भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

५५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उक्त कालगणनासे यह बात स्पष्टतया विदित हो जाती है, कि भागवत धर्मका उदय ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले, अर्थात् बुद्धके लगभग सात-आठ सौ वर्ष पहले, हुआ है। यह काल बहुत प्राचीन है, तथापि यह ऊपर बतला चुके हैं कि ब्राह्मण-ग्रंथोंमें वर्णित कर्ममार्ग इससेभी अधिक प्राचीन है; और उपनिषदों तथा सांख्यशास्त्रमें वर्णित ज्ञानभी भागवत धर्मके उदयके पहले ही प्रचलित होकर सर्वमान्य हो गया था। ऐसी अवस्था में हमारे मनमें, यह कल्पना करना सर्वथा अनुचित है, कि उक्त ज्ञान तथा धर्मांगोंकी कुछ चिंता न करके श्रीकृष्णसरीखे ज्ञानी और चतुर पुरुषने अपना धर्म प्रवृत्त किया होगा; अथवा उनके प्रवृत्त करने परभी यह धर्म तत्कालीन राजर्षियों तथा ब्रह्मर्षियोंको मान्य हुआ होगा; और लोगोंमें उसका प्रसार हुआ होगा। ईसाने अपने भक्ति-प्रधान धर्मका उपदेश पहले पहल जिन यहूदी लोगोंको किया था, उनमें उस समय धार्मिक तत्त्वज्ञानका प्रसार नहीं हुआ था, इसलिये अपने धर्मका मेल तत्त्वज्ञानके साथ कर देनेकी उसे कोई आवश्यकता नहीं थी। केवल यह बतला देनेमें ईसाका धर्मोपदेश-संबंधी काम पूरा हो सकता था, कि पुरानी बाइबिलमें जिस कर्ममय धर्मका वर्णन किया गया है, हमारा यह भक्ति-मार्गभी उसीके लिये हुआ है; और उसने प्रयत्नभी केवल इतनाही किया है। परंतु ईसाई धर्मकी इन बातोंसे भागवत धर्मके इतिहासकी तुलना करने समय यह ध्यानमें रखना चाहिये, कि जिन लोगोंमें तथा जिस समय भागवत धर्मका प्रचार किया गया, उस समयके वे लोग केवल कर्म-मार्गीही नहीं, किंतु ब्रह्मज्ञान तथा कपिल-सांख्यशास्त्रसेभी परिचित हो गये थे; और इन तीनों धर्मांगोंकी एकवाक्यता (मेल) करनाभी सीख चुके थे। ऐसे लोगोंसे यह कहना किसी प्रकार उचित नहीं हुआ होता, कि "तुम अपने कर्मकांड या औपनिषदिक और सांख्यज्ञानको छोड़ दो; और केवल श्रद्धापूर्वक भागवत धर्मको स्वीकार कर लो।" ब्राह्मण आदि वैदिक ग्रंथोंमें वर्णित और उस समयमें प्रचलित यज्ञयाग आदि कर्मोंका फल क्या है? क्या उपनिषदोंका या सांख्यशास्त्रका ज्ञान वृथा है? भक्ति और चित्त-निरोधरूपी योगका मेल कैसे हो सकता है? - इत्यादि उस समय स्वभावतः उपस्थित होनेवाले प्रश्नोंका जबतक ठीक ठीक उत्तर न दिया जाता, तब भागवत धर्मका प्रचार होनाभी संभव नहीं था। अतएव न्यायकी दृष्टिसे अब यही कहना पड़ेगा, कि भागवत धर्ममें आरम्भहीमें इन सब विषयोंकी चर्चा करना अत्यंत आवश्यक था, और महाभारतार्न्तगत नारायणीयोपाख्यानके देखनेसेभी यह सिद्धान्त दृढ़ हो जाता है। इस आख्यानमें भागवत धर्मके साथ औप- निषदिक ब्रह्मज्ञानका और सांख्य-प्रतिपादित क्षराक्षर-विचारका मेल कर दिया गया है, और यहभी कहा है, कि "चार वेद और सांख्य तथा योग, इन पांचोंका उसमें (भागवत धर्ममें) समावेश होता है, इसलिये उसे पांचरात्र-धर्म नाम प्राप्त हुआ है (मभा. शा. ३३९. १०३); और "वेदारण्यकसहित (अर्थात् उपनिषदोंकोभी