेका अर्थात् सन् ३२५ ईसवीसे पह- लेका होना सिद्ध है, इसलिये मनुस्मृतिके श्लोकोंके समानही महाभारतके श्लोकोंकाभी उन पुस्तकोंमें पाया जाना संभव है, कि जिनको महेंद्र सिंहलद्वीपमे ले गया था। सारांश, बुद्धकी मृत्युके पश्चात् उनके धर्मका प्रसार होते देखकर शीघ्रही प्राचीन वैदिक गाथाओं तथा कथाओंका महाभारतमें एकत्रित संग्रह किया गया है; और दिखाई देता है, कि उसके जो श्लोक बौद्ध-ग्रंथोंमें शब्दशः पाये जाते हैं, उनको बौद्ध-ग्रंथ- कारोने महाभारतसेही लिया है; न कि स्वयं महाभारतकारने बौद्ध-ग्रंथोंसे। परंतु यदि मान लिया जाय, कि बौद्ध ग्रंथकारोंने इन श्लोकोंको महाभारतमे नहीं लिया है; बल्कि उन पुराने वैदिक-ग्रंथोंसे लिया होगा, कि जो महाभारतकेभी आधार हैं, परंतु वर्तमान समयमें उपलब्ध नहीं हैं और इस कारण महाभारतके कालका निर्णय † See S. B. E. Vol. XI, Intro. pp. xv-xx and p. 58.