श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५८९ कहा जा सकता, उसी प्रकार अर्वाचीन ईसाई राष्ट्रोंके इस आचरणमे मूल ईसाई धर्मके विषयमेभी यह नही कहा जा सकता, कि वह धर्मभी प्रवृत्ति-प्रधान था। मूल वैदिक धर्मके कर्मकांडात्मक होनेपरभी जिस प्रकार उसमें आगे चल कर ज्ञानकांडका उदय हो गया, उसी प्रकार यहूदी तथा ईसाई धर्मका संबंध है। परंतु वैदिक कर्म- कांडमें धीरे धीरे, क्रमशः ज्ञानकांडकी और फिर भक्ति-प्रधान भागवत धर्मकी उत्पत्ति एवं वृद्धि सैकड़ों वर्षों तक होती रही है; किंतु यह बात ईसाई धर्ममें नहीं है। इतिहाससे पता चलता है, कि ईसाके अधिकसे अधिक लगभग दो सौ वर्ष पहले एसी या एसीन नामक संन्यासियोंका पंथ यहूदियोंके देशमें एकाएक आविर्भूत हुआ था। ये एसी लोग थे तो यहूदी धर्मकेही; परंतु हिंसात्मक यज्ञायागको छोड़कर ये अपना समय किसी शांत स्थानमें बैठे परमेश्वरके चितनमें बिताया करते थे; और उदरपोषणार्थ कुछ करना पड़ा, तो खेतीके समान निरुपद्रवी व्यवसाय किया करते थे। क्वाँरे रहना, मद्य-मांससे परहेज रखना, हिंसा न करना, शपथ न खाना, संघके साथ मठमें रहना और किसीको कुछ द्रव्य मिल जाय, तो उसे पूरे संघकी सामाजिक आमदनी समझना आदि, उनके पंथके मुख्य तत्त्व थे; और यदि कोई उस मंडलीमें प्रवेश करना चाहता था, तो उसे तीन वर्ष तक उम्मीदवारी करके फिर कुछ शर्ते मंजूर करनी पड़ती थीं - उनका प्रधान मठ मृत-समुद्रके पश्चिमी किनारे एंगदीमें था। वहीं पर वे संन्यास-वृत्तिसे शांतिपूर्वक रहा करते थे। स्वयं ईसाने तथा उसके शिष्योंने नई बाइबलमें एसी पंथके मतोंका जो मान्यतापूर्वक निर्देश किया है ( मेथ्यू. ५. ३४; १९. १२; जेम्स. ५. १२. कृत्य. ४. ३२-३५ ), उससे दीख पड़ता है, कि ईसाभी इसी पंथका अनुयायी था; और इस पंथके संन्यास-धर्मकाही उसने अधिक प्रचार किया है। यद्यपि ईसाके संन्यास-प्रधान भक्ति-मार्गकी परंपरा इस प्रकार एसी पंथकी परंपरासे मिला दी जावे, तोभी ऐतिहासिक दृष्टिसे इस बातकी कुछ- न-कुछ सयुक्तिक उपपत्ति बतलाना आवश्यक है, कि मूल कर्ममय यहुदी धर्मसे संन्यास-प्रधान एसी पंथका उदय कैसे हो गया? इस पर कुछ लोग कहते हैं; कि ईसा एसीन-पंथी नहीं था। अब जो इस बातको सच मान लें, तो यह प्रश्न नही टाला जा सकता, कि नई बाइबलमें जिस संन्यास-प्रधान धर्मका वर्णन किया गया है, उसका मूल क्या है? अथवा कर्म-प्रधान यहूदी धर्ममें उसका प्रादुर्भाव एकदम कैसे हो गया? इसमें भेद केवल इतनाही होता है, कि एसीन पंथकी उत्पत्तिवाले प्रश्नके बदले इस प्रश्नको हल करना पड़ता है। क्योंकि, अब समाजशास्त्रका यह मामूली सिद्धान्त निश्चित हो गया है, कि “कोईभी बात किसीभी स्थानमें एकदम उत्पन्न नहीं हो जाती, उसकी वृद्धि धीरे धीरे तथा बहुत दिन पहलेसे हुआ करती है; और जहाँ- पर इस प्रकारकी वृद्धि दीख नहीं पड़ती, वहाँपर वह बात प्रायः पराये देशों या पराये लोगोंसे ली हुई होती है।” प्राचीन ईसाई ग्रंथकारोंके ध्यानमें यह अड़चन आईही न हो, तो बात नही; परंतु यूरोपियन लोगोंको बौद्ध धर्मका ज्ञान होनेके पहले -