भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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५५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (भाग. १२. २. २६; विष्णु. ४. २४. ३२)। उसीके आधारपर विद्वानोंने अब यह निश्चित किया है, कि ईसाई सनके लगभग १४०० वर्ष पहले भारतीय युद्ध और पांडव हुए होंगे। अर्थात् श्रीकृष्णका अवतार-कालभी यही है, और इस कालको स्वीकारकर लेनेपर यह बात सिद्ध होती है, कि श्रीकृष्णने भागवत धर्मको, ईसासे लगभग १४०० वर्ष पहले, अथवा बुद्धसे ८०० वर्ष पहले-प्रचलित किया होगा। इसपर कुछ लोग यह आक्षेप करते हैं, कि श्रीकृष्ण तथा पांडवोंके ऐति- हासिक पुरुष होनेमें कोई संदेह नहीं, परंतु श्रीकृष्णके जीवन-चरित्रमें उनके अनेक रूपान्तर दीख पड़ते हैं-जैसे श्रीकृष्ण नामक एक क्षत्रिय योद्धाको पहले महापुरुषका पद प्राप्त हुआ, पश्चात् विष्णुका पद मिला और धीरे धीरे अन्तमें पूर्ण परब्रह्मका रूप ब्राह्मणोंने प्राप्त हो गया-इन सब अवस्थाओंमें आरंभसे अंततक बहुत-सा काल बीत चुका होगा, इसीलिये भागवत-धर्मके उदयका तथा भारतीय युद्धका एक-ही काल नहीं माना जा सकता। परंतु यह आक्षेप निरर्थक है। "किसे देव मानना चाहिये; और किसे नहीं मानना चाहिये" इस विषयपर आधुनिक तर्कज्ञोंकी समझमें तथा दो-चार हज़ार वर्ष पहलेके लोगोंकी समझ (गीता १०. ४१) में बड़ा अंतर हो गया है। श्रीकृष्णके पहलेही बने हुए उपनिषदोंमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है (बृ. ४ ४. ६); और मैत्र्युपनिषदमें यह साफ़ साफ़ कह दिया है, कि रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण ये सब ब्रह्मही हैं (मैत्र्यु. ७. ३)। फिर श्रीकृष्णको परब्रह्मत्व प्राप्त होनेके लिये अधिक समय लगनेका कारण क्या है? इतिहासकी ओर देखनेसे विश्वसनीय बौद्ध ग्रंथोंमेंभी यह बात दीख पड़ती है, कि स्वयं अपनेको 'ब्रह्मभूत' (सेलसुत्त १४; थेरगाथा ८३१) कहलाता था, उसके जीवनकालहीमें उसे देवके सदृश सन्मान दिया जाता था और उसके स्वर्गस्थ होनेके बाद शीघ्र ही उसे 'देवाधिदेव' वा अथवा वैदिक धर्मके परमात्माका स्वरूप प्राप्त हो गया था, और उसकी पूजाभी हो गई थी। यही बात ईसा मसीहकीभी है। यह बात सच है कि बुद्ध तथा ईसाके समान श्रीकृष्ण संन्यासी नहीं थे, और न भागवत धर्मही निर्वाण-प्रधान है। परंतु केवल इसी आधारपर, बौद्ध तथा ईसाई धर्मके मूल पुरुषोंके समान, भागवत धर्मप्रवर्तक श्रीकृष्णकोभी पहलेहीसे ब्रह्म अथवा देवका स्वरूप प्राप्त होनेमें किसी बाधाके उपस्थित होनेका कारण दीख नहीं पड़ता। इस प्रकार श्रीकृष्णका समय निश्चित कर लेनेपर, उसी कालको भागवत धर्मका उदयकाल माननाभी प्रशस्त तथा सयुक्तिक है, परंतु सामान्यतः पश्चिमी पंडित ऐसा करनेमें जो हिचकिचाते हैं, उसका कारण कुछ औरही है। इन पंडितोंमेंसे अधिकांशका अबतक यही मत है कि खुद ऋग्वेदकाही काल ईसाके पहले लगभग १२०० वर्ष या बहुत हुआ तो २००० वर्षोंसे अधिक प्राचीन नहीं है। अतएव उन्हें अपनी दृष्टिसे यह कहना असम्भव प्रतीत होता है कि भक्ति-प्रधान भागवत धर्म