श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र काम निष्काम बुद्धिसे किया करने थे; और महाभारत (मभा. उद्यो. ४८. २१, २२) में कहा है कि सब योगोंको उनके समान कर्म करनाही उचित है। नारायणीय आख्यानमें तो भागवत धर्मका लक्षण स्पष्ट बतलाया है, कि "प्रवृत्ति- लक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः" (मभा. शां. ३४७. ८१) - नारायणीय अथवा भागवत धर्म प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान है। नारायणीय या मूल भागवत धर्मका जो निष्काम प्रवृत्ति-तत्त्व है, उसीका नाम नैष्कर्म्य है, और यही मूल भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व है। परंतु, भागवत-पुराणसे यह बात दीख पड़ती है; कि आगे कालांतरमें यह तत्त्व मंद होने लगा और इस धर्ममें तो वैराग्य-प्रधान वासुदेव-भक्ति श्रेष्ठ मानी जाने लगी। नारद-पंचरात्रमें भक्तिके साथ साथ मंत्रतंत्रोंकाभी समावेश भागवत धर्ममें कर दिया गया है। तथापि, भागवतहीमे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि ये सब इस धर्मके मूल स्वरूप नहीं हैं। क्योंकि, भागवत (भाग. १. ३. ८; ११. ४. ४६) मेंही यह कहा है, कि जहाँ नारायणीय अथवा सात्वत-धर्मके विषयमें कुछ कहनेका मौका आया है, वहाँ सात्वत-धर्म या नारायण ऋषिका धर्म (अर्थात् भागवत धर्म) 'नैष्कर्म्यलक्षण' है; और आगे यहभी कहा है, कि इस नैष्कर्म्य-धर्ममें भक्तिको उचित महत्त्व नहीं दिया गया था, इसलिये भक्ति-प्रधान भागवत-पुराण कहना पड़ा (भाग. १. ५. १२)। इससे यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है, कि मूल भागवत धर्म नैष्कर्म्य-प्रधान अर्थात् निष्काम कर्म-प्रधान था; किंतु आगे समयके हेरफेरसे उसका स्वरूप बदलकर वह भक्ति-प्रधान हो गया। गीतारहस्यमें ऐसी ऐतिहासिक बातोंका विवेचन पहलेही हो चुका है, कि ज्ञान तथा भक्तिसे पराक्रमका सदैव संबंध रखनेवाले मूल भागवत धर्ममें और आश्रम-व्यवस्थारूपी स्मार्त-मार्गमें क्या भेद है? केवल संन्यास-प्रधान जैन और बौद्ध धर्मके प्रसारसे भागवत धर्मके कर्मयोगकी अवनति होकर उसे दूसराही स्वरूप अर्थात् वैराग्ययुक्त भक्ति-स्वरूप कैसे प्राप्त हुआ? और बौद्ध धर्मका ह्रास होनेके बाद जो वैदिक संप्रदाय प्रवृत्त हुए; उनमेंसे कुछने तो अंतमें भगवद्गीताहीको संन्यास-प्रधान, कुछने केवल भक्ति- प्रधान तथा कुछने विशिष्टाद्वैत-प्रधान स्वरूप कैसे दे दिया। उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचनसे यह बात समझमें आ जाएगी, कि वैदिक धर्मके सनातन प्रवाहमें भागवत धर्मका उदय कब हुआ? और पहले उसके प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान रहनेपरभी आगे चलकर भक्ति-प्रधान स्वरूप एवं अंतमें रामानुजा- चार्यके समय विशिष्टाद्वैती स्वरूप कैसे प्राप्त हो गया। भागवत धर्मके इन भिन्न भिन्न स्वरूपोंमेंसे जो मूलारंभका अर्थात निष्काम कर्म-प्रधान स्वरूप है, वही गीता-धर्मका स्वरूप है। अब यहाँपर संक्षेपमें यह बतलाया जाएगा, कि उक्त प्रकारकी मूल गीताके कालके विषयमें क्या अनुमान किया जा सकता है? श्रीकृष्ण तथा भारतीय युद्धका काल यद्यपि एकही है, अर्थात सन ईसवीके पहले लगभग १४०० वर्ष है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता, कि भागवत धर्मके ये दोनों प्रधान ग्रंथ - मूल गीता तथा