श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह बतलाया है, कि ऋग्वेदके बाद ब्राह्मण आदि ग्रंथोंमें कृत्तिका प्रभृति नक्षत्रोंकी गणना है, इसलिये उनका काल ईसासे लगभग २५०० वर्ष पहले निश्चित करना पड़ता है। परन्तु हमारे देखनेमें यह अभीतक नहीं आया है कि उदगयन- स्थितिसे ग्रंथोंके कालका निर्णय करनेकी इस रीतिका प्रयोग उपनिषदोंके विषयमें किया गया हो। रामतापनीसरीखे भक्तिप्रधान तथा योगतत्त्वसरीखे योग-प्रधान उपनिषदोंकी भाषा और रचना प्राचीन नहीं दीख पड़ती, केवल इसी आधार- पर कई लोगों ने यह अनुमान किया है, कि सभी उपनिषद् प्राचीनतामें बुद्धकी अपेक्षा चार-पांच सौ वर्षसे अधिक नहीं हैं। परन्तु काल-निर्णयकी उपर्युक्त रीतिसे देखा जाए, तो यह समझ भ्रममूलक प्रतीत होगी। यह सच है, कि ज्योतिषकी रीतिसे सभी उपनिषदोंका काल निश्चित नहीं किया जा सकता; तथापि मुख्य मुख्य उपनिषदोंका काल निश्चित करनेके लिए इस रीतिका बहुत अच्छा उपयोग किया जा सकता है। भाषाकी दृष्टिसे देखा जाए, तो प्रो. मैक्समुलरका यह कथन है, कि मैत्र्युपनिषद् पाणिनीसेभी प्राचीन है * क्योंकि इस उपनिषदमें ऐसी कई छांदस शब्द-संधियोंका प्रयोग किया गया है, जो सिर्फ मैत्रायणी-संहितामेंही पायी जाती है; और जिनका प्रचार पाणिनीके समय बंद हो गया था। परंतु मैत्रायण्युपनिषद् कुछ सबसे पहला अर्थात् अति-प्राचीन उपनिषद् नहीं है। उसमें न केवल ब्रह्मज्ञान और सांख्यका मेलकर दिया है, किन्तु कई स्थानोंपर छांदोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य उपनिषदोंके वाक्य अथवा श्लोक भी उसमें प्रमाणार्थ उद्धृत किये गये हैं। हां, यह सच है, कि मैत्र्युप- निषदमें स्पष्ट रूपसे उक्त उपनिषदोंके नाम नहीं दिये गये हैं। परन्तु इन वाक्योंके पहले ऐसे परवाक्य-दर्शक पद रखे गये हैं, कि ' एवं ह्याह ' या ' उक्तं च ' ( = ऐसा कहा है ), इसलिये इस विषयमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि ये वाक्य दूसरे ग्रंथोंसे लिये गये हैं - स्वयं मैत्र्युपनिषत्कारके नहीं हैं, और अन्य उपनिषदोंको देखनेसे सहजही मालूम हो जाता है, कि ये वचन कहांसे उद्धृत किये हैं। अब इस मैत्र्युपनिषद्में कालरूपी अथवा संवत्सररूपी ब्रह्मका विवेचन करते समय यह वर्णन पाया जाता है कि " मघा नक्षत्रके आरंभसे क्रमशः श्रविष्ठा अर्थात् धनिष्ठा नक्षत्रके आधे भागपर पहुँचनेतक ( मघाद्यं श्रविष्ठार्धमन्तं ) दक्षिणायन होता है, और सार्प अर्थात् आश्लेषा नक्षत्रसे विपरीत क्रमपूर्वक, अर्थात् आश्लेषा, पुष्य आदि क्रमसे, पीछे गिनते हुए धनिष्ठा नक्षत्रके आधे भागतक उत्तरायण होता है " ( मैत्र्यु ६. १४)। इसमें संदेह नहीं, कि उदगयन-स्थितिदर्शक ये वचन तत्कालीन उदगयन-स्थितिको लक्ष्य करकेही कहे गये हैं; और फिर उससे इस उप-
- See Sacred Books of the East Series, Vol. XV, Intro, pp. xlviii--lii.