श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५८७ इन्हींसे मिलते-जुलते दूसरे अनेक सदृश वाक्योंकी बुनियादपर डॉक्टर लारिनसरने अनुमान करके कह दिया है, कि गीताकार बाइबलसे परिचित थे; और ईसाके लगभग पाँच सौ वर्षोंके पीछे गीता बनी होगी । डॉ. लारिनसरकी पुस्तकके इस भागका अंग्रेजी अनुवाद 'इंडियन एंटिक्वेरी 'की दूसरी पुस्तकमें उस समय प्रकाशित हुआ था; और परलोकवासी तेलंगने भगवद्गीताका जो पद्यात्मक अंग्रेजी अनुवाद किया है, उसकी प्रस्तावनामें उन्होंने लारिनसरके उक्त मतका पूर्णतया खंडन किया है।* डॉ. लारिनसर पश्चिमी संस्कृतज्ञ पंडितोंमें नहीं लेखे जाते थे; और संस्कृतकी अपेक्षा उनका ईसाई धर्मका ज्ञान तथा अभिमान कहीं अधिक था। अतएव उनके मत न केवल परलोकवासी तेलंगहीको, किंतु मैक्समूलर प्रभृति मुख्य मुख्य पश्चिमी संस्कृत पंडितोंकोभी अग्राह्य हो गये थे । बेचारे लारिनसर को यह कल्पनाभी न हुई होगी, कि ज्योंही एक बार गीताका समय ईसासे प्रथम निस्संदिग्ध निश्चित हो गया, त्योंही गीता और बाइबलके जो सैकड़ों अर्थ-सादृश्य और शब्द-सादृश्य मैं दिखला रहा हूँ, वे भूतोंके समान उलटे मेरेही गलेसे आ लिपटेंगे ! परंतु इसमें संदेह नहीं, कि जो बात कभी स्वप्नमेंभी नहीं दीख पड़ती, वही कभी कभी आँखोंके सामने नाचने लगती है; और सचमुच देखा जाय, तो अब डॉक्टर लारिनसरको उत्तर देनेकीभी कोई आवश्यकताही नहीं है। तथापि कुछ बड़े बड़े अंग्रेजी ग्रंथोंमें अभीतक इसी असत्य मतका उल्लेख दीख पड़ता है, इसलिये यहाँपर उस अर्वाचीन खोजके परि- णामका संक्षेपमें दिग्दर्शन करा देना आवश्यक प्रतीत होता है, कि जो इस विषयमें निष्पन्न हुआ है। पहले यह ध्यानमें रखना चाहिये, कि जब किन्हीं दो ग्रंथोंके सिद्धान्त एक-से होते हैं, तब केवल इन सिद्धान्तोंकी समानताहीके भरोसे यह निश्चय नहीं किया जा सकता, कि अमुक ग्रंथ पहले रचा गया है, और अमुक पीछे। क्योंकि यहांपर ये दोनों बातें संभव हैं, ( १ ) इन दोनों ग्रंथोंमेंसे पहले ग्रंथके विचार दूसरे ग्रंथमे लिये गये होंगे; अथवा ( २ ) दूसरे ग्रंथके विचार पहलेसे । अतएव पहले जब दोनों ग्रंथोंके कालका स्वतंत्र रीतिसे निश्चय कर लिया जाय, तब फिर विचार- सादृश्यसे यह निर्णय करना चाहिये, कि अमुक ग्रंथकारने अमुक ग्रंथसे अमुक विचार लिये हैं। इसके सिवा, दो भिन्न भिन्न देशोंके दो ग्रंथकारोंको एकहीसे विचारोंका एकही समयमें, अथवा कभी आगे-पीछेभी, स्वतंत्र रीतिसे सूझ पड़ना कोई बिलकुल अशक्य बात नहीं है, इसलिये उन दोनों ग्रंथोंकी समानताको जाँचते समय यह विचारभी करना पड़ता है, कि वह समानता स्वतंत्र रीतिसे आविर्भूत होनेके योग्य हैं या नहीं? और जिन दो देशोंमें ये ग्रंथ निर्मित हुए हों, उनमें उस समय कुछ
- See Bhagavadgita translated into English Blank Verse with Notes &c. by K. T. Telang, 1875 ( Bombay ). This book is different from the translation in the S. B. series.