श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५३ निषदका काल-निर्णयभी गणितकी रीतिसे सहजही किया जा सकता है। परंतु दीख पड़ता है, किसीनेभी इसका इस दृष्टिसे विचार नहीं किया है। मैत्र्युपनिषदमें वर्णित यह उदगयन-स्थिति वेदांगज्योतिषमें कही गई उदगयन-स्थितिके पहलेकी है। क्योंकि वेदांगज्योतिषमें यह बात स्पष्ट रूपसे दी गई है, कि उदगयनका आरंभ धनिष्ठा नक्षत्रके आरंभसे होता है, और मैत्र्युपनिषदमें उसका आरंभ 'धनिष्ठार्ध'से किया गया है। इस विषयमें मतभेद है, कि मैत्र्युपनिषदके 'श्रविष्ठा- र्धम्' शब्दमें जो 'अर्धम्' पद है, उसका अर्थ 'ठीक आधा' करना चाहिये; अथवा "धनिष्ठा और शततारकाके बीच किसी स्थानपर" करना चाहिये ? परंतु चाहे जो कहा जाए; इसमें तो कुछभी संदेह नहीं, कि वेदांगज्योतिषके पहलेकी उदगयन- स्थितिका वर्णन मैत्र्युपनिषदमें किया है; और वही उस समयकी स्थिति होनी चाहिये। अतएव यह कहना चाहिये, कि वेदांगज्योतिष-कालका उदगयन, मैत्र्युप- निषत्कालीन उदगयनकी अपेक्षा लगभग आधे नक्षत्रसे पीछे हट आया था। ज्योति- र्गणितसे यह सिद्ध होता है, कि वेदांगज्योतिषमें कही गई उदगयन-स्थिति ईसवी सनके लगभग १५०० या १४०० वर्ष पहलेकी है, * और आधे नक्षत्रसे उदगयनके पीछे हटनेमें लगभग ४८० वर्ष लग जाते हैं, इसलिये गणितसे यह बात निष्पन्न होती है, कि मैत्र्युपनिषद् ईसाके पहले १८८० से १६८० वर्षके बीच कभी-न-कभी बना होगा। और कुछ नहीं तो यह उपनिषद् निस्सन्देह वेदांगज्योतिषके पहलेका है। अब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि छांदोग्यादि जिन उपनिषदोंके अवतरण मैत्र्युपनिषदमें दिये गये हैं, वे उससेभी प्राचीन हैं। सारांश, इन सब ग्रंथोंके कालका निर्णय इस प्रकार हो चुका है, कि ऋग्वेद सन ईस्वीसे लगभग ४५०० वर्ष पहलेका है; यज्ञयाग आदि विषयक ब्राह्मण-ग्रंथ सन ईस्वीसे लगभग २५०० वर्ष पहलेके हैं; और छांदोग्य आदि ज्ञान-प्रधान उपनिषद् सन ईस्वीसे लगभग १६०० वर्ष पुराने हैं। अब यथार्थमें वे बातें अवशिष्ट नहीं रह जातीं, जिनके कारण पश्चिमी पंडित लोग भागवत धर्मके उदय-कालको आगेकी ओर हटा लानेका यत्न किया करते हैं; और श्रीकृष्ण तथा भागवत धर्मको गाय और बछड़ेकी नैसर्गिक जोड़ीके समान, एकही काल-रज्जुसे बांधनेमें कोई भयभी नहीं दीख पड़ता; एवं फिर बौद्ध ग्रंथकारों द्वारा वर्णित अथवा अन्य ऐतिहासिक स्थितियोंसेभी ठीक ठीक मेल हो जाता है। इसी समय वैदिक-कालकी समाप्ति हुई और सूत्र तथा स्मृति-कालका आरंभ हुआ है।
- वेदांगज्योतिषका कालविषयक विवेचन हमारे Orion (ओरायन) नामक अंग्रेजी ग्रंथमें तथा पं. बा. शंकर बालकृष्ण दीक्षितके 'भारतीय ज्योति शास्त्रचा इतिहास' मराठी ग्रंथमें (पृ ८३-९४ तथा १२७-१३९) किया गया है। उससे इस बातकाभी विचार किया गया है, उदगयनसे वैदिक ग्रंथोंका कौन-सा काल निश्चित किया जा सकता है।