भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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५८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

उपर्युक्त श्लोक-समानतासे पूरा नहीं होता; तथापि नीचे लिखी हुई चार बातोंसे इतना तो निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है, कि बौद्ध धर्ममें महायान-पंथका प्रादुर्भाव होनेसे पहले केवल भागवत धर्मही प्रचलित न था; बल्कि उस समय भगवद्गीताभी सर्वमान्य हो चुकी थी और इसी गीताके आधारपर महायान-पंथ निकला है; एवं श्रीकृष्णप्रणीत गीताके तत्त्व बौद्ध धर्मसे नहीं लिये गये हैं। वे चार बातें इस प्रकार हैं: (१) केवल अनात्मवादी तथा संन्यास-प्रधान मूल बुद्ध धर्महीसे आगे चलकर क्रमशः स्वाभाविक रीतिसे भक्ति-प्रधान तथा प्रवृत्ति-प्रधान तत्त्वोंका निकलना संभव नहीं है। (२) महायान-पंथकी उत्पत्तिके विषयमें स्वयं बौद्ध ग्रंथकारोंने श्रीकृष्णके नामका स्पष्टतया निर्देश किया है। (३) गीताके भक्ति-प्रधान तथा प्रवृत्ति-प्रधान तत्त्वोंकी महायान-पंथके मतोंमें अर्थतः तथा शब्दशः समानता है। और (४) बौद्ध धर्मके साथ साथ तत्कालीन प्रचलित अन्यान्य जैन अथवा वैदिक पंथोंमें प्रवृत्ति-प्रधान भक्ति-मार्गका प्रचार न था। उपर्युक्त प्रमाणोंसे वर्तमान गीताका ऊपर जो काल निर्णीत हुआ है, वह इससे पूर्णतया मिलता-जुलता है।

भाग ७ - गीता और ईसाइयोंकी बाइबल

पिछले भागमें बतलाई हुई बातोंसे निश्चित हो गया, कि हिंदुस्थानमें भक्ति- प्रधान भागवत धर्मका उदय ईसासे लगभग १४ सौं वर्ष पहले हो चुका था; और ईसाके पहले प्रादुर्भूत मूल संन्यास-प्रधान बौद्ध धर्ममें प्रवृत्ति-प्रधान भक्ति-तत्त्वका प्रवेश, वह बौद्ध-ग्रंथकारोंकेही मतानुसार, श्रीकृष्णप्रणीत गीताहीके कारण हुआ है। गीताके बहुतेरे सिद्धान्त ईसाइयोंकी नई बाइबलमें दीख पड़ते हैं; बस, इसी बुनियाद- पर कई ईसाई ग्रंथोंमें यह प्रतिपादन रहता है, कि ये तत्त्व ईसाई धर्मसे गीतामें ले लिये गये होंगे; और विशेषतः डॉक्टर लोरिनसरने गीताके उस जर्मन भाषानुवाद- में-कि जो सन् १८६९ ईसवीमें प्रकाशित हुआ था-जो कुछ प्रतिपादन किया है, उसका निर्मूलत्व अब आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है। लोरिनसरने अपनी पुस्तकके (अर्थात् गीताके जर्मन अनुवादके) अंतमें भगवद्गीता और बाइबल - विशेष- कर नई बाइबल-के शब्द-सादृश्यके कोई एक सौ से अधिक स्थल बतलाये हैं; और उनमेंसे कुछ तो विलक्षण एवं ध्यान देने योग्यभी हैं। एक उदाहरण लीजिये - "उस दिन तुम जानोगे, कि मैं अपने पितामें, तुम मुझमें और मैं तुममें हूँ" (जान. १४. २०), यह वाक्य गीताके नीचे लिखे हुए वाक्योंमे समानार्थकही नहीं है, प्रत्युत शब्दशःभी एक-ही है:- "येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि" (गीता ४.३५); और "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति" (गीता ६.३०)। उसी प्रकार जानका आगेका यह वाक्यभी "जो मुझमे प्रेम करता है, उससे मैं प्रेम करता हूँ" (गीता १४. २१), गीताके "प्रियोहि ज्ञानिनोऽत्यर्थं अहं स च मम प्रियः" (गीता ७.१७) इस वाक्यके बिलकुलही सदृश है। इन वाक्यों तथा