श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५५ लेकर) ये सब (शास्त्र) परस्पर एक दूसरेके अंग हैं (मभा. शां. ३४८. ८२)। 'पाञ्चरात्र' शब्दकी यह निरुक्ति व्याकरणकी दृष्टिसे चाहे शुद्ध न हो, तथापि उससे यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि सब प्रकारके ज्ञानकी एकवाक्यता भागवत धर्ममें आरम्भहीसेकी गई थी। परंतु भक्तिके साथ अन्य सब धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनाही भागवत धर्मकी प्रधान विशेषता नहीं है। यह नहीं, कि भक्तिके धर्मतत्त्वको पहले भागवत धर्महीने प्रवृत्त किया हो। ऊपर दिये हुए मैत्र्युपनिषदके (मैत्र्यु. ३. ३) वाक्यों से यह बात प्रकट है, कि रुद्रकी या विष्णुकी किसी न किसी स्वरूपकी भक्ति, भागवत धर्मका उदय होनेके पहलेही जारी हो चुकी थी; और यह भावनाभी पहलेही उत्पन्न हो चुकी थी, कि उपास्य कुछभी हो; वह ब्रह्महीका प्रतीक अथवा एक प्रकारका रूप है। यह सच है, कि रुद्र आदि उपास्योंके बदले भागवत धर्ममें वासुदेव उपास्य माना गया है; परंतु गीता तथा नारायणीयोपाख्यानमेंभी यह कहा है, कि भक्ति चाहे जिसकी की जाय; वह एक भगवान्हीके प्रति पहुँचती है; रुद्र और भगवान् भिन्न भिन्न नहीं हैं, (गीता ९. २३; मभा. शा. ३४१. २०-२६)। अतएव केवल वासुदेवभक्तिही भागवत धर्मका मुख्य लक्षण नहीं मानी जा सकती। जिस सात्वत-जातिमें भागवत धर्म प्रादुर्भूत हुआ, उस जातिके सात्यकि आदि पुरुष, परम भगवद्भक्त भीष्म और अर्जुन, तथा स्वयं श्रीकृष्णभी बड़े पराक्रमी एवं दूसरोंसे पराक्रमके कार्य करानेवाले हो गये हैं। अतएव अन्य भगवद्भक्तोंकोभी उचित था, कि वे इसी आदर्शको अपने सम्मुख रखें; और तत्कालीन प्रचलित चातुर्वर्ण्यके अनुसार युद्ध आदि सब व्यावहारिक कर्म करें - बस, यही मूल भागवत धर्मका मुख्य विषय था। यह बात नहीं, कि भक्तिके तत्त्वको स्वीकार करके वैराग्ययुक्त बुद्धिसे संसारका त्याग करनेवाले पुरुष उस समय बिलकुल ही न होंगे। परंतु, यह सात्वतोंके या श्रीकृष्णके भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व नहीं है। श्रीकृष्णजीके उपदेशका सार यही है, कि भक्तिसे परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपर भगवद्भक्तको परमेश्वरके समान जगत्के धारण-पोषणके लिये सदा यत्न करते रहना चाहिये। उपनिषत्कालमें जनक आदिकोंनेभी यह निश्चित कर दिया था, कि ब्रह्मज्ञानी पुरुषके लियेभी निष्काम कर्म करना कोई अनुचित बात नहीं। परंतु उस समय उसमें भक्तिका समावेश नहीं किया गया था; और इसके सिवा ज्ञानोत्तर कर्म करना अथवा न करना हर एककी इच्छापर अवलंबित था - अर्थात् वैकल्पिक समझा जाता था (वे. सू. ३. ४. १५)। वैदिक धर्मके इतिहासमें भागवत धर्मने जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्मार्त-धर्मसे विभिन्न कार्य किया, वह यह है कि उस (भागवत धर्म) ने कुछ कदम आगे बढ़कर केवल निवृत्तिकी अपेक्षा निष्काम कर्म-प्रधान प्रवृत्ति-मार्ग (नैष्कर्म्य) को अधिक श्रेयस्कर ठहराया; और केवल ज्ञानसेही नहीं, किंतु भक्तिसेभी कर्मका उचित मेल कर दिया। इस धर्मके मूल प्रवर्तक नर और नारायण ऋषिभी इसी प्रकार सब
५५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र काम निष्काम बुद्धिसे किया करने थे; और महाभारत (मभा. उद्यो. ४८. २१, २२) में कहा है कि सब योगोंको उनके समान कर्म करनाही उचित है। नारायणीय आख्यानमें तो भागवत धर्मका लक्षण स्पष्ट बतलाया है, कि "प्रवृत्ति- लक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः" (मभा. शां. ३४७. ८१) - नारायणीय अथवा भागवत धर्म प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान है। नारायणीय या मूल भागवत धर्मका जो निष्काम प्रवृत्ति-तत्त्व है, उसीका नाम नैष्कर्म्य है, और यही मूल भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व है। परंतु, भागवत-पुराणसे यह बात दीख पड़ती है; कि आगे कालांतरमें यह तत्त्व मंद होने लगा और इस धर्ममें तो वैराग्य-प्रधान वासुदेव-भक्ति श्रेष्ठ मानी जाने लगी। नारद-पंचरात्रमें भक्तिके साथ साथ मंत्रतंत्रोंकाभी समावेश भागवत धर्ममें कर दिया गया है। तथापि, भागवतहीमे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि ये सब इस धर्मके मूल स्वरूप नहीं हैं। क्योंकि, भागवत (भाग. १. ३. ८; ११. ४. ४६) मेंही यह कहा है, कि जहाँ नारायणीय अथवा सात्वत-धर्मके विषयमें कुछ कहनेका मौका आया है, वहाँ सात्वत-धर्म या नारायण ऋषिका धर्म (अर्थात् भागवत धर्म) 'नैष्कर्म्यलक्षण' है; और आगे यहभी कहा है, कि इस नैष्कर्म्य-धर्ममें भक्तिको उचित महत्त्व नहीं दिया गया था, इसलिये भक्ति-प्रधान भागवत-पुराण कहना पड़ा (भाग. १. ५. १२)। इससे यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है, कि मूल भागवत धर्म नैष्कर्म्य-प्रधान अर्थात् निष्काम कर्म-प्रधान था; किंतु आगे समयके हेरफेरसे उसका स्वरूप बदलकर वह भक्ति-प्रधान हो गया। गीतारहस्यमें ऐसी ऐतिहासिक बातोंका विवेचन पहलेही हो चुका है, कि ज्ञान तथा भक्तिसे पराक्रमका सदैव संबंध रखनेवाले मूल भागवत धर्ममें और आश्रम-व्यवस्थारूपी स्मार्त-मार्गमें क्या भेद है? केवल संन्यास-प्रधान जैन और बौद्ध धर्मके प्रसारसे भागवत धर्मके कर्मयोगकी अवनति होकर उसे दूसराही स्वरूप अर्थात् वैराग्ययुक्त भक्ति-स्वरूप कैसे प्राप्त हुआ? और बौद्ध धर्मका ह्रास होनेके बाद जो वैदिक संप्रदाय प्रवृत्त हुए; उनमेंसे कुछने तो अंतमें भगवद्गीताहीको संन्यास-प्रधान, कुछने केवल भक्ति- प्रधान तथा कुछने विशिष्टाद्वैत-प्रधान स्वरूप कैसे दे दिया। उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचनसे यह बात समझमें आ जाएगी, कि वैदिक धर्मके सनातन प्रवाहमें भागवत धर्मका उदय कब हुआ? और पहले उसके प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान रहनेपरभी आगे चलकर भक्ति-प्रधान स्वरूप एवं अंतमें रामानुजा- चार्यके समय विशिष्टाद्वैती स्वरूप कैसे प्राप्त हो गया। भागवत धर्मके इन भिन्न भिन्न स्वरूपोंमेंसे जो मूलारंभका अर्थात निष्काम कर्म-प्रधान स्वरूप है, वही गीता-धर्मका स्वरूप है। अब यहाँपर संक्षेपमें यह बतलाया जाएगा, कि उक्त प्रकारकी मूल गीताके कालके विषयमें क्या अनुमान किया जा सकता है? श्रीकृष्ण तथा भारतीय युद्धका काल यद्यपि एकही है, अर्थात सन ईसवीके पहले लगभग १४०० वर्ष है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता, कि भागवत धर्मके ये दोनों प्रधान ग्रंथ - मूल गीता तथा
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५७ मूल भारत — उसी समय रचे गये होंगे । किसीभी धर्म-ग्रंथका उदय होनेपर तुरंतही उस धर्मपर ग्रंथ रचे नहीं जाते; और भारत तथा गीताके विषयमेंभी यही न्याय पर्याप्त होता है । वर्तमान महाभारतके आरंभमें यह कथा है, कि जब भारतीय युद्ध समाप्त हो चुका; और जब पांडवोंका पोता ( पौत्र ) जनमेजय सर्प-सत्र कर रहा था, तब वहाँ वैशंपायनने जनमेजयको पहले पहल गीतासहित भारत सुनाया था; और आगे जब वही सौतीने शौनकको सुनाया, तभीसे भारत प्रचलित हुआ । यह बात प्रकट है, कि सौती आदि पौराणिकोंके मुखसे निकलकर आगे भारतको काव्यमय ग्रंथका स्थायी स्वरूप प्राप्त होनेमें कुछ समय अवश्य बीत गया होगा । परंतु इस कालका निर्णय करनेके लिये अब कोई साधन उपलब्ध नहीं है । ऐसी अवस्थामें यदि यह मान लिया जाए, कि भारतीय युद्धके लगभग पांच सौ वर्षके भीतरही आर्ष महाकाव्यात्मक मूल भारत निर्मित हुआ होगा, तो कुछ विशेष साहसकी बात नहीं होगी । क्योंकि बौद्ध धर्मके ग्रंथ, बुद्धकी मृत्युके बाद, इससेभी जल्दी तैयार हुए हैं । • अब आर्ष महाकाव्यमें नायकका केवल पराक्रम बतला देनेसेही काम नहीं चलता; किंतु उसमें यहभी बतलाना पड़ता है, कि नायक जो कुछ करता है, वह उचित है या अनुचित ! इतनाही क्यों ? संस्कृतके अतिरिक्त अन्य साहित्योंमें जो उक्त प्रकारके महाकाव्य हैं, उनसेभी यही ज्ञात होता है, कि नायकके कार्योंके गुण-दोषोंका विवेचन करना आर्ष महाकाव्यका एक प्रधान भाग होता है । अर्वाचीन दृष्टिसे देखा जाए, तो कहना पड़ेगा, कि नायकोंके कार्योंका समर्थन केवल नीतिशास्त्रके आधारपर करना चाहिये । किंतु प्राचीन समयमें धर्म तथा नीतिमे पृथक् भेद नहीं माना जाता था, अतएव उक्त समर्थनके लिए धर्म-दृष्टिके सिवा अन्य मार्ग नहीं था। फिर यह बतला- नेकी आवश्यकता नही, कि जो भागवत धर्म भारतके नायकोको ग्राह्य हुआ था अथवा जो उन्हीके द्वारा प्रवृत्त किया गया था, उसी भागवत धर्मके आधारपर उनके कार्योंका समर्थन करनाभी आवश्यक था । इसके सिवा दूसरा कारण यहभी है, कि भागवत धर्मके अतिरिक्त तत्कालीन प्रचलित अन्य वैदिक धर्मपंथ न्यूनाधिक रीतिमे अथवा सर्वथा निवृत्ति-प्रधान थे, इसलिये उनमें वर्णित-धर्मतत्त्वोंके आधारपर भारतके नायकोंकी वीरताका पूर्णतया समर्थन करना संभव नहीं था । अतएव कर्मयोग-प्रधान भागवत धर्मका निरूपण महाकाव्यात्मक मूल भारतहीमें करना आवश्यक था । यही मूल गीता है, और यदि भागवत धर्मके मूल स्वरूपका उपपत्तिसहित प्रतिपादन करनेवाला सबसे पहला ग्रंथ यह न भी हो; तो यह स्थूल अनुमान किया जा सकता है, कि यह आदि-ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है; और इसका काल ईसासे लगभग ९०० वर्ष पहले है । इस प्रकार गीता यदि भागवत धर्म-प्रधान पहला ग्रंथ न हो, तोभी वह मुख्य ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है, इसलिये इस बातका दिग्दर्शन करना आवश्यक था, कि उसमें प्रतिपादित निष्काम कर्मयोग तत्कालीन प्रचलित अन्य धर्म-पंथोंसे — अर्थात् कर्मकांडसे, औपनिषदिक ज्ञानसे, सांख्यसे, चित्तनिरोधरूपी योगसे तथा भक्तिसेभी —
५५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अविरुद्ध है; इतनाही नहीं, किंतु यही इस ग्रंथका मुख्य प्रयोजनभी कहा जा सकता है। नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछेसे बने हैं, इसलिये उनका प्रतिपादन मूल गीतामें नहीं आ सकता और यही कारण है, कि कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वेदान्त विषय गीतामें पीछेसे मिला दिया गया है। परंतु नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछे भलेही बने हों; किंतु इसमें कोई संदेह नहीं, कि इन शास्त्रोंके प्रतिपाद्य विषय बहुत प्राचीन हैं, और इस बातका उल्लेख हम ऊपर करही आये हैं। अतएव मूल गीतामें इन विषयोंका प्रवेश होना काल-दृष्टिसे किसी प्रकार विपरीत नही कहा जा सकता। तथापि हम यहभी नहीं कहते, कि जब मूल भारतका महाभारत बनाया गया होगा, तब मूल गीतामे कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ होगा। किसीभी धर्म-पंथको लीजिये: उसके इतिहासमे तो यही बात प्रकट होती है, कि उसमें समय-समयपर मतभेद होकर अनेक उपपंथ निर्माण हो जाया करते है। यही बात भागवत धर्मके विषयमेंभी कही जा सकती है। नारायणीयाख्यानमें (मभा. शा. ३४८. ५३ ) यह बात स्पष्ट रूप कह दी गई है, कि भागवत धर्मको कुछ लोग तो चतुर्व्यूह - अर्थात् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, इस प्रकार चार व्यूहोका मानते हैं; और कुछ लोग त्रिव्यूह, द्विव्यूह या एकव्यूहही मानते है। आगे चलकर, ऐसेही औरभी अनेक मतभेद उपस्थित हुए होंगे। इसी प्रकार औपनिषदिक और सांख्यज्ञानकीभी वृद्धि हो रही थी। अतएव इस बातकी सावधानी रखना अस्वाभाविक या मूल गीताके हेतुके विरुद्धभी नहीं था, कि मूल गीतामें जो कुछ विभिन्नता हो, वह दूर हो जावे; और बढ़ते हुए पिंडब्रह्मांडज्ञानसे भागवत धर्मका पूर्णतया मेल हो जावे। हमने पहले 'गीता और ब्रह्मसूत्र' शीर्षक लेखमें यह बतला दिया है, कि इसी कारणमे वर्तमान गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख पाया जाता है। इसके सिवा, उक्त प्रकारके अन्य परिवर्तनभी मूल गीतामें हो गये होंगे। परंतु मूल गीता-ग्रंथमें ऐसे अनेक परि- वर्तनोंका होनाभी संभव नही था। वर्तमान समयमें गीताकी जो प्रामाणिकता है, उससे प्रतीत नहीं होता, कि वह उसे वर्तमान महाभारतके बाद मिली होगी। ऊपर कह चुके हैं, कि ब्रह्मसूत्रोंमेही 'स्मृति' शब्दसे गीताको प्रमाण माना है। मूल भारतका महाभारत होते समय यदि मूल गीतामेंभी बहुतसे परिवर्तन हो गये होते, तो इस प्रामाणिकतामें निस्सन्देह कुछ बाधा आ गई होती। परंतु वैसे नहीं हुआ; और गीता- ग्रंथकी प्रामाणिकता कही अधिक बढ़ गई है। अतएव यही अनुमान करना पड़ता है, कि मूल गीतामें जो कुछ परिवर्तन हुए होंगे, वे महत्त्वके न थे; किंतु ऐसे थे, जिनमें मूल ग्रंथके अर्थकी पुष्टि हो गई है। भिन्न भिन्न पुराणोंमें वर्तमान भगवद्गीताके नमूनेकी जो अनेक गीताएँ कही गई हैं; उनमें यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि उक्त प्रकारसे मूल गीताको जो स्वरूप एक बार प्राप्त हो गया था, वही अबतक बना हुआ है; उसके बाद उसमें कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ। क्योकि, इन सब पुराणों- मेंसे अत्यंत प्राचीन पुराणोंके कुछ काल पहलेही यदि वर्तमान गीता पूर्णतया प्रमाण-
भूत, और इसीलिये परिवर्तित न होने योग्य, न हो गई होती, तो उसी नमूनेकी अन्य गीताओंकी रचना करनेकी कल्पना होनाभी संभव नहीं था। इसी प्रकार गीताके भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकारोंने एकही गीताके शब्दोंकी खींचातानी करके यह दिखलानेका जो प्रयत्न किया है, कि गीताका अर्थ हमारेही संप्रदायके अनुकूल है; उसकीभी कोई आवश्यकता नहीं थी। वर्तमान गीताके कुछ सिद्धान्तोंको परस्पर- विरोधी देख कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वर्तमान महाभारतकालीन गीतामेंभी आगे समय-समयपर कुछ परिवर्तन हुआ होगा। परन्तु हम पहलेही बतला चुके हैं, कि वास्तवमें यह विरोध नहीं है, किंतु यह भ्रम है; जो धर्म-प्रतिपादन करनेवाली पूर्वापार वैदिक पद्धतियोंके स्वरूपको ठीक तौरपर न समझनेसे हुआ है। सारांश, ऊपर किये गये विवेचनसे यह बात समझमें आ जायगी, कि भिन्न भिन्न प्राचीन वैदिक धर्मांगोंकी एकवाक्यता करके प्रवृत्तिमार्गका विशेष रीतिसे समर्थन करने- वाले भागवत-धर्मका उदय हो चुकनेपर लगभग पांच सौ वर्षके पश्चात् अर्थात् ईसाके लगभग ९०० वर्ष पहले, मूल भारत और मूल गीता, दोनों ग्रंथ निर्मित हुए जिनमें उस मूल भागवत धर्मकाही प्रतिपादन किया गया था; और भारतका महा- भारत होते समय यद्यपि इन मूल गीतामें तदर्थपोषक कुछ सुधार किये गये हो; तथापि उसके असली रूपमें उस समयभी कुछ परिवर्तन नहीं हुआ। एवं वर्तमान महाभारतमें जब गीता जोड़ी गई, तब (और उसके बादभी) उसमें कोई नया परिवर्तन नहीं हुआ - और होनाभी असंभव था। मूल गीता या मूल भारतके स्वरूप एवं कालका यह निर्णय स्वभावतः स्थूल दृष्टिसे एवं अंदाजसे किया गया है। क्योंकि इस समय उसके लिये कोई विशेष साधन उपलब्ध नहीं है ! परंतु वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीताकी यह बात नहीं, क्योंकि उनके कालका निर्णय करनेके लिये बहुतेरे साधन उपलब्ध हैं। अतएव उसकी चर्चा स्वतन्त्र रीतिसे अगले भागमें की गई है। यहाँपर पाठकोंको स्मरण रखना चाहिये, कि वर्तमान गीता और वर्तमान महाभारत ये दोनोही ग्रंथ हैं, जिनके मूल स्वरूपमें कालान्तरमें परिवर्तन होता रहा; और जो इस समय गीता तथा महाभारतके रूपमें हमें उपलब्ध हैं ये उस समयके पहले मूल ग्रंथ नहीं हैं।
भाग ५ - वर्तमान गीताका काल
इस बातका विवेचन हो चुका, कि भगवद्गीता भागवत धर्मपर प्रधान ग्रंथ है; और स्थूलमानसे यह निश्चित किया गया, कि यह भागवत धर्म ईसवी सनके लगभग १४०० वर्ष पहले प्रादुर्भूत हुआ; एव उसके कुछ शतकोंके बाद मूल गीता बनी होगी, और यहभी बतलाया गया, कि मूल भागवत धर्मके निष्काम कर्म-प्रधान होनेपरभी आगे उसीका भक्ति-प्रधान स्वरूप हो कर अन्तमे विशिष्टाद्वैतकाभी उसमे समावेश हो गया। मूल गीता अथवा मूल भागवत धर्मके विषयमे इससे अधिक जान-
१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारी निदान वर्तमान समयमें तो मालूम नही है; और यही दशा पचास वर्ष पहले वर्तमान गीता तथा वर्तमान महाभारतकीभी थी। परंतु डॉक्टर भांडारकर, परलोक- वासी काशीनाथपंत तेलंग, परलोकवासी शंकर बाळकृष्ण दीक्षित तथा रावबहादुर चिंतामणराव वैद्य प्रभृति विद्वानोंके उद्योगसे वर्तमान गीता एवं वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेके लिये यथेष्ट साधन उपलब्ध हो गये हैं; और अभी हालहीमें स्वर्गवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने दो-एक प्रमाण औरभी बतलाये हैं। इन सबकों एकत्रित कर तथा हमारे मतसे उनमें जिन बातोंका मिलाना ठीक जंचा, उनकोभी मिलाकर परिशिष्टका यह भाग संक्षेपमें लिखा गया है। इस परिशिष्ट-प्रकरणमें आरंभहीमें हमने यह बात प्रमाणसहित दिखला दी है, कि वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीता, दोनों ग्रंथ एक-ही व्यक्ति द्वारा रचे गये हैं। यदि दोनों ग्रंथोंको एकही व्यक्तिद्वारा रचे गये अर्थात् एककालीन मान लें, तो महाभारतके कालसे गीताका कालभी सहजही निश्चित हो जाता है। अतएव इस भागमें पहलेही ये प्रमाण दिये गये हैं, जो वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेमें अत्यंत प्रधान माने जाते हैं; और उनके बाद स्वतंत्र रीतिसे वे प्रमाणभी दिये गये हैं, जो वर्तमान गीताका काल निश्चित करनेमें उपयोगी हैं। ऐसा करनेका उद्देश्य यह है, कि महाभारतका कालनिर्णय करनेके जो प्रमाण हैं वे यदि किसीको संदिग्ध प्रतीत हों, तो उससे गीताके कालका निर्णय करनेमें कोई बाधा न होने पाये। महाभारत-काल-निर्णय : महाभारत ग्रंथ बहुत बड़ा है; और उसीमें लिखा है, कि वह लक्ष श्लोकात्मक है। परंतु रावबहादुर वैद्यने महाभारतके अपने टीकात्मक अंग्रेजी ग्रंथके पहले परिशिष्टमें यह बतलाया है,* कि जो महाभारत ग्रंथ इस समय उपलब्ध है, उसमें उपरोक्त लाख श्लोकोंकी संख्यामे कुछ न्यूनाधिकता हो गई है; और यदि उनमें हरिवंशके श्लोक मिला दिये जावें, तोभी योगफल एक लाख नहीं होता। तथापि यह माना जा सकता है, कि भारतका महाभारत होनेपर जो वृहत् ग्रंथ तैयार हुआ, वह प्रायः वर्तमान यथरीमा होगा। ऊपर बतला चुके हैं, कि इस महाभारतमें यास्कके निरुक्त तथा मनुसंहिताका और भगवद्गीतामें तो ब्रह्मसूत्रों- काभी उल्लेख पाया जाता है। अब इसके अतिरिक्त, महाभारतके काल-निर्णय करनेके लिये जो प्रमाण पाये जाते हैं, वे ये हैं - (१) अठारह पर्वोंका यह ग्रंथ तथा हरिवंश, ये दोनों संवत् ५३५ और ६३५के बीच जावा और बाली द्वीपोंमें गये थे; तथा वहाँकी प्राचीन 'कवि' नामक भाषामें उनका अनुवाद हुआ है। इस अनुवादके ये आठ पर्व - आदि, विराट्, उद्योग, भीष्म, आश्रमवासी, मुसल, प्रास्थानिक और स्वर्गारोहण - बाली द्वीपमें इस समय
- The Mahabharata : A Criticism, p, 185 रा. ब. वैद्यके महाभारतके जिस टीकात्मक ग्रंथका हमने आगे कहीं कहीं उल्लेख किया है, वह यही पुस्तक है।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६१ उपलब्ध हैं; और उनमेंसे कुछ प्रकाशितभी हो चुके हैं। यद्यपि अनुवाद कवि-भाषामें किया गया है, तथापि उसमें स्थान-स्थानपर महाभारतके मूल संस्कृत श्लोकही रखे गये हैं। उनमेंसे उद्योगपर्वके श्लोकोंकी जाँच हमने की है। वे सब श्लोक वर्तमान महाभारतकी कलकत्तेमें प्रकाशित पोथीके उद्योगपर्वके अध्यायोंमें- बीच-बीचमें क्रमशः - मिलते हैं। इससे सिद्ध होता है, कि लक्ष-श्लोकात्मक महाभारत संवत् ५३५के लगभग दो सौ वर्ष पहले हिंदुस्थानमें प्रमाणभूत माना जाता था। क्योंकि, यदि वह यहाँ प्रमाणभूत न हुआ होता, तो जावा तथा वाली द्वीपोंमें उसे न ले गये होते। तिब्बतकी भाषामेंभी महाभारतका अनुवाद हो चुका है; परंतु वह उसके बादका है।* (२) गुप्त राजाओंके समयका एक शिलालेख हालमें उपलब्ध हुआ है, कि जो चेदि संवत् १९७ अर्थात् विक्रम संवत् ५०२ में लिखा गया था। उसमें इस बातका स्पष्ट रीतिसे निर्देश किया गया है, कि उस समय महाभारत ग्रंथ एक लाख श्लोकोंका था; और इससे यह प्रकट हो जाता है, कि विक्रम संवत् ५०२ के लगभग दो सौ वर्ष पहले उसका अस्तित्व अवश्य होगा।† (३) आजकल भास कविके जो नाटक-ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, उनमेंसे अधिकांश महाभारतके आख्यानोंके आधारपर रचे गये हैं। इससे प्रकट है, कि उस समय महाभारत उपलब्ध था; और वह प्रमाणभी माना जाता था। भास कविकृत 'बालचरित' नाटकमें श्रीकृष्णजीकी शिशु-अवस्थाकी बातोंका तथा गोपियोंका उल्लेख पाया जाता है। अतएव यह कहना पड़ता है, कि हरिवंशभी उस समय अस्तित्वमें होगा। यह बात निर्विवाद है, कि भास कवि कालिदाससे पुराना है। भास कविकृत नाटकोंके संपादक पंडित गणपतिशास्त्रीने स्वप्नवासवदत्ता नामक नाटककी प्रस्तावनामें लिखा है, कि भास चाणक्यसेभी प्राचीन है; क्योंकि भास कविके नाटकका एक श्लोक चाणक्यके अर्थशास्त्रमें पाया जाता है; और उसमें यह बतलाया है, कि वह किसी दूसरेका है। परंतु यह काल यद्यपि कुछ संदिग्ध माना जाय, तथापि हमारे मतसे यह बात निर्विवाद है, कि भासका समय सन ईसवीके दूसरे अथवा तीसरे शतकके औरभी इस ओरका नहीं माना जा सकता। (४) बौद्ध ग्रंथोंके द्वारा यह निश्चित किया गया है, कि शालिवाहन शकके आरंभमें अश्वघोष नामक एक बौद्ध कवि हो गया है, जिसने 'बुद्धचरित' और * जावा द्वीपके महाभारतका योग The Modern Review, July 1914 pp. 32-38 में दिया गया है; और तिब्बती भाषामें अनुवादित महाभारतका उल्लेख Rockhill's Life of the Buddha, p. 228 note 1 में किया है। † यह शिलालेख Inscriptionum Indicarum नामक पुस्तकके तृतीय खंडके पृष्ठ १३८ में पूर्णतया दिया हुआ है, और स्वर्गवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितने उसका उल्लेख अपने 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र' में (पृ. १०८) किया है। गी. र. ३६
५६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'सौंदरानंद' नामक दो बौद्ध धर्मीय संस्कृत महाकाव्य लिखे थे । अब ये ग्रंथ छापकर प्रकाशित किये गये हैं। इन दोनोंमेंभी भारतीय कथाओंका उल्लेख है। इनके सिवा 'वज्रसूचिकोपनिषद्'पर अश्वघोषका व्याख्यानरूपी एक और ग्रंथ है; अथवा यह कहना चाहिये, कि यह 'वज्रसूचिकोपनिषद्' उसीका रचा हुआ है। इस ग्रंथको प्रोफ़ेसर वेबरने सन १८६० में, जर्मनीमें प्रकाशित किया है। उसमें हरिवंशके श्राद्ध माहात्म्यमेंमें “सप्तव्याधा दशार्णेषु” (हरि. २४.२०, २१) इत्यादि श्लोक, तथा स्वयं महाभारतके कुछ अन्य श्लोक (उदाहरणार्थ, मभा. शां. २६१.१७); पाये जाते हैं। इससे प्रकट होता है, कि शक संवत्से पहले हरिवंशको मिलाकर वर्तमान लक्ष श्लोकात्मक महाभारत प्रचलित था। (५) आश्वलायन गृह्यसूत्रोंमें (३.४.४) भारत तथा महाभारतका पृथक् पृथक् उल्लेख किया गया है; और बौधायन धर्मसूत्रमें एक स्थान (२.२. २६) पर महाभारतमें वर्णित ययाति उपाख्यानका एक श्लोक मिलता है, (मभा. आ. ७८.१०)। वुल्हर साहबका कथन है, कि केवल एकही श्लोकके आधारपर यह अनुमान दृढ़ नहीं हो सकता, कि महाभारत बौधायनके पहले था।* परंतु यह शंका ठीक नहीं; क्योंकि बौधायनके गुह्य शेष-सूत्रमें विष्णुसहस्रनामका स्पष्ट उल्लेख है। (बौ. गृ शे १.२२.८) : और आगे चलकर इसी सूत्रमें (२.२२.९) गीताका “पत्रं पुष्पं फलं तोयं” श्लोकभी (गीता ९.२६) मिलता है। बौधायन सूत्रमें पाये जानेवाले इन उल्लेखोंको पहले पहल परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने प्रकाशित किया था।† और इन सब उल्लेखोंसे यही कहना पड़ता है, कि बुल्हर साहबकी शंका निर्मूल है; आश्वलायन तथा बौधायन और दोनोंभी महाभारतसे, परिचित थे। बुल्हरहीने अन्य प्रमाणोंसे निश्चित किया है, कि बौधायन सन् ईसवीके लगभग ४०० वर्ष पहले हुआ होगा। (६) स्वयं महाभारतमें जहाँ विष्णुके अवतारोंका वर्णन किया गया है, वहाँ बुद्धका नामतक नहीं; और नारायणीयोपाख्यानमें (मभा शा ३३९.१००) जहाँ दस अवतारोंके नाम दिये हैं, वहाँ हंसको प्रथम अवतार कहकर तथा कृष्णके बाद एकदम कल्कि को लाकर पूरे दस गिना दिये हैं। परंतु वनपर्वमें कलियुगकी भविष्यत् स्थितिका वर्णन करते समय कहा है, कि “एडूकचिन्हा पृथिवी न देवगृह- भूषिता” (मभा. वन १९०. ६८) पृथ्वीपर देवालयोंके बदले एडूक होंगे। बुद्धके बाल तथा दाँत प्रभृति किसी स्मारक वस्तुको जमीनमें गाड़कर उसपर जो खंभ, मीनार या इमारत बनाई जाती थी, उसे एडूक कहते थे, और आजकल उसे 'डागोबा'
- See ‘Sacred Books of the East Series’ Vol. XIV., Intro. p. xli. † परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेका पूरा लेख The Vedic Magazine and Gurukula Samachar, Vol. VII, Nos. 6-7, pp. 528-532, में प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखकका नाम प्रोफेसर काळे लिखा है; पर वह अशुद्ध है।
कहते हैं। डागोबा शब्द संस्कृत 'धातुगर्भ' ( = पाली डागव ) का अपभ्रंश है; और 'धातु' शब्दका अर्थ "भीतर रक्खी हुई स्मारक वस्तु" है, सीलोन तथा ब्रह्मदेशमें ये डागोबा कई स्थानोंपर पाये जाते हैं। इससे प्रतीत होता है, कि बुद्धके वाद, परंतु अवतारोंमें उसकी गणना होनेके पहलेही महाभारत रचा गया होगा। महाभारतमें 'बुद्ध' तथा 'प्रतिबुद्ध' शब्द अनेक बार मिलते हैं ( मभा. शा १९४.५८; ३०७. ४७; ३४३.५२ ) । परंतु वहाँ केवल ज्ञानी, जाननेवाला अथवा स्थितप्रज्ञ पुरुष इतनाही अर्थ उन शब्दोंमें अभिप्रेत है। प्रतीत नहीं होता, कि ये शब्द बौद्ध धर्मसे लिये गये हों; किंतु यह माननेके लिये दृढ़ कारणभी हैं, कि बौद्धोंनेही ये शब्द वैदिक धर्मसे लिये होंगे। ( ७ ) कालनिर्णयकी दृष्टिसे यह बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, कि महाभारतमें नक्षत्रगणना अश्विनी आदिसे नहीं है, किंतु वह कृत्तिका आदिसे है ( मभा. अनु. ६४.८९ ) ; और मेष-वृषभ आदि राशियोंका कहींभी उल्लेख नहीं है। क्योंकि इस बातसे यह अनुमान सहजही किया जा सकता है, कि यूनानियोंके सहवाससे हिंदुस्तानमें मेष, वृषभ आदि राशियोंके आनेके पहले — अर्थात् सिकंदरके पहलेही — महाभारत ग्रंथ रचा गया होगा। परंतु इससेभी अधिक महत्त्वकी बात श्रवण आदि नक्षत्रगणनाके विषयकी है। अनुगीतामें ( मभा. अश्व. ४४.२ ; और आदि. ७१.३४ ) कहा है, कि विश्वामित्रने श्रवण आदिकी नक्षत्रगणना आरंभ की और टीकाकारने उसका यह अर्थ किया हैं, कि उस समय श्रवण नक्षत्रमें उत्तरायणका आरंभ होता था; इसके सिवा उसका कोई दूसरा ठीक ठीक अर्थभी नहीं हो सकता। वेदांगज्योतिषके समय उत्तरायणका आरंभ धनिष्ठा नक्षत्रसे हुआ करता था। धनिष्ठामें उदगयन होनेका काल ज्योतिर्गणितकी रीतिसे शकके पहले लगभग १५०० वर्ष आता है; और ज्योतिर्गणितकी रीतिसे उदगयनको एक नक्षत्र पीछे हटनेके लिये लगभग हजार वर्ष लग जाते हैं। इस हिसाबसे श्रवणके आरंभमें उदगयन होनेका काल शकके पहले लगभग ५०० वर्ष आता है। सारांश, गणितके द्वारा यह बतलाया जा सकता है, कि शकके पहले ५०० वर्ष वर्षके लगभग वर्तमान महाभारत बना होगा। परलोकवासी शंकर बाळकृष्ण दीक्षितने अपने 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र' की विशेषता यह है, कि इसके कारण वर्तमान महाभारतका काल शकके पहले ५०० वर्षसे अधिक पीछे हटायाही नहीं जा सकता। ( ८ ) रावबहादुर वैद्यने महाभारतपर जो टीकात्मक ग्रंथ अंग्रेजीमें लिखा है, उसमें यह बतलाया है, कि चंद्रगुप्तके दरबारमें ( सन ईसवीसे लगभग ३२० वर्ष पहले रहनेवाले मेगस्थनीज़ नामक ग्रीक वकीलको महाभारतकी कथाएं मालूम थीं। मेगस्थनीजका पूरा ग्रंथ इस समय उपलब्ध नहीं है; परंतु उसके अवतरण कई ग्रंथोंमें पाये जाते हैं। वे सब एकत्रित करके, पहले जर्मन भाषामें प्रकाशित किये गये; और फिर मेक्रींडलने उनका अंग्रेजी अनुवाद किया है। इस
पुस्तकमें (पृ. २००-२०५) कहा है, कि उसमें वर्णित हेरेक्लीजही श्रीकृष्ण हैं; और मेगस्थनीजके समय शौरसेनीय लोग - जो मथुराके निवासी थे - उसीकी पूजा किया करते थे। उसमें यहभी लिखा है, कि हेरेक्लीज अपने मूलपुरुष डायोनिसससे पंद्रहवाँ था। इसी प्रकार महाभारतमेंभी (सभा. अनु. १४७. २५-३३) कहा है, कि श्रीकृष्ण दक्षप्रजापतिसे पंद्रहवें पुरुष हैं। और मेगस्थनीजने कर्णप्रावरण, एकपाद, ललाटाक्ष आदि अद्भुत लोगोंका (पृ. ७४) अथवा सोनेकी ऊपर निकालनेवाली चींटियोंका (पिपीलिकाओं) (पृ. ९४) वर्णन किया है, वहभी महाभारतहीमें (सभा. सभा. ५१, ५२) पाया जाता है। इन बातोंसे और अन्य बातोंसे प्रकट हो जाता है, कि मेगस्थनीजके समय न केवल महाभारत ग्रंथही न प्रचलित था, किंतु श्रीकृष्ण-चरित्र तथा श्रीकृष्ण-पूजाकाभी प्रचार हो गया था। यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि उपर्युक्त प्रमाण परम्परसापेक्ष अर्थात् एक दूसरेपर अवलंबित नहीं हैं, किंतु वे स्वतंत्र हैं, तो यह बात निस्संदेह प्रतीत होगी, कि वर्तमान महाभारत शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहले अस्तित्वमें जरूर था। इसके बाद कदाचित् किसीने उसमें कुछ नये श्लोक मिला दिये होंगे; अथवा उसमेंसे कुछ निकालभी डाले होंगे। परंतु इस समय कुछ विशिष्ट श्लोकोंके विषयमें कोई प्रश्न नहीं है - प्रश्न तो समूचे ग्रंथकेही विषयमें है; और यह बात सिद्ध है, कि यह समस्त ग्रंथ शककालके कम-से-कम पाँच शतक पहलेही रचा गया है। इस प्रकरणके आरंभहीमें हमने यह सिद्ध कर दिया है, कि गीता समस्त महाभारत ग्रंथकाही एक भाग है - वह कुछ उसमें पीछे नहीं मिलाई गई है। अतएव गीताकाभी वही काल मानना पड़ता है, जो कि महाभारतका है। संभव है, कि मूल गीता इसके पहलेकी हो; क्योंकि जैसे इसी प्रकरणके चौथे भागमें बतलाया गया है; उसकी परंपरा
- See M'Crindle's Ancient India-Megasthenes and Arrian, pp. 202-205 मेगस्थनीजका यह कथन एक वर्तमान खोजके कारण विचित्रतापूर्वक दृढ़ हो गया है। बम्बई सरकारके Archaeological Department की १९१४ ईसवी की Progress Report हालहीमें प्रकाशित हुई है। उसमें एक शिलालेख है, जो ग्वालियर रियासतके भेलसा शहरके पास बेसनगर गांवमें खाम्बबाबा नामक एक गरुड़ध्वज-स्तंभपर मिला है। इस लेखमें यह कहा है, कि हेलिओडोरस नामक एक हिंदू बने हुए यवन अर्थात् ग्रीकने इस स्तंभके सामने वासुदेवका मंदिर बनवाया था; और यह यवन वहांके भागभद्र नामक राजाके दरबारमें तक्षशिलाके ऐंटि- आल्किडस नामक ग्रीक राजाके एलचीकी हैसियतसे रहता था। ऐंटिआल्किडसके सिक्कोंसे अब यह सिद्ध किया गया है, कि वह ईसाके पहले १४० वें वर्षमें राज्य करता था। इससे यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है, कि उस समय वासुदेवभक्ति प्रचलित थी; केवल उतनीही नहीं; किंतु यवन लोगभी वासुदेवके मंदिर बनवाने लगे थे। यह पहलेही बतला चुके हैं; कि मेगस्थनीजहीको नहीं; किंतु पाणिनीकोभी वासुदेवभक्ति मालूम थी।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६५ बहुत प्राचीन समय तक हटानी पड़नी है। परंतु, चाहे जो कुछ कहा जाय; यह निर्विवाद सिद्ध है, कि उसका काल महाभारतके बादका नहीं माना जा सकता। यह नहीं, कि यह बात केवल उपर्युक्त प्रमाणोंहीसे सिद्ध होती है, किंतु इसके विषयमें स्वतंत्र प्रमाणभी दीख पड़ते हैं। अब आगे उन स्वतंत्र प्रमाणोंकाही वर्णन किया जाता है। गीता-कालका निर्णय : ऊपर जो प्रमाण बतलाये गये हैं, उनमें गीताका स्पष्ट अर्थात् नामतः निर्देश नहीं किया गया है; वहाँ गीताके कालका निर्णय महाभारत- कालसे किया गया है। अब यहाँ क्रमशः वे प्रमाण दिये जाते हैं, जिनमें गीताका स्पष्ट रूपसे उल्लेख है। परंतु पहले यह बतला देना चाहिये, कि परलोकवासी तेलंगने गीताको आपस्तम्बके पहलेकी अर्थात् ईसासे कम-से-कम तीन सौ वर्षसे अधिक प्राचीन कहा है। डॉक्टर भांडारकरने अपने 'वैष्णव, शैव आदि पंथ' नामक अंग्रेजी ग्रंथमें प्रायः इसी कालको स्वीकार किया है। प्रोफेसर गार्वेके* मतानुसार तेलंगद्वारा निश्चित किया गया काल ठीक नहीं। उनका यह कथन है, कि मूल गीता ईसाके पहले दूसरी सदीमें हुई; और ईसाके बाद दूसरे शतकमें उसमें कुछ सुधार किये गये हैं। परंतु नीचे लिखे प्रमाणोंसे यह बात भली भाँति प्रकट हो जायगी, कि गार्वेका उक्त कथन ठीक नहीं है। (१) गीतापर जो टीकाएँ तथा भाष्य उपलब्ध हैं, उनमें शांकरभाष्य अत्यंत प्राचीन है। श्रीशंकराचार्यने महाभारतके सनत्सुजातीय प्रकरणपरभी भाष्य लिखा है; और उनके ग्रंथोंमें महाभारतके मनु-बृहस्पति-संवाद, शुकानुप्रश्न और अनु- गीतामेंसे बहुतेरे वचन अनेक स्थानोंपर प्रमाणार्थ लिये गये हैं। इससे यह बात प्रकट है, कि उनके समयमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ प्रमाणभूत माने जाते थे। प्रोफेसर काशीनाथ बापू पाठकने एक सांप्रदायिक श्लोकके आधारपर श्रीशंकरा- चार्यका जन्मकाल ८८५ विक्रमी संवत् (शक ७१०) निश्चित किया है। परंतु हमारे मतमें इस कालको औरभी सौ वर्ष पीछे हटाना चाहिये। क्योंकि महानुभव पंथके 'दर्शन-प्रकाश' नामक ग्रंथमें यह कहा है, कि 'युग्मपयोधिरामान्वितशाके' अर्थात् शक ६४२ में (विक्रमी संवत् ७७७) श्रीशंकराचार्यने गुहामें प्रवेश किया; और उस समय उनकी आयु ३२ वर्षकी थी, अतएव यह सिद्ध होता है, कि उनका जन्म शक ६१० में (संवत् ७४५) हुआ। हमारे मतमें यही समय, प्रोफेसर पाठक- द्वारा निश्चित किये हुए कालसे, कहीं अधिक सयुक्तिक प्रतीत होता है। परंतु, यहाँ- पर उसके विषयमें विस्तारपूर्वक विवेचन नहीं किया जा सकता। गीतापर जो शांकर- भाष्य है, उसमें पूर्व समयके अधिकांश टीकाकारोंका उल्लेख किया गया है; और
- See Telang's Bhagavadgita, S. B. E. Vol. VIII, Intro. pp. 21 and 34; Dr. Bhandarkar's Vaishnavism, Shaivism and other Sects, P. 13; Dr. Garbe's Die Bhagavadgita, p. 64.
५६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उक्त भाष्यके आरंभहीमें श्रीशंकराचार्यने कहा है, कि इन टीकाकारोंके मतोंका खंडन करके हमने नया भाष्य लिखा है। अतएव आचार्यका जन्मकाल चाहे शक ६१० लीजिये या ७१०; इसमे तो कुछभी संदेह नहीं, कि उस समयके कम-से-कम दो-तीन सौ वर्ष पहले अर्थात् शक ४०० के लगभग गीता प्रचलित थी। अब देखना चाहिये, कि इस कालकेभी और पहले कैसे और कितना जा सकते हैं। (२) परलोकवासी तेलंगने यह दिखलाया है, कि कालिदास और बाणभट्ट गीतासे परिचित थे। कालिदासकृत रघुवंशमें (१०.३१) विष्णुकी स्तुतिके विषयमें जो “अनवाप्तमवाप्तव्यं न ते किंचन विद्यते” यह श्लोक है, वह गीताके (३.२२) “नानवाप्तमवाप्तव्यं” श्लोकसे मिलता है; और बाणभट्टकी कादंबरीके “महाभारतमिवानन्तगीताकर्णनानन्दितनरं” इस एक श्लेष-प्रधान वाक्यमें गीताका स्पष्ट-रूपसे उल्लेख किया गया है। कालिदास और भारविका उल्लेख स्पष्टरूपसे संवत् ६९१ के (शक ५५६) एक शिलालेखमें पाया जाता है; और अब यहभी निश्चित हो चुका है, कि बाणभट्टभी संवत् ६६३ के (शक ५२८) लगभग हर्ष राजाके पास था। इस बातका विवेचन परलोकवासी पांडुरंग गोविंद- शास्त्री पारखीने बाणभट्टपर लिखे हुए अपने एक मराठी निबंधमें किया है। (३) जावा द्वीपमें जो महाभारत ग्रंथ यहाँसे गया है, उसके भीष्मपर्वमें एक गीता प्रकरण है, जिसमें गीताके भिन्न भिन्न अध्यायोंके लगभग सौ-सव्वा सौ श्लोक अक्षरशः मिलते हैं। सिर्फ १२, १५, १६ और १७-इन चार अध्यायोंके श्लोक उसमें नहीं हैं। इससे यह कहनेमें कोई आपत्ति नहीं दीख पड़ती, कि उस समयभी गीताका स्वरूप वर्तमान गीताके सदृशही था। क्योंकि कवि-भाषामें गीताका यह अनुवाद है; और उसमें जो संस्कृत श्लोक मिलते हैं, वे बीच-बीचमें उदाहरण तथा प्रतीकके तौरपर ले लिये गये हैं। इससे यह अनुमान करना युक्तिसंगत नहीं, कि उस समय गीतामें केवल उतनेही श्लोक थे। जब डॉक्टर नरहर गोपाल सरदेसाई जावा द्वीपको गये थे, तब उन्होंने इस बातकी खोज की है। इस विषयका वर्णन कल- कत्तेके 'मॉडर्न रिव्यू' नामक मासिक पत्रके जुलाई १९१४के अंकमें तथा उसके पूर्व पूनाके 'चित्रमय-जगत्' मासिकपत्रमेंभी प्रकाशित हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है; कि शक चार-पाँच सौके कम-से-कम दो सौ वर्ष पहले महाभारतके भीष्मपर्वमें गीता थी; और उसके श्लोकभी वर्तमान गीताके श्लोकोंके क्रमानुसारही थे। (४) विष्णुपुराण और पद्मपुराण आदि ग्रंथोंमें भगवद्गीताके नमूनेपर बनी हुई जो अन्य गीताएं दीख पडती हैं, अथवा उनके उल्लेख पाये जाते हैं, उनका वर्णन इस ग्रंथके पहले प्रकरणमे किया गया है। इससे यह बात स्पष्टतया विदित होती है, कि उस समय भगवद्गीता प्रमाण तथा पूजनीय मानी जाती थी, इसीलिये उसका उक्त प्रकारसे अनुकरण किया गया है, और यदि ऐसा न होता, तो उसका कोईभी अनुकरण न करता। अतएव सिद्ध है, कि इन पुराणोंमें जो अत्यंत प्राचीन
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६७ पुराण हैं, उनमेंभी भगवद्गीता कम-से-कम सौ-दो-सौ वर्ष अधिक प्राचीन अवश्य होगी। पुराण-कालका आरंभ-समय सन ईसवीके दूसरे शतकसे अधिक अर्वाचीन नहीं माना जा सकता, अतएव गीताका काल कम-से-कम शकारंभके कुछ थोड़ा पहलेही मानना पड़ता है। (५) ऊपर यह बतला चुके हैं, कि कालिदास और बाण गीतासे परिचित थे। कालिदाससे पुराने भास कविके नाटक हालहीमें प्रकाशित हुए हैं। उनमेंसे 'कर्णभार' नाटकमें बारहवाँ श्लोक इस प्रकार है :- हतोऽपि लभते स्वर्गं जित्वा तु लभते यशः । उभे बहुमते लोके नास्ति निष्फलता रणे ॥ यह श्लोक गीताके “हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्” (गीता २.३७) श्लोकके समाना- र्थक है; और जब कि भास कविके अन्य नाटकोंमें यह प्रकट होता है, कि वह महा- भारतसे पूर्णतया परिचित था; तब तो यही अनुमान किया जा सकता है, कि उप- र्युक्त श्लोक लिखने समय उसके मनमें गीताका उक्त श्लोक अवश्य आया होगा। अर्थात् यह सिद्ध होता है, कि भास कविके पहलेभी महाभारत और गीताका अस्तित्व था। पंडित गणपतिशास्त्रीने यह निश्चित किया है, कि भास कविका काल शक-के दो-तीन सौ वर्ष पहले रहा होगा। परंतु कुछ लोगोंका मत है, कि वह शकके सौ-दो सौ वर्ष बाद हुआ है। यदि हम दूसरे मतको सत्य माने, तोभी उपर्युक्त प्रमाणसे सिद्ध हो जाता है, कि भाससे कम-से-कम सौ-दोसौ वर्ष पहले अर्थात् शक-कालके आरंभमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ सर्वमान्य हो गये थे। (६) परंतु प्राचीन ग्रंथकारों-द्वारा गीताके श्लोक लिये जानेका औरभी अधिक दृढ़ प्रमाण, परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने गुरुकुलकी 'वैदिक मेग- जीन' नामक अंग्रेजी मासिक पुस्तक (पुस्तक ३, अंक ६-७, पृष्ठ ५०८-५३२, मार्गशीर्ष और पौष, संवत् १९७०) में प्रकाशित किया है। इसके पहले पश्चिमी संस्कृत पंडितोंका यह मत था, कि संस्कृत काव्य-पुराणोंकी अपेक्षा किन्हीं अधिक अथवा प्राचीन ग्रंथोंमें, उदाहरणार्थ सूत्र-ग्रंथोंमेंभी, गीताका उल्लेख नहीं पाया जाता; और इसलिये यह कहना पड़ता है, कि सूत्र-कालके बाद, अर्थात् अधिकसे अधिक सन् ईसवीके पहले, दूसरी सदीमें गीता बनी होगी। परंतु परलोकवासी कालेने प्रमाणोंसे सिद्ध कर दिया है, कि यह मत ठीक नहीं है। बौधायन-गृह्यशेष- सूत्रमें (२.२२.९) गीताका (९.२६) निम्नलिखित श्लोक 'तदाह भगवान्' कहकर स्पष्ट रूपसे लिया गया है :- देशाभावे द्रव्याभावे साधारणे कुर्यान्मनसा वार्चयेदिति । तदाह भगवान् - पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ इति
५६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और आगे चलकर कहा है, कि भक्तिसे नम्र होकर इन मंत्रोंको पढ़ना चाहिये - “भक्तिनम्रः एतान्मन्त्रानधीयीत ।” इसी गृह्यशेष-सूत्रके तीसरे प्रश्नके अंतमें यह भी कहा है, कि “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर-मंत्रका जप करनेसे अश्वमेधका फल मिलता है। इससे यह बात पूर्णतया सिद्ध होती है, कि बौधायनके पहले गीता प्रचलित थी; और वासुदेव-पूजाभी सर्वमान्य समझी जाती थी। इसके- सिवा बौधायनके पितृमेध-सूत्रके तृतीय प्रश्नके आरंभहीमें यह वाक्य है :- जातस्य वै मनुष्यस्य ध्रुवं मरणमिति विजानीयात्तस्माज्जाते न प्रहृष्येन्मृते च न विषीदेत् । इससे सहजही दीख पड़ता है, कि वह गीताके “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥” इस श्लोकसे सूझ पड़ा होगा; और उसमें उपर्युक्त 'पत्रं पुष्पं' श्लोकका योग कर देनेसे तो कुछ शंकाही नहीं रह जाती। ऊपर बतला चुके हैं, स्वयं महाभारतका एक श्लोक बौधायन- सूत्रोंमें पाया जाता है। बुल्हर साहबने निश्चित किया है* कि बौधायनका काल आपस्तंबके सौ-दोसौ वर्ष पहले होगा; और आपस्तंबका काल ईसाके पहले तीन सौ वर्षसे कम हो नहीं सकता। परंतु हमारे मतानुसार उसे कुछ इस ओर हटाना चाहिये। क्योंकि महाभारतमें मेष-वृषभ आदि राशियाँ नहीं हैं और ‘काल- माधव’में तो बौधायनका “मीनमेषयोर्मेषवृषभोर्वा वसंतः” यह वचन दिया गया है; यही वचन परलोकवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितके ‘भारतीय ज्योतिषशास्त्र’ मेंभी (पृष्ठ १०२) लिया गया है। इससेभी यही निश्चित अनुमान किया जाता है, कि महाभारत बौधायनके पहलेका है, तथा शकारंभके कम-से-कम चार सौ वर्ष पहले बौधायनका समय होना चाहिये; और पाँच सौ वर्ष पहले महाभारत तथा गीताका अस्तित्व था। परलोकवासी कालेने बौधायनका काल ईसाके सात-आठ सौ वर्ष पहलेका निश्चित किया है; किंतु वह ठीक नहीं है। जान पड़ता है, कि बौधायनका राशिविषयक वचन उनके ध्यानमें न आया होगा। (७) उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह बात किसीकोभी स्पष्ट रूपसे विदित हो जायगी, कि वर्तमान गीता शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहले अस्तित्वमें थी; बौधायन तथा आश्वलायनभी उससे परिचित थे; और उस समयसे श्रीशंकराचार्यके समय- तक उसकी परंपरा अविच्छिन्न रूपसे दिखलाई जा सकती है। परंतु अब तक जिन प्रमाणोंका उल्लेख किया गया है, वे सब वैदिक धर्मके ग्रंथोंसे लिये गये हैं। अब आगे चलकर जो प्रमाण दिया जायगा, वह वैदिक धर्म-ग्रंथोंसे भिन्न अर्थात् बौद्ध साहित्यका है। इससे गीताकी उपर्युक्त प्राचीनता स्वतंत्र रीतिसे औरभी अधिक दृढ़ तथा
- See Sacred Books of the East Series, Vol. II, Intro. p. xliii and also the same Series, Vol. XIV, Intro. p. xliii.
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६९
निःसंदिग्ध हो जाती है। बौद्ध धर्मके पहलेही भागवत धर्मका उदय हो गया था, इस विषयमें बुल्हर और प्रसिद्ध फ्रेंच पंडित सेनार्तके मतोंका उल्लेख पहले हो चुका है; तथा प्रस्तुत प्रकरणके अगले भागमें इन बातोंका विवेचन स्वतंत्र रीतिसे किया जायगा, कि बौद्ध धर्मकी वृद्धि कैसे हुई? तथा हिंदू धर्मसे उसका क्या संबंध है? यहाँ केवल गीता-कालके संबंधमेंही आवश्यक उल्लेख संक्षिप्त रूपमें किया जायगा। भागवत धर्म बौद्ध धर्मके पहलेका है, तथापि केवल इतना कह देनेसेही इस बातका निश्चय नहीं किया जा सकता, कि गीताभी बुद्धके पहले थी। क्योंकि यह कहनेके लिये कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, कि भागवत धर्मके साथही गीता-ग्रंथकाभी उदय हुआ। अतएव यह देखना आवश्यक है कि बौद्ध ग्रंथकारोंने गीता-ग्रंथका स्पष्ट उल्लेख कहीं किया है या नहीं? प्राचीन बौद्ध ग्रंथोंमें यह स्पष्ट रूपसे लिखा है, कि बुद्धके समय चार वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास, निघंटु आदि वैदिक धर्मग्रंथ प्रचलित हो चुके थे; अतएव इसमें संदेह नहीं, कि बुद्धके पहलेही वैदिक धर्म पूर्णावस्थामें पहुँच चुका था। इसके बाद बुद्धने जो नया पंथ चलाया, वह अध्यात्मकी दृष्टिसे अनात्मवादी था; परंतु जैसे अगले भागमें बतलाया जायगा आचरण-दृष्टिसे उसमें उपनिषदोंके संन्यास-मार्गहीका अनुकरण किया गया था। परंतु अशोकके समय बौद्ध धर्मकी यह दशा बदल गई थी; बौद्ध भिक्षुओंने जंगलमें रहना छोड़ दिया था – धर्म प्रसारार्थ तथा परोपकारके काम करनेके लिये वे लोग पूर्वकी ओर चीनमें और पश्चिमकी ओर अलेक्जेंड्रिया तथा ग्रीसतक चले गये थे। बौद्ध धर्मके इतिहासमें यह एक अत्यंत महत्त्वका प्रश्न है, कि जंगलोंमें रहना छोड़कर लोकसंग्रहके काम करनेके लिये बौद्ध यति कैसे प्रवृत्त हो गये? बौद्ध धर्मके प्राचीन ग्रंथोंपर दृष्टि डालिये। सुत्तनिपातके खग्गविसाणसुत्तमें कहा है, कि जिस भिक्षुने पूर्ण अर्हतावस्था प्राप्त कर ली है, वह कोईभी काम न करे; केवल गेंडेके सदृश्य जंगलमें निवास किया करे; और महावग्गमें (५. १. २७) बुद्धके प्रमुख शिष्य सोनकोलीविसकी कथामें कहा है, कि जो भिक्षु निर्वाणपदतक पहुँच चुका है, उसके लिये न तो कोई कामही अवशिष्ट रह जाता है; और न किया हुआ कर्मही भोगना पड़ता है – “कतस्स पटिचयो नत्थि करणीयं न विज्जति।” यह शुद्ध संन्यास-मार्ग है, और हमारे औपनिषदिक संन्यास-मार्गसे इसका पूर्णतया मेल मिलता है। यह “करणीयं न विज्जति” वाक्य, गीताके “तस्य कार्यं न विद्यते” इस वाक्यसे केवल समानार्थकही नहीं है, किंतु शब्दशःभी एकही है। परंतु जब बौद्ध भिक्षुओंका यह मूल संन्यास-प्रधान आचार बदल गया और जब वे परोपकारके काम करने लगे, तब नये तथा पुराने मतमें झगड़ा हो गया; पुराने लोग अपनेको ‘थेरवाद’ (वृद्धपंथ) कहने लगे; और नवीन मत-वादी लोग अपने पंथका ‘महायान’ नाम रख करके पुराने पंथको ‘हीनयान’ (अर्थात् हीन पंथके) नामसे संबोधित करने लगे। अश्वघोष महायान पंथका था; और वह इस मतको मानता था, कि बौद्ध
५७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यति लोग परोपकारके काम किया करें । अतएव 'सौंदरानंद' (सौ. १८. ५४) काव्यके अंतमें, जब नंद अर्हतावस्थामें पहुँच गया, तब उसे बुद्धने जो उपदेश दिया, है, उसमें पहले यह कहा है :- अवाप्तकार्योऽसि परां गतिं गतः न तेऽस्ति किंचित्करणीयम्वपि । "तेरा कर्तव्य हो चुका, तुझे उत्तम गति मिल गई, अब तेरे लिये तिलभरभी कर्तव्य नहीं रहा ।" और आगे स्पष्ट-रूपसे यह उपदेश किया है, कि :- विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरु स्थिरात्मन्परकार्यमप्यथो ॥ "अतएव अब तू अपना कार्य छोड़, बुद्धिको स्थिर करके परकार्य किया कर" (सौ. १८ ५७) । प्राचीन धर्म-ग्रंथोंमें पाये जानेवाले बुद्धके कर्मत्यागविषयक उपदेशमें तथा कर्मयोगविषयक इस उपदेशमें कि जिसे 'सौंदरानंद' काव्यमें अश्व घोषने बुद्धके मुखसे कहलाया है, अत्यंत भिन्नता है। और, अश्वघोषकी इन दलीलोंमें तथा गीताके तीसरे अध्यायमें जो युक्ति-प्रयुक्तियाँ हैं, उनमें - "तस्य कार्यं न विद्यते... तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" तेरे लिये कुछ रह नहीं गया है, इसलिये जो कर्म प्राप्त हों, उनको निष्काम बुद्धिसे किया कर (गीता ३. १७, १९) न केवल अर्थदृष्टिसेही, किंतु शब्दशःभी समानता है। अतएव इससे यह अनुमान होता है, कि ये दलीलें अश्वघोषको गीताहीसे मिली हैं। इसका कारण ऊपर बतलाही चुके हैं, कि अश्वघोषसेभी पहले महाभारत था। परंतु इसे केवल अनुमानही न समझिये। बौद्ध धर्मानुयायी तारानाथने बौद्ध धर्मविषयक इतिहाससंबंधी जो ग्रंथ तिब्बती भाषामें लिखा है, उसमे लिखा है, कि बौद्धोंके पूर्वकालीन संन्यास-मार्गमें महायान पंथने जो कर्मयोगविषयक सुधार किया था. उसे महायान-पंथके मुख्य पुरस्कर्ता नागार्जुनके गुरु राहुलभद्रने 'ज्ञानी श्रीकृष्ण और गणेश'से जाना था। इस ग्रंथका अनुवाद रूसी भाषामें जर्मन भाषामें किया गया है- अंग्रेजीमें अभीतक नहीं हुआ है। डॉ. केर्नने १८९६ ईसवीमें बौद्ध धर्मपर एक पुस्तक लिखी थी।* यहाँ उसीसे हमने यह अवतरण लिया है। डॉक्टर केर्नकाभी यही मत है, कि यहाँपर श्रीकृष्णके नामसे भगवद्गीताहीका उल्लेख किया गया है। महायान- पंथके बौद्ध ग्रंथोमेसे 'सद्धर्मपुंडरीक' नामक ग्रंथमेभी भगवद्गीताके श्लोकोंके किया समान कुछ श्लोक हैं। परंतु इन बातोंका और अन्य बातोंका विवेचन अगले भागमें जायगा। यहाँपर केवल यही बतलाना है, कि बौद्ध-ग्रंथकारोंकेही मतानुसार मूल बौद्ध-धर्मके संन्यास-प्रधान होने परभी उसमे भक्ति-प्रधान तथा कर्म-प्रधान महायान-पंथकी उत्पत्ति भगवद्गीताके कारणही हुई है; और अश्वघोषके काव्यमे
- See Dr. Kern's Manual of Indian Buddhism (Grundriss, III.
- P. 122 महायान ग्रंथके 'अमिताभसूत्र' नामक मुख्य ग्रंथका अनुवाद चीनी भाषामें सन १४८ के लगभग किया गया था।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७१ गीताकी जो ऊपर समता बतलाई गई है, उसमे इस अनुमानको औरभी दृढ़ता प्राप्त हो जाती है। पश्चिमी पंडितोंका निश्चय है, कि महायान-पंथका पहला पुरस्कर्ता नागार्जुन शकके लगभग सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले हुआ होगा; और यह तो स्पष्टही है, कि इस पंथका बीजारोपण अशोकके राजशासनके समयमें हुआ होगा। बौद्ध ग्रंथोंसे तथा स्वयं बौद्ध ग्रंथकारोंके लिखे हुए उस धर्मके इतिहाससे यह बात स्वतंत्र रीतिसे सिद्ध हो जाती है, कि भगवद्गीता महायान बौद्ध-पंथके जन्मसे पहले - अशोकसेभी पहले - याने सन ईसवीसे लगभग ३०० वर्ष पहलेही अस्तित्वमें थी। इन सब प्रमाणोंपर विचार करनेसे इसमें कुछभी शंका नही रह जाती, कि वर्तमान भगवद्गीता शालिवाहन शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहलेही अस्तित्वमें थी। डॉक्टर भांडारकर, परलोकवासी तेलंग, रावबहादुर चिंतामणराव वैद्य और पर- लोकवासी दीक्षितका मतभी इसमे बहुत-कुछ मिलता-जुलता है; और उसीको यहाँ ग्राह्य मानना चाहिये। हाँ, प्रोफेसर गार्वेका मत भिन्न है। उन्होंने उसके प्रमाणमें गीताके चौथे अध्यायवाले संप्रदाय-परंपराके श्लोकोंमेंसे 'योगो नष्टः' - योगका नाश हो गया - इस वाक्यको लेकर योग शब्दका अर्थ 'पातंजल योग' किया है। परंतु हमने प्रमाणसहित पहलेही बतला दिया है, कि वहाँ योग शब्दका अर्थ 'पातंजल- योग' नहीं - 'कर्मयोग' है। इसलिये प्रो गार्वेका मत भ्रममूलक अतएव अग्राह्य है। यह बात निर्विवाद है, कि वर्तमान गीताका काल शालिवाहन शकके पाँच सौ वर्ष पहलेकी अपेक्षा और कम नहीं माना जा सकता। पिछले भागमें यह बतलाही चुके हैं कि मूल गीता इससेभी कुछ सदियोंसे पहलेकी होनी चाहिये। भाग ६ - गीता और बौद्ध ग्रंथ वर्तमान गीताका काल निश्चित करनेके लिये पिछले भागमें जिन बौद्ध ग्रंथोंके प्रमाण दिये गये हैं, उनका पूरा पूरा महत्त्व समझनेके लिये गीता और बौद्ध ग्रंथ या बौद्ध धर्मकी साधारण समानता तथा विभिन्नता परभी यहाँ विचार करना आवश्यक है। पहले कई बार बतला चुके हैं, कि गीता-धर्मकी विशेषता यह है, कि गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ प्रवृत्तिमार्गावलंबी रहता है। परंतु इस विशेष गुणको थोड़ी देरके लिये अलग रख दें; और उक्त पुरुषके केवल मानसिक तथा नैतिक गुणोंहीका विचार करें, तो गीतामें स्थितप्रज्ञके (गीता २. ५५-७२), ब्रह्मनिष्ठ पुरुषके (४. १९-२३; ५. १८-२८) और भक्तियोगी पुरुषके (१२. १३- १९) जो लक्षण बतलाये हैं, उनमें और निर्वाणपदके अधिकारी अर्हतोंके अर्थात् पूर्णावस्थाको पहुंचे हुए बौद्ध भिक्षुओंके जो लक्षण भिन्न भिन्न बौद्ध ग्रंथोंमें दिये हुए हैं, उनमें विलक्षण समता दीख पड़ती है (धम्मपद श्लोक ३६०-४२३ और सुत्त- निपातोंमेंसे मुनिसुत्त तथा धम्मिकसुत्त देखो)। इतनाही नही; किंतु इन वर्णनोंके
५७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जल्दसामने दीख पड़ता है, कि स्थितप्रज्ञ अथवा भक्तिमान् पुरुषके समानही सच्चा भिक्षुभी 'शान्त', 'निष्काम', 'निर्मम', 'निराशी' (निर्लिप्सित), 'समदुःखसुख', 'निग्गब्भ', 'अनिकेतन' या 'अनिवेशन अथवा 'समाननिन्दा-स्तुति', और 'मान- अपमान तथा लाभ-अलाभको समान माननेवाला' रहता है (धम्मपद ८०, ८१ ९; मुत्तनि. मुनिसुत्त १. ३. १४; द्वयतानुपस्सनसुत्त २१-२३; और विनयपिटक चुल्लवग्ग. ७. ४. ३)। द्वयतानुपस्सनसुत्तके ७०वें श्लोकका यह विचार - ज्ञानी पुरुषके लिये जो प्रकाश है, वही अज्ञानीको अंधकार है - गीताके (गीता २. ६९) "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी" इस श्लोकान्तर्गत विचारके सदृश है। और मुनिसुत्तके १० वें श्लोकका यह वर्णन - "अरोसनेय्यो न रोमेति" अर्थात् न तो स्वयं कष्ट पाता है और न दूसरोंकोभी कष्ट देता है - गीताके "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः" (गीता १२. १५) इस वर्णनके समान है। इसी प्रकार सेल्लसुत्तके ये विचार, कि "जो कोई जन्म लेता है वह मरता है" और "प्राणियोंका आदि तथा अन्त अव्यक्त है, इसलिये उसका शोक करना वृथा है" (सेल्लसुत्त १. ९, गी. २. २७, २८), कुछ शब्दोंके हेरफेरसे गीताकेही विचार हैं। गीताके दसवे अध्यायमें अथवा अनुगीतामें (मभा अश्व. ४३, ४४) "ज्योतिष्मानांमें सूर्य, नक्षत्रोंमें चंद्र, और वेद-मंत्रोंमें गायत्री" आदि जो वर्णन है, वही सेल्लसुत्तके २१ वे और २२ वे श्लोकोंमें तथा महावग्गमें (६. ३५. ८) ज्यों- का-त्यों आया है। इसके सिवा शब्दसादृश्यके तथा अर्थसमानताके छोटे-मोटे उदाहरण परलोकवासी तेलंगने गीताके अपने अंग्रेजी अनुवादकी टिप्पणियोंमें दे दिये हैं। तथापि प्रश्न होते हैं, कि यह सदृशता हुई कैसे? ये विचार असलमें बौद्ध धर्मके हैं या वैदिक धर्मके? और इनसे अनुमान क्या निकलता है? किंतु इन प्रश्नोंको हल करनेके लिये उस समय जो साधन उपलब्ध थे वे अपूर्ण थे। यही कारण है, जो उपर्युक्त चमत्कारिक शब्दसादृश्य और अर्थ-सादृश्य दिखला देनेके सिवा परलोकवासी तेलंगने इस विषयमें और कोई विशेष बात नहीं लिखी। परंतु अब बौद्ध धर्मकी जो अधिक बातें उपलब्ध हो गई हैं, उनके उक्त प्रश्न हल किये जा सकते हैं इसलिये यहाँ पर बौद्ध धर्मकी उन बातोंका संक्षिप्त वर्णन किया जाता है। परलोकवासी तेलंगकृत गीताका अंग्रेजी अनुवाद जिस 'प्राच्यधर्म-ग्रंथमाला' में प्रकाशित हुआ था, उसीमें आगे चलकर पश्चिमी विद्वानोंने बौद्ध धर्म-ग्रंथोंके अंग्रेजी अनुवाद प्रसिद्ध किये हैं। ये बातें प्रायः उन्हींमें एकत्रित की गई हैं; और प्रमाणमें बौद्ध ग्रंथोंके जो स्थल बतलाये गये हैं, उनका मिलनाभी इसी मालाके अनुवादोंमें मिलेगा। कुछ स्थानोंपर पाली शब्दों तथा वाक्योंके अवतरण मूल पाली ग्रंथोंसेही उद्धृत किये गये हैं। अब यह बात निर्विवाद सिद्ध हो चुकी है, कि जैन धर्मके समान बौद्ध धर्मभी अपने वैदिक धर्म-रूप पिताकाही पुत्र है, जो जितनी चाहिये उतनी संपत्तिका हिस्सा
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७३ लेकर किसी कारणसे विभक्त हो गया है; अर्थात् वह कोई पराया नहीं है, किंतु उसके पहले यहाँपर जो ब्राह्मण-धर्म था, उसीकी यही उपजी हुई यह एक शाखा है। लंकाके महावंस या दीपवंस आदि प्राचीन पाली भाषाके ग्रंथोंमें बुद्धके पश्चा- द्वर्ती राजाओं तथा बौद्ध आचार्योंकी परंपराका जो वर्णन है, उसका हिसाब लगा कर देखनेसे ज्ञात होता है, कि गौतमबुद्धने अस्सी वर्षकी आयु पाकर ईसवी सनसे ५४३ वर्ष पहले अपना शरीर छोड़ा। परंतु इसमें कुछ बातें असंबद्ध हैं। इसलिये प्रोफेसर मेक्समूलरने इस गणनापर सूक्ष्म विचार करके बुद्धका यथार्थ निर्वाण- काल इसवी सनसे ४७३ वर्ष पहले बतलाया है; और डॉक्टर बुल्हरभी अशोकके शिलालेखोंमें इसी कालका सिद्ध होना प्रमाणित करते हैं। तथापि प्रोफेसर व्हिसडे- विड्स् या डॉ. केर्नके समान कुछ खोज करनेवाले इस कालको उक्त कालसे ३५ या १०० वर्ष औरभी आगे हटाना चाहते हैं। प्रोफेसर गायगरने हालहीमें इन सब मतोंकी जाँच करके बुद्धका यथार्थ निर्वाण-काल ईसवी सनसे ४८३ वर्ष पहले माना है।* इनमेंसे कोईभी काल क्यों न स्वीकार कर लिया जाय, यह निर्विवाद है, कि बुद्धका जन्म होनेके पहलेही वैदिक धर्म पूर्ण अवस्थामें पहुंच चुका था; और न केवल उप- निषदही किंतु धर्म-सूत्रोंके समान ग्रंथभी उससे पहलेही तैयार हो चुके थे। क्योंकि, पाली भाषाके प्राचीन बौद्ध धर्म-ग्रंथोंहीमें लिखा है, कि - "चारो वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास और निघंटु" आदि विषयोंमें प्रवीण कुछ सत्वशील ब्राह्मण गृहस्थों तथा जटिल तपस्वियोंसे स्वयं गौतमबुद्धने वाद करके उनको अपने धर्मकी दीक्षा दी (सुत्तनिपातोंमेंसे सेल्लसुत्तके सेल्लका वर्णन तथा वत्थुगाथा ३०-४५ देखो)। कठ आदि उपनिषदोंमें (कठ १. १८; मुंड. १. २. १०) अथवा उन्हींको लक्ष्य करके गीतामें (२. ४०-४५; ९. २०-२१) जिस प्रकार यज्ञयाग आदि श्रौतकर्मोंकी गौणताका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार तथा कुछ अंशोंमें उन्हीं शब्दोंके द्वारा तेविज्जसुत्तोंमें (त्रैविद्य-सूत्रों) बुद्धनेभी अपने मतानुसार 'यज्ञयागादि'को निरुपयोगी तथा त्याज्य बतलाया है; और इस बातका निरूपण किया है, कि ब्राह्मण जिसे ('ब्रह्मसहव्यत्यता'=ब्रह्मसायुज्यता) कहते हैं, वह अवस्था कैसे प्राप्त होती है। इससे यह बात स्पष्ट विदित होती है, कि ब्राह्मण-धर्मके कर्मकांड तथा ज्ञानकांड - अथवा गार्हस्थ्य-धर्म और संन्यास-धर्म, अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्ति - इन दोनों शाखाओके पूर्णतया रूढ हो जानेपर उनमें सुधार करनेके लिये बौद्ध धर्म उत्पन्न हुआ है। सुधारके विषयमें सामान्य नियम यह है, कि उसमें
- बुद्ध-निर्वाणकालविषयक वर्णन प्रो. मेक्समूलरने अपने 'धम्मपद'के अंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनामें (S. B. E. Vol. X. Intro. pp. xxxv-xlv) किया है; और उसकी परीक्षा डॉ. गायगरने सन् १९१२ में प्रकाशित अपने 'महावंश'के अनु- वादकी प्रस्तावनामें की है (The Mahavamsa by Dr. Geiger, Pali Text Society, Intro. p. xxii f).
पहलेकी कुछ बातें स्थिर रह जाती हैं; और कुछ बदल जाती हैं। अतएव इस न्यायके अनुसार अब इस बातका विचार करना चाहिये, कि बौद्ध धर्ममें वैदिक धर्मकी किन किन बातोंको स्थिर रख लिया है; और किनको छोड़ दिया है। यह विचार गार्हस्थ्य धर्म और संन्यास इन दोनोंकी पृथक् पृथक् दृष्टियोंसे, करना चाहिये। परंतु बौद्ध धर्म मूलमें संन्यास-मार्गीय अथवा केवल निवृत्ति-प्रधान है, इसलिये पहले दोनोंके संन्यास-धर्मका विचार करके अनंतर दोनोंके गार्हस्थ्य धर्मके तारतम्यपर विचार किया जायगा। वैदिक संन्यास-धर्मपर दृष्टि डालनेसे दीख पड़ता है, कि कर्ममय सृष्टिके सब व्यवहार तृष्णामूलक अतएव दुःखमय हैं; उसमें अर्थात् जन्म-मरणके भवचक्रसे आत्माका सर्वथा छुटकारा होनेके लिये मन निष्काम और विरक्त करना चाहिये तथा उसको दृश्यसृष्टिके मूलमें रहनेवाले आत्मस्वरूपी नित्य परब्रह्ममें स्थिर करके सांसारिक कर्मोंका सर्वथा त्याग करना उचित है, इस आत्मनिष्ठ स्थितिहीमें सदा निमग्न रहना संन्यास-धर्मका मुख्य तत्त्व है। दृश्य-सृष्टि नामरूपात्मक तथा नाशवान् है; और कर्मविपाकके कारणही उसका अखंडित व्यापार जारी है। कम्मना वत्तती लोको कम्मना वत्तती पजा ( प्रजा ) । कम्मनिबंधना सत्ता ( सत्त्वानि ) रथस्साऽणीव यायतो ॥ “कर्महीसे लोग और प्रजाभी जारी हैं। जिस प्रकार चलती हुई गाड़ी रथकी कीलसे नियंत्रित रहती है, उसी प्रकार प्राणिमात्र कर्मसे बंधा हुआ है” ( सुत्तनि. वासेठसुत्त ६१ )। वैदिक धर्मके ज्ञानकांडका उक्त तत्त्व, अथवा जन्म-मरणका चक्कर, या ब्रह्मा, इंद्र, महेश्वर, यम आदि अनेक देवता और उनके भिन्न भिन्न स्वर्ग-पाताल आदि लोकोंका ब्राह्मण-धर्ममें वर्णित अस्तित्वभी बुद्धको मान्य था; और इसी कारण नामरूप, कर्मविपाक, अविद्या, उपादान और प्रकृति वगैरह वेदान्त या सांख्य- शास्त्रके शब्द तथा ब्रह्मादि वैदिक देवताओंकी कथाएँभी ( बुद्धकी श्रेष्ठताको स्थिर रखकर ) कुछ हेरफेरसे बौद्ध ग्रंथोंमें पाई जाती हैं। यद्यपि बुद्धको वैदिक धर्मके कर्म सृष्टिविषयक ये सिद्धान्त मान्य थे, कि दृश्य सृष्टि नाशवान् और अनित्य है; एवं उसके व्यवहार कर्मविपाकके कारण जारी हैं; तथापि वैदिक धर्म अर्थात् उपनिषत्कारोंका यह सिद्धान्त उन्हें मान्य न था, कि नामरूपात्मक नाशवान् सृष्टिके मूलमें नामरूपसे व्यतिरिक्त आत्मस्वरूपी परब्रह्मके समान एक नित्य और सर्वव्यापक वस्तु है - इन दोनों धर्मोंमें जो विशेष भिन्नता है, वह यही है। गौतम- बुद्धने यह बात स्पष्ट रूपसे कह दी है, कि आत्मा या ब्रह्म यथार्थमें कुछ नहीं है - केवल भ्रम है, इसलिये आत्म-अनात्मके विचारमें या ब्रह्म-चिंतनके पचड़ेमें पड़कर किसीकोभी अपना समय न खोना चाहिये ( मघ्घामवमुत्त ९-१३ )। दीघनि- कायके ब्रह्मजालसुत्तोमेंभी यही बात स्पष्ट होती है, कि आत्माविषयक कोईभी