श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५१ ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले प्रचलित हुआ होगा; क्योंकि वैदिक धर्मसाहित्यमें यह क्रम निर्विवाद सिद्ध है, कि ऋग्वेदके बाद यज्ञयाग आदि कर्म-प्रतिपादक यजुर्वेद और ब्राह्मण-ग्रंथ बने। तदनंतर ज्ञान-प्रधान उपनिषद् और सांख्यशास्त्र निर्मित हुए; और अंतमें भक्ति-प्रधान ग्रंथ रचे गये; और केवल भागवत धर्मके ग्रंथोंका अवलोकन करनेसेभी स्पष्ट प्रतीत होता है, कि औपनिषदिक ज्ञान, सांख्यशास्त्र, चित्त-निरोधरूपी योग आदि धर्मांग भागवत धर्मके उदयके पहलेही प्रचलित हो चुके थे। समय की मनमानी खींचातानी करनेपरभी यही मानना पड़ता है, कि ऋग्वेदके बाद और भागवत धर्मके उदयके पहले, उक्त भिन्न भिन्न धर्मांगोंका प्रादुर्भाव तथा वृद्धि होनेके लिये, बीचमें कम-से-कम दस-बारह शतक अवश्य बीत गये होंगे। परंतु यदि माना जाए, कि भागवत धर्मको श्रीकृष्णने अपनेही समयमें – अर्थात् ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले – प्रवृत्त किया होगा; तो उक्त भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी वृद्धिके लिये उक्त पश्चिमी पंडितोंके मतानुसार कुछभी उचित कालावकाश नहीं रह जाता। क्योंकि, ये पंडित लोग ऋग्वेद-कालहीको ईसासे पहले १५०० तथा २००० वर्षसे अधिक प्राचीन नहीं मानते, ऐसी अवस्थामें यह मानना पड़ता है, कि सौ या अधिकसे अधिक पांच-छः सौ वर्षके बादही भागवत धर्मका उदय हो गया। इसलिये उपर्युक्त कथनानुसार कुछ निरर्थक कारण बतला कर वे लोग श्रीकृष्ण और भागवत धर्मकी समकालीनताको नहीं मानते; और यह कहनेके लियेभी उद्यत हो गये हैं, कि भागवत धर्मका उदय बुद्धके बाद हुआ होगा। परंतु जैन तथा बौद्ध ग्रंथोंमेंही भागवत धर्मके जो उल्लेख पाये जाते हैं, उनसे तो यही बात स्पष्ट विदित होती है कि भागवत धर्म बुद्धसे प्राचीन है। अतएव डॉ. बुल्हरने* कहा है, कि 'भागवत धर्मका उदय-काल बौद्ध-कालके आगे हटानेके बदले, हमारे 'ओरायन' ग्रंथके प्रतिपादनके अनुसार ऋग्वेदादि ग्रंथोंका कालही पीछे हटाया जाना चाहिये। पश्चिमी पंडितोंने अटकलपच्चू अनुमानोंसे वैदिक ग्रंथोंके जो काल निश्चित किये हैं, वे भ्रममूलक हैं; अतः वैदिक-कालकी पूर्वमर्यादा ईसाके पहले ४५०० वर्षसे कम नहीं ली जा सकती, इत्यादि बातोंको हमने अपने 'ओरायन' ग्रंथमें वेदोंके उदगयन-स्थिति-दर्शक वाक्योंके आधारपर सिद्ध कर दिया है, और यही अनुमान अब अधिकांश पश्चिमी पंडितोंकोभी ग्राह्य है। इस प्रकार ऋग्वेद-कालको पीछे हटानेसे वैदिक धर्मके सब अंगोंकी वृद्धि होनेके लिये उचित कालावकाश मिल जाता है; और भागवत-धर्मोदय-कालको संकुचित करनेका प्रयोजनही नहीं रह जाता! परलोकवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितने अपने (मराठी) "भारतीय ज्योतिःशास्त्र के इतिहास" में
- डॉ. बुल्हरने Indian Antiquary, September 1894 (Vol. XXIII, pp. 238--244) में हमारे 'ओरायन' ग्रंथकी जो समालोचना की है, उसे देखो।