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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 633, कुल 956 में से

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५८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

आवागमन होकर एक देशके विचारोंका दूसरे देशमें पहुँचना संभव था या नही ? इस प्रकार चारों ओरसे विचार करनेपर दीख पड़ता है, कि ईसाई धर्मसे किसीभी बातका गीतामें लिया जाना संभवही नहीं था; बल्कि गीताके तत्त्वोंके समान जो कुछ तत्त्व ईसाईयोंकी बाइबलमें पाये जाते हैं, उन तत्त्वोंको ईसाने अथवा उसके शिष्योंने बहुत करके बौद्ध धर्मसे – अर्थात् पर्यायमे गीता या वैदिक धर्महीसे – बाइबलमें ले लिया होगा; और अब इस बातको कुछ पश्चिमी पंडित लोग स्पष्ट रूपसे कहनेभी लग गये हैं। इस प्रकार तराजूका फिरा हुआ पलड़ा देखकर ईसाके कट्टर भक्तोंको आश्चर्य होगा; और यदि उनके मनका झुकाव इस बातको स्वीकृत न करनेकी ओर हो जाय, तो कोई आश्चर्य नहीं है। परंतु ऐसे लोगोंसे हमें इतनाही कहना है, कि यह प्रश्न धार्मिक नहीं है – ऐतिहासिक है, इसलिये इतिहासकी सार्व- कालिक पद्धतिके अनुसार हालमें उपलब्ध हुई बातोंपर शांतिपूर्वक विचार करना आवश्यक है, और फिर उससे निकलनेवाले अनुमानोंको सभी लोग – और विशेषतः वे लोग, कि जिन्होंने यह विचार सादृश्यका प्रश्न प्रथम उपस्थित किया है – आनंद- पूर्वक तथा पक्षपात-रहित बुद्धिसे ग्रहण करें; यही न्याय्य तथा युक्तिसंगत है। नई बाइबलका ईसाई धर्म, यहूदी बाइबल अर्थात् प्राचीन बाइबलमें प्रति- पादित प्राचीन यहूदी धर्मका सुधरा हुआ रूपांतर है। यहूदी भाषामें ईश्वरको 'इलोहा' (अरबीमें 'इलाह') कहते हैं – परंतु मोजेसने जो नियम बना दिये हैं, उनके अनुसार यहूदी धर्मके मुख्य उपास्य देवताकी विशेष संज्ञा 'जिहोव्हा' है। पश्चिमी पंडितोंनेही अब निश्चय किया है, कि यह 'जिहोव्हा' शब्द असलमें यहूदी नहीं है; किंतु खाल्डी भाषाके 'यव्हे' (संस्कृत यह्व) शब्दसे निकला है। यहूदी लोग मूर्ति- पूजक नहीं हैं। उनके धर्मका मुख्य आचार यह है, कि अग्निमें पशु या अन्य वस्तुओंका हवन करें; ईश्वरके बतलाये हुए नियमोंका पालन करके जिहोव्हाको सतुष्ट करें; और उसके द्वारा इस लोकमें अपना तथा अपनी जातिका कल्याण प्राप्त करें। अर्थात् संक्षेपमें कहा जा सकता है, कि वैदिक धर्मीय कर्मकांडके समान यहूदी धर्मभी यज्ञमय तथा प्रवृत्ति-प्रधान है। उसके विरुद्ध ईसाका अनेक स्थानोंपर उपदेश है, कि "मुझे (हिंसाकारक) यज्ञ नहीं चाहिये, मै (ईश्वरकी) कृपा चाहता हूँ" (मेथ्यू. ९. १३); "ईश्वर तथा द्रव्य, दोनोंको साध लेना संभव नही" (मेथ्यू. ६. २४); "जिसे अमृतत्वकी प्राप्ति कर लेनी हो, उसे स्त्री-बच्चे छोड़ करके मेरा भक्त होना चाहिये" (मेथ्यू. १९. २१); और जब ईसाने अपने शिष्योंको धर्मप्रचारार्थ देश-विदेशमें भेजा, तब संन्यास-धर्मके इन नियमोंका पालन करनेके लिये उनको उपदेश किया कि "तुम अपने पास सोना, चाँदी तथा बहुतसे वस्त्रप्रावरणभी न रखना" (मेथ्यू. १०. ९-१३)। यह सच है, कि अर्वाचीन ईसाई राष्ट्रोंने ईसाके इन सब उपदेशोंको लपेट कर ताकमें रख दिया है; परंतु जिस प्रकार आधुनिक शंकराचार्यके हाथी-घोड़े रखनेसे शांकर-संप्रदाय दरबारी नहीं

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