भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 635

अर्थात् अठारहवीं सदीतक - शोधक ईसाई विद्वानोंका यह मत था, कि यूनानी तथा यहुदी लोगोंका पारस्परिक निकट संबंध हो जानेपर यूनानियोंके - विशेषतः पायथा- गोरसके - तत्त्वज्ञानकी बदौलत कर्ममय यहुदी धर्ममें एसी लोगोंके संन्यास-मार्गका प्रादुर्भाव हुआ होगा। किंतु अर्वाचीन शोधोंसे यह सिद्धान्त सत्य नहीं माना जा सकता। इससे सिद्ध होता है, कि यज्ञमय यहुदी धर्महीमें एकाएक संन्यास-प्रधान एसी या ईसाई धर्मकी उत्पत्ति हो जाना स्वभावतः संभव नहीं था; और उसके लिये यहुदी धर्मसे बाहरका कोई न कोई अन्य कारण निमित्त हो चुका है - यह कल्पना नई नहीं है; किंतु ईसाकी अठारहवीं सदीसे पहलेके ईसाई पंडितोंकोभी वह मान्य हो चुकी थी। कोलब्रुक साहबने* कहा है, कि पायथागोरसके तत्त्वज्ञानके साथ बौद्ध धर्मके तत्त्वज्ञानकी कहीं अधिक समता है। अतएव यदि उपर्युक्त सिद्धान्त सच मान लिया जाय, तोभी कहा जा सकेगा, कि एसी-पंथका जनकत्व परंपरासे हिंदुस्थान- कोही मिलता है। परंतु इतनी आनाकानी करनेकीभी अब कोई आवश्यकता नहीं है। बौद्ध-ग्रंथोंके साथ नई बाइबलकी तुलना करनेपर स्पष्टही दीख पड़ता है, कि एसी या ईसाई धर्मकी पायथागोरियन मंडलियोंसे जितनी समता है, उससे कहीं अधिक और विलक्षण समता केवल एसी धर्मकीही नहीं; किंतु ईसाके चरित्र और ईसाके उपदेशकीभी बुद्धके धर्मसे है। जिस प्रकार ईसाको भ्रममें फँसानेका प्रयत्न शैतानने किया था; और जिस प्रकार सिद्धावस्था प्राप्त होनेके समय ईसाने ४० दिन उपवास किया था; उसी प्रकार बुद्ध-चरित्रमेंभी यह वर्णन है, कि बुद्धको मारका डर दिखलाकर मोहमें फँसानेका प्रयत्न किया गया था; और उस समय बुद्ध ४९ दिन ( सात सप्ताह ) तक निराहार रहा था। इसी प्रकार पूर्ण श्रद्धाके प्रभावसे पानीपर चलना, मुख तथा शरीरकी कांतिको एकदम सूर्य-सदृश बना लेना, अथवा शरणागत चोरों या वेश्याओंकोभी सद्गति देना इत्यादि बातेंभी बुद्ध और ईसा, दोनोंके चरित्रोंमें एकही-सी मिलती हैं; और ईसाके जो ऐसे मुख्य मुख्य नैतिक उपदेश हैं, कि “तू अपने पड़ोसियों या शत्रुओंमेंभी प्रेम कर,” वेभी ईसासे पहलेही मूल बुद्ध धर्ममें कहीं कहीं बिलकुल अक्षरशः आ चुके हैं। ऊपर बतलाही चुके हैं, कि भक्तिका तत्त्व मूल बुद्ध धर्ममें नहीं था; परंतु वहभी आगे चलकर, अर्थात् कम-से-कम ईसासे दो-तीन सदियोंसे पहलेही, महायान बौद्ध-पंथमें भगवद्गीतासे लिया जा चुका था। मि. आर्थर लिलीने अपनी पुस्तकमें आधारपूर्वक स्पष्ट करके दिखला दिया है, कि यह साम्य केवल इतनीही बातोंमें नहीं है; बल्कि इसके सिवा बौद्ध तथा ईसाई धर्म की अन्यान्य सैकड़ों छोटी-मोटी बातोंमें उक्त प्रकारकाही साम्य वर्तमान है। यही क्योंः सूलीपर चढ़ाकर ईसाका वध किया गया था; इसलिये ईसाई लोग जिस सूलीके चिन्हको पूज्य तथा पवित्र मानते हैं, उसी सूलीके चिन्हको 'स्वस्तिक' 卐

  • See Colebrooke's Miscellaneous Essays, Vol. I, pp. 399-400.