भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५५ लेकर) ये सब (शास्त्र) परस्पर एक दूसरेके अंग हैं (मभा. शां. ३४८. ८२)। 'पाञ्चरात्र' शब्दकी यह निरुक्ति व्याकरणकी दृष्टिसे चाहे शुद्ध न हो, तथापि उससे यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि सब प्रकारके ज्ञानकी एकवाक्यता भागवत धर्ममें आरम्भहीसेकी गई थी। परंतु भक्तिके साथ अन्य सब धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनाही भागवत धर्मकी प्रधान विशेषता नहीं है। यह नहीं, कि भक्तिके धर्मतत्त्वको पहले भागवत धर्महीने प्रवृत्त किया हो। ऊपर दिये हुए मैत्र्युपनिषदके (मैत्र्यु. ३. ३) वाक्यों से यह बात प्रकट है, कि रुद्रकी या विष्णुकी किसी न किसी स्वरूपकी भक्ति, भागवत धर्मका उदय होनेके पहलेही जारी हो चुकी थी; और यह भावनाभी पहलेही उत्पन्न हो चुकी थी, कि उपास्य कुछभी हो; वह ब्रह्महीका प्रतीक अथवा एक प्रकारका रूप है। यह सच है, कि रुद्र आदि उपास्योंके बदले भागवत धर्ममें वासुदेव उपास्य माना गया है; परंतु गीता तथा नारायणीयोपाख्यानमेंभी यह कहा है, कि भक्ति चाहे जिसकी की जाय; वह एक भगवान्‌हीके प्रति पहुँचती है; रुद्र और भगवान् भिन्न भिन्न नहीं हैं, (गीता ९. २३; मभा. शा. ३४१. २०-२६)। अतएव केवल वासुदेवभक्तिही भागवत धर्मका मुख्य लक्षण नहीं मानी जा सकती। जिस सात्वत-जातिमें भागवत धर्म प्रादुर्भूत हुआ, उस जातिके सात्यकि आदि पुरुष, परम भगवद्भक्त भीष्म और अर्जुन, तथा स्वयं श्रीकृष्णभी बड़े पराक्रमी एवं दूसरोंसे पराक्रमके कार्य करानेवाले हो गये हैं। अतएव अन्य भगवद्भक्तोंकोभी उचित था, कि वे इसी आदर्शको अपने सम्मुख रखें; और तत्कालीन प्रचलित चातुर्वर्ण्यके अनुसार युद्ध आदि सब व्यावहारिक कर्म करें - बस, यही मूल भागवत धर्मका मुख्य विषय था। यह बात नहीं, कि भक्तिके तत्त्वको स्वीकार करके वैराग्ययुक्त बुद्धिसे संसारका त्याग करनेवाले पुरुष उस समय बिलकुल ही न होंगे। परंतु, यह सात्वतोंके या श्रीकृष्णके भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व नहीं है। श्रीकृष्णजीके उपदेशका सार यही है, कि भक्तिसे परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपर भगवद्भक्तको परमेश्वरके समान जगत्‌के धारण-पोषणके लिये सदा यत्न करते रहना चाहिये। उपनिषत्कालमें जनक आदिकोंनेभी यह निश्चित कर दिया था, कि ब्रह्मज्ञानी पुरुषके लियेभी निष्काम कर्म करना कोई अनुचित बात नहीं। परंतु उस समय उसमें भक्तिका समावेश नहीं किया गया था; और इसके सिवा ज्ञानोत्तर कर्म करना अथवा न करना हर एककी इच्छापर अवलंबित था - अर्थात् वैकल्पिक समझा जाता था (वे. सू. ३. ४. १५)। वैदिक धर्मके इतिहासमें भागवत धर्मने जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्मार्त-धर्मसे विभिन्न कार्य किया, वह यह है कि उस (भागवत धर्म) ने कुछ कदम आगे बढ़कर केवल निवृत्तिकी अपेक्षा निष्काम कर्म-प्रधान प्रवृत्ति-मार्ग (नैष्कर्म्य) को अधिक श्रेयस्कर ठहराया; और केवल ज्ञानसेही नहीं, किंतु भक्तिसेभी कर्मका उचित मेल कर दिया। इस धर्मके मूल प्रवर्तक नर और नारायण ऋषिभी इसी प्रकार सब