श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५७ मूल भारत — उसी समय रचे गये होंगे । किसीभी धर्म-ग्रंथका उदय होनेपर तुरंतही उस धर्मपर ग्रंथ रचे नहीं जाते; और भारत तथा गीताके विषयमेंभी यही न्याय पर्याप्त होता है । वर्तमान महाभारतके आरंभमें यह कथा है, कि जब भारतीय युद्ध समाप्त हो चुका; और जब पांडवोंका पोता ( पौत्र ) जनमेजय सर्प-सत्र कर रहा था, तब वहाँ वैशंपायनने जनमेजयको पहले पहल गीतासहित भारत सुनाया था; और आगे जब वही सौतीने शौनकको सुनाया, तभीसे भारत प्रचलित हुआ । यह बात प्रकट है, कि सौती आदि पौराणिकोंके मुखसे निकलकर आगे भारतको काव्यमय ग्रंथका स्थायी स्वरूप प्राप्त होनेमें कुछ समय अवश्य बीत गया होगा । परंतु इस कालका निर्णय करनेके लिये अब कोई साधन उपलब्ध नहीं है । ऐसी अवस्थामें यदि यह मान लिया जाए, कि भारतीय युद्धके लगभग पांच सौ वर्षके भीतरही आर्ष महाकाव्यात्मक मूल भारत निर्मित हुआ होगा, तो कुछ विशेष साहसकी बात नहीं होगी । क्योंकि बौद्ध धर्मके ग्रंथ, बुद्धकी मृत्युके बाद, इससेभी जल्दी तैयार हुए हैं । • अब आर्ष महाकाव्यमें नायकका केवल पराक्रम बतला देनेसेही काम नहीं चलता; किंतु उसमें यहभी बतलाना पड़ता है, कि नायक जो कुछ करता है, वह उचित है या अनुचित ! इतनाही क्यों ? संस्कृतके अतिरिक्त अन्य साहित्योंमें जो उक्त प्रकारके महाकाव्य हैं, उनसेभी यही ज्ञात होता है, कि नायकके कार्योंके गुण-दोषोंका विवेचन करना आर्ष महाकाव्यका एक प्रधान भाग होता है । अर्वाचीन दृष्टिसे देखा जाए, तो कहना पड़ेगा, कि नायकोंके कार्योंका समर्थन केवल नीतिशास्त्रके आधारपर करना चाहिये । किंतु प्राचीन समयमें धर्म तथा नीतिमे पृथक् भेद नहीं माना जाता था, अतएव उक्त समर्थनके लिए धर्म-दृष्टिके सिवा अन्य मार्ग नहीं था। फिर यह बतला- नेकी आवश्यकता नही, कि जो भागवत धर्म भारतके नायकोको ग्राह्य हुआ था अथवा जो उन्हीके द्वारा प्रवृत्त किया गया था, उसी भागवत धर्मके आधारपर उनके कार्योंका समर्थन करनाभी आवश्यक था । इसके सिवा दूसरा कारण यहभी है, कि भागवत धर्मके अतिरिक्त तत्कालीन प्रचलित अन्य वैदिक धर्मपंथ न्यूनाधिक रीतिमे अथवा सर्वथा निवृत्ति-प्रधान थे, इसलिये उनमें वर्णित-धर्मतत्त्वोंके आधारपर भारतके नायकोंकी वीरताका पूर्णतया समर्थन करना संभव नहीं था । अतएव कर्मयोग-प्रधान भागवत धर्मका निरूपण महाकाव्यात्मक मूल भारतहीमें करना आवश्यक था । यही मूल गीता है, और यदि भागवत धर्मके मूल स्वरूपका उपपत्तिसहित प्रतिपादन करनेवाला सबसे पहला ग्रंथ यह न भी हो; तो यह स्थूल अनुमान किया जा सकता है, कि यह आदि-ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है; और इसका काल ईसासे लगभग ९०० वर्ष पहले है । इस प्रकार गीता यदि भागवत धर्म-प्रधान पहला ग्रंथ न हो, तोभी वह मुख्य ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है, इसलिये इस बातका दिग्दर्शन करना आवश्यक था, कि उसमें प्रतिपादित निष्काम कर्मयोग तत्कालीन प्रचलित अन्य धर्म-पंथोंसे — अर्थात् कर्मकांडसे, औपनिषदिक ज्ञानसे, सांख्यसे, चित्तनिरोधरूपी योगसे तथा भक्तिसेभी —