श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
५५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (भाग. १२. २. २६; विष्णु. ४. २४. ३२)। उसीके आधारपर विद्वानोंने अब यह निश्चित किया है, कि ईसाई सनके लगभग १४०० वर्ष पहले भारतीय युद्ध और पांडव हुए होंगे। अर्थात् श्रीकृष्णका अवतार-कालभी यही है, और इस कालको स्वीकारकर लेनेपर यह बात सिद्ध होती है, कि श्रीकृष्णने भागवत धर्मको, ईसासे लगभग १४०० वर्ष पहले, अथवा बुद्धसे ८०० वर्ष पहले-प्रचलित किया होगा। इसपर कुछ लोग यह आक्षेप करते हैं, कि श्रीकृष्ण तथा पांडवोंके ऐति- हासिक पुरुष होनेमें कोई संदेह नहीं, परंतु श्रीकृष्णके जीवन-चरित्रमें उनके अनेक रूपान्तर दीख पड़ते हैं-जैसे श्रीकृष्ण नामक एक क्षत्रिय योद्धाको पहले महापुरुषका पद प्राप्त हुआ, पश्चात् विष्णुका पद मिला और धीरे धीरे अन्तमें पूर्ण परब्रह्मका रूप ब्राह्मणोंने प्राप्त हो गया-इन सब अवस्थाओंमें आरंभसे अंततक बहुत-सा काल बीत चुका होगा, इसीलिये भागवत-धर्मके उदयका तथा भारतीय युद्धका एक-ही काल नहीं माना जा सकता। परंतु यह आक्षेप निरर्थक है। "किसे देव मानना चाहिये; और किसे नहीं मानना चाहिये" इस विषयपर आधुनिक तर्कज्ञोंकी समझमें तथा दो-चार हज़ार वर्ष पहलेके लोगोंकी समझ (गीता १०. ४१) में बड़ा अंतर हो गया है। श्रीकृष्णके पहलेही बने हुए उपनिषदोंमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है (बृ. ४ ४. ६); और मैत्र्युपनिषदमें यह साफ़ साफ़ कह दिया है, कि रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण ये सब ब्रह्मही हैं (मैत्र्यु. ७. ३)। फिर श्रीकृष्णको परब्रह्मत्व प्राप्त होनेके लिये अधिक समय लगनेका कारण क्या है? इतिहासकी ओर देखनेसे विश्वसनीय बौद्ध ग्रंथोंमेंभी यह बात दीख पड़ती है, कि स्वयं अपनेको 'ब्रह्मभूत' (सेलसुत्त १४; थेरगाथा ८३१) कहलाता था, उसके जीवनकालहीमें उसे देवके सदृश सन्मान दिया जाता था और उसके स्वर्गस्थ होनेके बाद शीघ्र ही उसे 'देवाधिदेव' वा अथवा वैदिक धर्मके परमात्माका स्वरूप प्राप्त हो गया था, और उसकी पूजाभी हो गई थी। यही बात ईसा मसीहकीभी है। यह बात सच है कि बुद्ध तथा ईसाके समान श्रीकृष्ण संन्यासी नहीं थे, और न भागवत धर्मही निर्वाण-प्रधान है। परंतु केवल इसी आधारपर, बौद्ध तथा ईसाई धर्मके मूल पुरुषोंके समान, भागवत धर्मप्रवर्तक श्रीकृष्णकोभी पहलेहीसे ब्रह्म अथवा देवका स्वरूप प्राप्त होनेमें किसी बाधाके उपस्थित होनेका कारण दीख नहीं पड़ता। इस प्रकार श्रीकृष्णका समय निश्चित कर लेनेपर, उसी कालको भागवत धर्मका उदयकाल माननाभी प्रशस्त तथा सयुक्तिक है, परंतु सामान्यतः पश्चिमी पंडित ऐसा करनेमें जो हिचकिचाते हैं, उसका कारण कुछ औरही है। इन पंडितोंमेंसे अधिकांशका अबतक यही मत है कि खुद ऋग्वेदकाही काल ईसाके पहले लगभग १२०० वर्ष या बहुत हुआ तो २००० वर्षोंसे अधिक प्राचीन नहीं है। अतएव उन्हें अपनी दृष्टिसे यह कहना असम्भव प्रतीत होता है कि भक्ति-प्रधान भागवत धर्म
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५१ ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले प्रचलित हुआ होगा; क्योंकि वैदिक धर्मसाहित्यमें यह क्रम निर्विवाद सिद्ध है, कि ऋग्वेदके बाद यज्ञयाग आदि कर्म-प्रतिपादक यजुर्वेद और ब्राह्मण-ग्रंथ बने। तदनंतर ज्ञान-प्रधान उपनिषद् और सांख्यशास्त्र निर्मित हुए; और अंतमें भक्ति-प्रधान ग्रंथ रचे गये; और केवल भागवत धर्मके ग्रंथोंका अवलोकन करनेसेभी स्पष्ट प्रतीत होता है, कि औपनिषदिक ज्ञान, सांख्यशास्त्र, चित्त-निरोधरूपी योग आदि धर्मांग भागवत धर्मके उदयके पहलेही प्रचलित हो चुके थे। समय की मनमानी खींचातानी करनेपरभी यही मानना पड़ता है, कि ऋग्वेदके बाद और भागवत धर्मके उदयके पहले, उक्त भिन्न भिन्न धर्मांगोंका प्रादुर्भाव तथा वृद्धि होनेके लिये, बीचमें कम-से-कम दस-बारह शतक अवश्य बीत गये होंगे। परंतु यदि माना जाए, कि भागवत धर्मको श्रीकृष्णने अपनेही समयमें – अर्थात् ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले – प्रवृत्त किया होगा; तो उक्त भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी वृद्धिके लिये उक्त पश्चिमी पंडितोंके मतानुसार कुछभी उचित कालावकाश नहीं रह जाता। क्योंकि, ये पंडित लोग ऋग्वेद-कालहीको ईसासे पहले १५०० तथा २००० वर्षसे अधिक प्राचीन नहीं मानते, ऐसी अवस्थामें यह मानना पड़ता है, कि सौ या अधिकसे अधिक पांच-छः सौ वर्षके बादही भागवत धर्मका उदय हो गया। इसलिये उपर्युक्त कथनानुसार कुछ निरर्थक कारण बतला कर वे लोग श्रीकृष्ण और भागवत धर्मकी समकालीनताको नहीं मानते; और यह कहनेके लियेभी उद्यत हो गये हैं, कि भागवत धर्मका उदय बुद्धके बाद हुआ होगा। परंतु जैन तथा बौद्ध ग्रंथोंमेंही भागवत धर्मके जो उल्लेख पाये जाते हैं, उनसे तो यही बात स्पष्ट विदित होती है कि भागवत धर्म बुद्धसे प्राचीन है। अतएव डॉ. बुल्हरने* कहा है, कि 'भागवत धर्मका उदय-काल बौद्ध-कालके आगे हटानेके बदले, हमारे 'ओरायन' ग्रंथके प्रतिपादनके अनुसार ऋग्वेदादि ग्रंथोंका कालही पीछे हटाया जाना चाहिये। पश्चिमी पंडितोंने अटकलपच्चू अनुमानोंसे वैदिक ग्रंथोंके जो काल निश्चित किये हैं, वे भ्रममूलक हैं; अतः वैदिक-कालकी पूर्वमर्यादा ईसाके पहले ४५०० वर्षसे कम नहीं ली जा सकती, इत्यादि बातोंको हमने अपने 'ओरायन' ग्रंथमें वेदोंके उदगयन-स्थिति-दर्शक वाक्योंके आधारपर सिद्ध कर दिया है, और यही अनुमान अब अधिकांश पश्चिमी पंडितोंकोभी ग्राह्य है। इस प्रकार ऋग्वेद-कालको पीछे हटानेसे वैदिक धर्मके सब अंगोंकी वृद्धि होनेके लिये उचित कालावकाश मिल जाता है; और भागवत-धर्मोदय-कालको संकुचित करनेका प्रयोजनही नहीं रह जाता! परलोकवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितने अपने (मराठी) "भारतीय ज्योतिःशास्त्र के इतिहास" में
- डॉ. बुल्हरने Indian Antiquary, September 1894 (Vol. XXIII, pp. 238--244) में हमारे 'ओरायन' ग्रंथकी जो समालोचना की है, उसे देखो।
५५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह बतलाया है, कि ऋग्वेदके बाद ब्राह्मण आदि ग्रंथोंमें कृत्तिका प्रभृति नक्षत्रोंकी गणना है, इसलिये उनका काल ईसासे लगभग २५०० वर्ष पहले निश्चित करना पड़ता है। परन्तु हमारे देखनेमें यह अभीतक नहीं आया है कि उदगयन- स्थितिसे ग्रंथोंके कालका निर्णय करनेकी इस रीतिका प्रयोग उपनिषदोंके विषयमें किया गया हो। रामतापनीसरीखे भक्तिप्रधान तथा योगतत्त्वसरीखे योग-प्रधान उपनिषदोंकी भाषा और रचना प्राचीन नहीं दीख पड़ती, केवल इसी आधार- पर कई लोगों ने यह अनुमान किया है, कि सभी उपनिषद् प्राचीनतामें बुद्धकी अपेक्षा चार-पांच सौ वर्षसे अधिक नहीं हैं। परन्तु काल-निर्णयकी उपर्युक्त रीतिसे देखा जाए, तो यह समझ भ्रममूलक प्रतीत होगी। यह सच है, कि ज्योतिषकी रीतिसे सभी उपनिषदोंका काल निश्चित नहीं किया जा सकता; तथापि मुख्य मुख्य उपनिषदोंका काल निश्चित करनेके लिए इस रीतिका बहुत अच्छा उपयोग किया जा सकता है। भाषाकी दृष्टिसे देखा जाए, तो प्रो. मैक्समुलरका यह कथन है, कि मैत्र्युपनिषद् पाणिनीसेभी प्राचीन है * क्योंकि इस उपनिषदमें ऐसी कई छांदस शब्द-संधियोंका प्रयोग किया गया है, जो सिर्फ मैत्रायणी-संहितामेंही पायी जाती है; और जिनका प्रचार पाणिनीके समय बंद हो गया था। परंतु मैत्रायण्युपनिषद् कुछ सबसे पहला अर्थात् अति-प्राचीन उपनिषद् नहीं है। उसमें न केवल ब्रह्मज्ञान और सांख्यका मेलकर दिया है, किन्तु कई स्थानोंपर छांदोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य उपनिषदोंके वाक्य अथवा श्लोक भी उसमें प्रमाणार्थ उद्धृत किये गये हैं। हां, यह सच है, कि मैत्र्युप- निषदमें स्पष्ट रूपसे उक्त उपनिषदोंके नाम नहीं दिये गये हैं। परन्तु इन वाक्योंके पहले ऐसे परवाक्य-दर्शक पद रखे गये हैं, कि ' एवं ह्याह ' या ' उक्तं च ' ( = ऐसा कहा है ), इसलिये इस विषयमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि ये वाक्य दूसरे ग्रंथोंसे लिये गये हैं - स्वयं मैत्र्युपनिषत्कारके नहीं हैं, और अन्य उपनिषदोंको देखनेसे सहजही मालूम हो जाता है, कि ये वचन कहांसे उद्धृत किये हैं। अब इस मैत्र्युपनिषद्में कालरूपी अथवा संवत्सररूपी ब्रह्मका विवेचन करते समय यह वर्णन पाया जाता है कि " मघा नक्षत्रके आरंभसे क्रमशः श्रविष्ठा अर्थात् धनिष्ठा नक्षत्रके आधे भागपर पहुँचनेतक ( मघाद्यं श्रविष्ठार्धमन्तं ) दक्षिणायन होता है, और सार्प अर्थात् आश्लेषा नक्षत्रसे विपरीत क्रमपूर्वक, अर्थात् आश्लेषा, पुष्य आदि क्रमसे, पीछे गिनते हुए धनिष्ठा नक्षत्रके आधे भागतक उत्तरायण होता है " ( मैत्र्यु ६. १४)। इसमें संदेह नहीं, कि उदगयन-स्थितिदर्शक ये वचन तत्कालीन उदगयन-स्थितिको लक्ष्य करकेही कहे गये हैं; और फिर उससे इस उप-
- See Sacred Books of the East Series, Vol. XV, Intro, pp. xlviii--lii.
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५३ निषदका काल-निर्णयभी गणितकी रीतिसे सहजही किया जा सकता है। परंतु दीख पड़ता है, किसीनेभी इसका इस दृष्टिसे विचार नहीं किया है। मैत्र्युपनिषदमें वर्णित यह उदगयन-स्थिति वेदांगज्योतिषमें कही गई उदगयन-स्थितिके पहलेकी है। क्योंकि वेदांगज्योतिषमें यह बात स्पष्ट रूपसे दी गई है, कि उदगयनका आरंभ धनिष्ठा नक्षत्रके आरंभसे होता है, और मैत्र्युपनिषदमें उसका आरंभ 'धनिष्ठार्ध'से किया गया है। इस विषयमें मतभेद है, कि मैत्र्युपनिषदके 'श्रविष्ठा- र्धम्' शब्दमें जो 'अर्धम्' पद है, उसका अर्थ 'ठीक आधा' करना चाहिये; अथवा "धनिष्ठा और शततारकाके बीच किसी स्थानपर" करना चाहिये ? परंतु चाहे जो कहा जाए; इसमें तो कुछभी संदेह नहीं, कि वेदांगज्योतिषके पहलेकी उदगयन- स्थितिका वर्णन मैत्र्युपनिषदमें किया है; और वही उस समयकी स्थिति होनी चाहिये। अतएव यह कहना चाहिये, कि वेदांगज्योतिष-कालका उदगयन, मैत्र्युप- निषत्कालीन उदगयनकी अपेक्षा लगभग आधे नक्षत्रसे पीछे हट आया था। ज्योति- र्गणितसे यह सिद्ध होता है, कि वेदांगज्योतिषमें कही गई उदगयन-स्थिति ईसवी सनके लगभग १५०० या १४०० वर्ष पहलेकी है, * और आधे नक्षत्रसे उदगयनके पीछे हटनेमें लगभग ४८० वर्ष लग जाते हैं, इसलिये गणितसे यह बात निष्पन्न होती है, कि मैत्र्युपनिषद् ईसाके पहले १८८० से १६८० वर्षके बीच कभी-न-कभी बना होगा। और कुछ नहीं तो यह उपनिषद् निस्सन्देह वेदांगज्योतिषके पहलेका है। अब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि छांदोग्यादि जिन उपनिषदोंके अवतरण मैत्र्युपनिषदमें दिये गये हैं, वे उससेभी प्राचीन हैं। सारांश, इन सब ग्रंथोंके कालका निर्णय इस प्रकार हो चुका है, कि ऋग्वेद सन ईस्वीसे लगभग ४५०० वर्ष पहलेका है; यज्ञयाग आदि विषयक ब्राह्मण-ग्रंथ सन ईस्वीसे लगभग २५०० वर्ष पहलेके हैं; और छांदोग्य आदि ज्ञान-प्रधान उपनिषद् सन ईस्वीसे लगभग १६०० वर्ष पुराने हैं। अब यथार्थमें वे बातें अवशिष्ट नहीं रह जातीं, जिनके कारण पश्चिमी पंडित लोग भागवत धर्मके उदय-कालको आगेकी ओर हटा लानेका यत्न किया करते हैं; और श्रीकृष्ण तथा भागवत धर्मको गाय और बछड़ेकी नैसर्गिक जोड़ीके समान, एकही काल-रज्जुसे बांधनेमें कोई भयभी नहीं दीख पड़ता; एवं फिर बौद्ध ग्रंथकारों द्वारा वर्णित अथवा अन्य ऐतिहासिक स्थितियोंसेभी ठीक ठीक मेल हो जाता है। इसी समय वैदिक-कालकी समाप्ति हुई और सूत्र तथा स्मृति-कालका आरंभ हुआ है।
- वेदांगज्योतिषका कालविषयक विवेचन हमारे Orion (ओरायन) नामक अंग्रेजी ग्रंथमें तथा पं. बा. शंकर बालकृष्ण दीक्षितके 'भारतीय ज्योति शास्त्रचा इतिहास' मराठी ग्रंथमें (पृ ८३-९४ तथा १२७-१३९) किया गया है। उससे इस बातकाभी विचार किया गया है, उदगयनसे वैदिक ग्रंथोंका कौन-सा काल निश्चित किया जा सकता है।
५५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उक्त कालगणनासे यह बात स्पष्टतया विदित हो जाती है, कि भागवत धर्मका उदय ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले, अर्थात् बुद्धके लगभग सात-आठ सौ वर्ष पहले, हुआ है। यह काल बहुत प्राचीन है, तथापि यह ऊपर बतला चुके हैं कि ब्राह्मण-ग्रंथोंमें वर्णित कर्ममार्ग इससेभी अधिक प्राचीन है; और उपनिषदों तथा सांख्यशास्त्रमें वर्णित ज्ञानभी भागवत धर्मके उदयके पहले ही प्रचलित होकर सर्वमान्य हो गया था। ऐसी अवस्था में हमारे मनमें, यह कल्पना करना सर्वथा अनुचित है, कि उक्त ज्ञान तथा धर्मांगोंकी कुछ चिंता न करके श्रीकृष्णसरीखे ज्ञानी और चतुर पुरुषने अपना धर्म प्रवृत्त किया होगा; अथवा उनके प्रवृत्त करने परभी यह धर्म तत्कालीन राजर्षियों तथा ब्रह्मर्षियोंको मान्य हुआ होगा; और लोगोंमें उसका प्रसार हुआ होगा। ईसाने अपने भक्ति-प्रधान धर्मका उपदेश पहले पहल जिन यहूदी लोगोंको किया था, उनमें उस समय धार्मिक तत्त्वज्ञानका प्रसार नहीं हुआ था, इसलिये अपने धर्मका मेल तत्त्वज्ञानके साथ कर देनेकी उसे कोई आवश्यकता नहीं थी। केवल यह बतला देनेमें ईसाका धर्मोपदेश-संबंधी काम पूरा हो सकता था, कि पुरानी बाइबिलमें जिस कर्ममय धर्मका वर्णन किया गया है, हमारा यह भक्ति-मार्गभी उसीके लिये हुआ है; और उसने प्रयत्नभी केवल इतनाही किया है। परंतु ईसाई धर्मकी इन बातोंसे भागवत धर्मके इतिहासकी तुलना करने समय यह ध्यानमें रखना चाहिये, कि जिन लोगोंमें तथा जिस समय भागवत धर्मका प्रचार किया गया, उस समयके वे लोग केवल कर्म-मार्गीही नहीं, किंतु ब्रह्मज्ञान तथा कपिल-सांख्यशास्त्रसेभी परिचित हो गये थे; और इन तीनों धर्मांगोंकी एकवाक्यता (मेल) करनाभी सीख चुके थे। ऐसे लोगोंसे यह कहना किसी प्रकार उचित नहीं हुआ होता, कि "तुम अपने कर्मकांड या औपनिषदिक और सांख्यज्ञानको छोड़ दो; और केवल श्रद्धापूर्वक भागवत धर्मको स्वीकार कर लो।" ब्राह्मण आदि वैदिक ग्रंथोंमें वर्णित और उस समयमें प्रचलित यज्ञयाग आदि कर्मोंका फल क्या है? क्या उपनिषदोंका या सांख्यशास्त्रका ज्ञान वृथा है? भक्ति और चित्त-निरोधरूपी योगका मेल कैसे हो सकता है? - इत्यादि उस समय स्वभावतः उपस्थित होनेवाले प्रश्नोंका जबतक ठीक ठीक उत्तर न दिया जाता, तब भागवत धर्मका प्रचार होनाभी संभव नहीं था। अतएव न्यायकी दृष्टिसे अब यही कहना पड़ेगा, कि भागवत धर्ममें आरम्भहीमें इन सब विषयोंकी चर्चा करना अत्यंत आवश्यक था, और महाभारतार्न्तगत नारायणीयोपाख्यानके देखनेसेभी यह सिद्धान्त दृढ़ हो जाता है। इस आख्यानमें भागवत धर्मके साथ औप- निषदिक ब्रह्मज्ञानका और सांख्य-प्रतिपादित क्षराक्षर-विचारका मेल कर दिया गया है, और यहभी कहा है, कि "चार वेद और सांख्य तथा योग, इन पांचोंका उसमें (भागवत धर्ममें) समावेश होता है, इसलिये उसे पांचरात्र-धर्म नाम प्राप्त हुआ है (मभा. शा. ३३९. १०३); और "वेदारण्यकसहित (अर्थात् उपनिषदोंकोभी
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५५ लेकर) ये सब (शास्त्र) परस्पर एक दूसरेके अंग हैं (मभा. शां. ३४८. ८२)। 'पाञ्चरात्र' शब्दकी यह निरुक्ति व्याकरणकी दृष्टिसे चाहे शुद्ध न हो, तथापि उससे यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि सब प्रकारके ज्ञानकी एकवाक्यता भागवत धर्ममें आरम्भहीसेकी गई थी। परंतु भक्तिके साथ अन्य सब धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनाही भागवत धर्मकी प्रधान विशेषता नहीं है। यह नहीं, कि भक्तिके धर्मतत्त्वको पहले भागवत धर्महीने प्रवृत्त किया हो। ऊपर दिये हुए मैत्र्युपनिषदके (मैत्र्यु. ३. ३) वाक्यों से यह बात प्रकट है, कि रुद्रकी या विष्णुकी किसी न किसी स्वरूपकी भक्ति, भागवत धर्मका उदय होनेके पहलेही जारी हो चुकी थी; और यह भावनाभी पहलेही उत्पन्न हो चुकी थी, कि उपास्य कुछभी हो; वह ब्रह्महीका प्रतीक अथवा एक प्रकारका रूप है। यह सच है, कि रुद्र आदि उपास्योंके बदले भागवत धर्ममें वासुदेव उपास्य माना गया है; परंतु गीता तथा नारायणीयोपाख्यानमेंभी यह कहा है, कि भक्ति चाहे जिसकी की जाय; वह एक भगवान्हीके प्रति पहुँचती है; रुद्र और भगवान् भिन्न भिन्न नहीं हैं, (गीता ९. २३; मभा. शा. ३४१. २०-२६)। अतएव केवल वासुदेवभक्तिही भागवत धर्मका मुख्य लक्षण नहीं मानी जा सकती। जिस सात्वत-जातिमें भागवत धर्म प्रादुर्भूत हुआ, उस जातिके सात्यकि आदि पुरुष, परम भगवद्भक्त भीष्म और अर्जुन, तथा स्वयं श्रीकृष्णभी बड़े पराक्रमी एवं दूसरोंसे पराक्रमके कार्य करानेवाले हो गये हैं। अतएव अन्य भगवद्भक्तोंकोभी उचित था, कि वे इसी आदर्शको अपने सम्मुख रखें; और तत्कालीन प्रचलित चातुर्वर्ण्यके अनुसार युद्ध आदि सब व्यावहारिक कर्म करें - बस, यही मूल भागवत धर्मका मुख्य विषय था। यह बात नहीं, कि भक्तिके तत्त्वको स्वीकार करके वैराग्ययुक्त बुद्धिसे संसारका त्याग करनेवाले पुरुष उस समय बिलकुल ही न होंगे। परंतु, यह सात्वतोंके या श्रीकृष्णके भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व नहीं है। श्रीकृष्णजीके उपदेशका सार यही है, कि भक्तिसे परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपर भगवद्भक्तको परमेश्वरके समान जगत्के धारण-पोषणके लिये सदा यत्न करते रहना चाहिये। उपनिषत्कालमें जनक आदिकोंनेभी यह निश्चित कर दिया था, कि ब्रह्मज्ञानी पुरुषके लियेभी निष्काम कर्म करना कोई अनुचित बात नहीं। परंतु उस समय उसमें भक्तिका समावेश नहीं किया गया था; और इसके सिवा ज्ञानोत्तर कर्म करना अथवा न करना हर एककी इच्छापर अवलंबित था - अर्थात् वैकल्पिक समझा जाता था (वे. सू. ३. ४. १५)। वैदिक धर्मके इतिहासमें भागवत धर्मने जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्मार्त-धर्मसे विभिन्न कार्य किया, वह यह है कि उस (भागवत धर्म) ने कुछ कदम आगे बढ़कर केवल निवृत्तिकी अपेक्षा निष्काम कर्म-प्रधान प्रवृत्ति-मार्ग (नैष्कर्म्य) को अधिक श्रेयस्कर ठहराया; और केवल ज्ञानसेही नहीं, किंतु भक्तिसेभी कर्मका उचित मेल कर दिया। इस धर्मके मूल प्रवर्तक नर और नारायण ऋषिभी इसी प्रकार सब
५५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र काम निष्काम बुद्धिसे किया करने थे; और महाभारत (मभा. उद्यो. ४८. २१, २२) में कहा है कि सब योगोंको उनके समान कर्म करनाही उचित है। नारायणीय आख्यानमें तो भागवत धर्मका लक्षण स्पष्ट बतलाया है, कि "प्रवृत्ति- लक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः" (मभा. शां. ३४७. ८१) - नारायणीय अथवा भागवत धर्म प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान है। नारायणीय या मूल भागवत धर्मका जो निष्काम प्रवृत्ति-तत्त्व है, उसीका नाम नैष्कर्म्य है, और यही मूल भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व है। परंतु, भागवत-पुराणसे यह बात दीख पड़ती है; कि आगे कालांतरमें यह तत्त्व मंद होने लगा और इस धर्ममें तो वैराग्य-प्रधान वासुदेव-भक्ति श्रेष्ठ मानी जाने लगी। नारद-पंचरात्रमें भक्तिके साथ साथ मंत्रतंत्रोंकाभी समावेश भागवत धर्ममें कर दिया गया है। तथापि, भागवतहीमे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि ये सब इस धर्मके मूल स्वरूप नहीं हैं। क्योंकि, भागवत (भाग. १. ३. ८; ११. ४. ४६) मेंही यह कहा है, कि जहाँ नारायणीय अथवा सात्वत-धर्मके विषयमें कुछ कहनेका मौका आया है, वहाँ सात्वत-धर्म या नारायण ऋषिका धर्म (अर्थात् भागवत धर्म) 'नैष्कर्म्यलक्षण' है; और आगे यहभी कहा है, कि इस नैष्कर्म्य-धर्ममें भक्तिको उचित महत्त्व नहीं दिया गया था, इसलिये भक्ति-प्रधान भागवत-पुराण कहना पड़ा (भाग. १. ५. १२)। इससे यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है, कि मूल भागवत धर्म नैष्कर्म्य-प्रधान अर्थात् निष्काम कर्म-प्रधान था; किंतु आगे समयके हेरफेरसे उसका स्वरूप बदलकर वह भक्ति-प्रधान हो गया। गीतारहस्यमें ऐसी ऐतिहासिक बातोंका विवेचन पहलेही हो चुका है, कि ज्ञान तथा भक्तिसे पराक्रमका सदैव संबंध रखनेवाले मूल भागवत धर्ममें और आश्रम-व्यवस्थारूपी स्मार्त-मार्गमें क्या भेद है? केवल संन्यास-प्रधान जैन और बौद्ध धर्मके प्रसारसे भागवत धर्मके कर्मयोगकी अवनति होकर उसे दूसराही स्वरूप अर्थात् वैराग्ययुक्त भक्ति-स्वरूप कैसे प्राप्त हुआ? और बौद्ध धर्मका ह्रास होनेके बाद जो वैदिक संप्रदाय प्रवृत्त हुए; उनमेंसे कुछने तो अंतमें भगवद्गीताहीको संन्यास-प्रधान, कुछने केवल भक्ति- प्रधान तथा कुछने विशिष्टाद्वैत-प्रधान स्वरूप कैसे दे दिया। उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचनसे यह बात समझमें आ जाएगी, कि वैदिक धर्मके सनातन प्रवाहमें भागवत धर्मका उदय कब हुआ? और पहले उसके प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान रहनेपरभी आगे चलकर भक्ति-प्रधान स्वरूप एवं अंतमें रामानुजा- चार्यके समय विशिष्टाद्वैती स्वरूप कैसे प्राप्त हो गया। भागवत धर्मके इन भिन्न भिन्न स्वरूपोंमेंसे जो मूलारंभका अर्थात निष्काम कर्म-प्रधान स्वरूप है, वही गीता-धर्मका स्वरूप है। अब यहाँपर संक्षेपमें यह बतलाया जाएगा, कि उक्त प्रकारकी मूल गीताके कालके विषयमें क्या अनुमान किया जा सकता है? श्रीकृष्ण तथा भारतीय युद्धका काल यद्यपि एकही है, अर्थात सन ईसवीके पहले लगभग १४०० वर्ष है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता, कि भागवत धर्मके ये दोनों प्रधान ग्रंथ - मूल गीता तथा
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५७ मूल भारत — उसी समय रचे गये होंगे । किसीभी धर्म-ग्रंथका उदय होनेपर तुरंतही उस धर्मपर ग्रंथ रचे नहीं जाते; और भारत तथा गीताके विषयमेंभी यही न्याय पर्याप्त होता है । वर्तमान महाभारतके आरंभमें यह कथा है, कि जब भारतीय युद्ध समाप्त हो चुका; और जब पांडवोंका पोता ( पौत्र ) जनमेजय सर्प-सत्र कर रहा था, तब वहाँ वैशंपायनने जनमेजयको पहले पहल गीतासहित भारत सुनाया था; और आगे जब वही सौतीने शौनकको सुनाया, तभीसे भारत प्रचलित हुआ । यह बात प्रकट है, कि सौती आदि पौराणिकोंके मुखसे निकलकर आगे भारतको काव्यमय ग्रंथका स्थायी स्वरूप प्राप्त होनेमें कुछ समय अवश्य बीत गया होगा । परंतु इस कालका निर्णय करनेके लिये अब कोई साधन उपलब्ध नहीं है । ऐसी अवस्थामें यदि यह मान लिया जाए, कि भारतीय युद्धके लगभग पांच सौ वर्षके भीतरही आर्ष महाकाव्यात्मक मूल भारत निर्मित हुआ होगा, तो कुछ विशेष साहसकी बात नहीं होगी । क्योंकि बौद्ध धर्मके ग्रंथ, बुद्धकी मृत्युके बाद, इससेभी जल्दी तैयार हुए हैं । • अब आर्ष महाकाव्यमें नायकका केवल पराक्रम बतला देनेसेही काम नहीं चलता; किंतु उसमें यहभी बतलाना पड़ता है, कि नायक जो कुछ करता है, वह उचित है या अनुचित ! इतनाही क्यों ? संस्कृतके अतिरिक्त अन्य साहित्योंमें जो उक्त प्रकारके महाकाव्य हैं, उनसेभी यही ज्ञात होता है, कि नायकके कार्योंके गुण-दोषोंका विवेचन करना आर्ष महाकाव्यका एक प्रधान भाग होता है । अर्वाचीन दृष्टिसे देखा जाए, तो कहना पड़ेगा, कि नायकोंके कार्योंका समर्थन केवल नीतिशास्त्रके आधारपर करना चाहिये । किंतु प्राचीन समयमें धर्म तथा नीतिमे पृथक् भेद नहीं माना जाता था, अतएव उक्त समर्थनके लिए धर्म-दृष्टिके सिवा अन्य मार्ग नहीं था। फिर यह बतला- नेकी आवश्यकता नही, कि जो भागवत धर्म भारतके नायकोको ग्राह्य हुआ था अथवा जो उन्हीके द्वारा प्रवृत्त किया गया था, उसी भागवत धर्मके आधारपर उनके कार्योंका समर्थन करनाभी आवश्यक था । इसके सिवा दूसरा कारण यहभी है, कि भागवत धर्मके अतिरिक्त तत्कालीन प्रचलित अन्य वैदिक धर्मपंथ न्यूनाधिक रीतिमे अथवा सर्वथा निवृत्ति-प्रधान थे, इसलिये उनमें वर्णित-धर्मतत्त्वोंके आधारपर भारतके नायकोंकी वीरताका पूर्णतया समर्थन करना संभव नहीं था । अतएव कर्मयोग-प्रधान भागवत धर्मका निरूपण महाकाव्यात्मक मूल भारतहीमें करना आवश्यक था । यही मूल गीता है, और यदि भागवत धर्मके मूल स्वरूपका उपपत्तिसहित प्रतिपादन करनेवाला सबसे पहला ग्रंथ यह न भी हो; तो यह स्थूल अनुमान किया जा सकता है, कि यह आदि-ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है; और इसका काल ईसासे लगभग ९०० वर्ष पहले है । इस प्रकार गीता यदि भागवत धर्म-प्रधान पहला ग्रंथ न हो, तोभी वह मुख्य ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है, इसलिये इस बातका दिग्दर्शन करना आवश्यक था, कि उसमें प्रतिपादित निष्काम कर्मयोग तत्कालीन प्रचलित अन्य धर्म-पंथोंसे — अर्थात् कर्मकांडसे, औपनिषदिक ज्ञानसे, सांख्यसे, चित्तनिरोधरूपी योगसे तथा भक्तिसेभी —
५५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अविरुद्ध है; इतनाही नहीं, किंतु यही इस ग्रंथका मुख्य प्रयोजनभी कहा जा सकता है। नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछेसे बने हैं, इसलिये उनका प्रतिपादन मूल गीतामें नहीं आ सकता और यही कारण है, कि कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वेदान्त विषय गीतामें पीछेसे मिला दिया गया है। परंतु नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछे भलेही बने हों; किंतु इसमें कोई संदेह नहीं, कि इन शास्त्रोंके प्रतिपाद्य विषय बहुत प्राचीन हैं, और इस बातका उल्लेख हम ऊपर करही आये हैं। अतएव मूल गीतामें इन विषयोंका प्रवेश होना काल-दृष्टिसे किसी प्रकार विपरीत नही कहा जा सकता। तथापि हम यहभी नहीं कहते, कि जब मूल भारतका महाभारत बनाया गया होगा, तब मूल गीतामे कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ होगा। किसीभी धर्म-पंथको लीजिये: उसके इतिहासमे तो यही बात प्रकट होती है, कि उसमें समय-समयपर मतभेद होकर अनेक उपपंथ निर्माण हो जाया करते है। यही बात भागवत धर्मके विषयमेंभी कही जा सकती है। नारायणीयाख्यानमें (मभा. शा. ३४८. ५३ ) यह बात स्पष्ट रूप कह दी गई है, कि भागवत धर्मको कुछ लोग तो चतुर्व्यूह - अर्थात् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, इस प्रकार चार व्यूहोका मानते हैं; और कुछ लोग त्रिव्यूह, द्विव्यूह या एकव्यूहही मानते है। आगे चलकर, ऐसेही औरभी अनेक मतभेद उपस्थित हुए होंगे। इसी प्रकार औपनिषदिक और सांख्यज्ञानकीभी वृद्धि हो रही थी। अतएव इस बातकी सावधानी रखना अस्वाभाविक या मूल गीताके हेतुके विरुद्धभी नहीं था, कि मूल गीतामें जो कुछ विभिन्नता हो, वह दूर हो जावे; और बढ़ते हुए पिंडब्रह्मांडज्ञानसे भागवत धर्मका पूर्णतया मेल हो जावे। हमने पहले 'गीता और ब्रह्मसूत्र' शीर्षक लेखमें यह बतला दिया है, कि इसी कारणमे वर्तमान गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख पाया जाता है। इसके सिवा, उक्त प्रकारके अन्य परिवर्तनभी मूल गीतामें हो गये होंगे। परंतु मूल गीता-ग्रंथमें ऐसे अनेक परि- वर्तनोंका होनाभी संभव नही था। वर्तमान समयमें गीताकी जो प्रामाणिकता है, उससे प्रतीत नहीं होता, कि वह उसे वर्तमान महाभारतके बाद मिली होगी। ऊपर कह चुके हैं, कि ब्रह्मसूत्रोंमेही 'स्मृति' शब्दसे गीताको प्रमाण माना है। मूल भारतका महाभारत होते समय यदि मूल गीतामेंभी बहुतसे परिवर्तन हो गये होते, तो इस प्रामाणिकतामें निस्सन्देह कुछ बाधा आ गई होती। परंतु वैसे नहीं हुआ; और गीता- ग्रंथकी प्रामाणिकता कही अधिक बढ़ गई है। अतएव यही अनुमान करना पड़ता है, कि मूल गीतामें जो कुछ परिवर्तन हुए होंगे, वे महत्त्वके न थे; किंतु ऐसे थे, जिनमें मूल ग्रंथके अर्थकी पुष्टि हो गई है। भिन्न भिन्न पुराणोंमें वर्तमान भगवद्गीताके नमूनेकी जो अनेक गीताएँ कही गई हैं; उनमें यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि उक्त प्रकारसे मूल गीताको जो स्वरूप एक बार प्राप्त हो गया था, वही अबतक बना हुआ है; उसके बाद उसमें कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ। क्योकि, इन सब पुराणों- मेंसे अत्यंत प्राचीन पुराणोंके कुछ काल पहलेही यदि वर्तमान गीता पूर्णतया प्रमाण-
भूत, और इसीलिये परिवर्तित न होने योग्य, न हो गई होती, तो उसी नमूनेकी अन्य गीताओंकी रचना करनेकी कल्पना होनाभी संभव नहीं था। इसी प्रकार गीताके भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकारोंने एकही गीताके शब्दोंकी खींचातानी करके यह दिखलानेका जो प्रयत्न किया है, कि गीताका अर्थ हमारेही संप्रदायके अनुकूल है; उसकीभी कोई आवश्यकता नहीं थी। वर्तमान गीताके कुछ सिद्धान्तोंको परस्पर- विरोधी देख कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वर्तमान महाभारतकालीन गीतामेंभी आगे समय-समयपर कुछ परिवर्तन हुआ होगा। परन्तु हम पहलेही बतला चुके हैं, कि वास्तवमें यह विरोध नहीं है, किंतु यह भ्रम है; जो धर्म-प्रतिपादन करनेवाली पूर्वापार वैदिक पद्धतियोंके स्वरूपको ठीक तौरपर न समझनेसे हुआ है। सारांश, ऊपर किये गये विवेचनसे यह बात समझमें आ जायगी, कि भिन्न भिन्न प्राचीन वैदिक धर्मांगोंकी एकवाक्यता करके प्रवृत्तिमार्गका विशेष रीतिसे समर्थन करने- वाले भागवत-धर्मका उदय हो चुकनेपर लगभग पांच सौ वर्षके पश्चात् अर्थात् ईसाके लगभग ९०० वर्ष पहले, मूल भारत और मूल गीता, दोनों ग्रंथ निर्मित हुए जिनमें उस मूल भागवत धर्मकाही प्रतिपादन किया गया था; और भारतका महा- भारत होते समय यद्यपि इन मूल गीतामें तदर्थपोषक कुछ सुधार किये गये हो; तथापि उसके असली रूपमें उस समयभी कुछ परिवर्तन नहीं हुआ। एवं वर्तमान महाभारतमें जब गीता जोड़ी गई, तब (और उसके बादभी) उसमें कोई नया परिवर्तन नहीं हुआ - और होनाभी असंभव था। मूल गीता या मूल भारतके स्वरूप एवं कालका यह निर्णय स्वभावतः स्थूल दृष्टिसे एवं अंदाजसे किया गया है। क्योंकि इस समय उसके लिये कोई विशेष साधन उपलब्ध नहीं है ! परंतु वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीताकी यह बात नहीं, क्योंकि उनके कालका निर्णय करनेके लिये बहुतेरे साधन उपलब्ध हैं। अतएव उसकी चर्चा स्वतन्त्र रीतिसे अगले भागमें की गई है। यहाँपर पाठकोंको स्मरण रखना चाहिये, कि वर्तमान गीता और वर्तमान महाभारत ये दोनोही ग्रंथ हैं, जिनके मूल स्वरूपमें कालान्तरमें परिवर्तन होता रहा; और जो इस समय गीता तथा महाभारतके रूपमें हमें उपलब्ध हैं ये उस समयके पहले मूल ग्रंथ नहीं हैं।
भाग ५ - वर्तमान गीताका काल
इस बातका विवेचन हो चुका, कि भगवद्गीता भागवत धर्मपर प्रधान ग्रंथ है; और स्थूलमानसे यह निश्चित किया गया, कि यह भागवत धर्म ईसवी सनके लगभग १४०० वर्ष पहले प्रादुर्भूत हुआ; एव उसके कुछ शतकोंके बाद मूल गीता बनी होगी, और यहभी बतलाया गया, कि मूल भागवत धर्मके निष्काम कर्म-प्रधान होनेपरभी आगे उसीका भक्ति-प्रधान स्वरूप हो कर अन्तमे विशिष्टाद्वैतकाभी उसमे समावेश हो गया। मूल गीता अथवा मूल भागवत धर्मके विषयमे इससे अधिक जान-
१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारी निदान वर्तमान समयमें तो मालूम नही है; और यही दशा पचास वर्ष पहले वर्तमान गीता तथा वर्तमान महाभारतकीभी थी। परंतु डॉक्टर भांडारकर, परलोक- वासी काशीनाथपंत तेलंग, परलोकवासी शंकर बाळकृष्ण दीक्षित तथा रावबहादुर चिंतामणराव वैद्य प्रभृति विद्वानोंके उद्योगसे वर्तमान गीता एवं वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेके लिये यथेष्ट साधन उपलब्ध हो गये हैं; और अभी हालहीमें स्वर्गवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने दो-एक प्रमाण औरभी बतलाये हैं। इन सबकों एकत्रित कर तथा हमारे मतसे उनमें जिन बातोंका मिलाना ठीक जंचा, उनकोभी मिलाकर परिशिष्टका यह भाग संक्षेपमें लिखा गया है। इस परिशिष्ट-प्रकरणमें आरंभहीमें हमने यह बात प्रमाणसहित दिखला दी है, कि वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीता, दोनों ग्रंथ एक-ही व्यक्ति द्वारा रचे गये हैं। यदि दोनों ग्रंथोंको एकही व्यक्तिद्वारा रचे गये अर्थात् एककालीन मान लें, तो महाभारतके कालसे गीताका कालभी सहजही निश्चित हो जाता है। अतएव इस भागमें पहलेही ये प्रमाण दिये गये हैं, जो वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेमें अत्यंत प्रधान माने जाते हैं; और उनके बाद स्वतंत्र रीतिसे वे प्रमाणभी दिये गये हैं, जो वर्तमान गीताका काल निश्चित करनेमें उपयोगी हैं। ऐसा करनेका उद्देश्य यह है, कि महाभारतका कालनिर्णय करनेके जो प्रमाण हैं वे यदि किसीको संदिग्ध प्रतीत हों, तो उससे गीताके कालका निर्णय करनेमें कोई बाधा न होने पाये। महाभारत-काल-निर्णय : महाभारत ग्रंथ बहुत बड़ा है; और उसीमें लिखा है, कि वह लक्ष श्लोकात्मक है। परंतु रावबहादुर वैद्यने महाभारतके अपने टीकात्मक अंग्रेजी ग्रंथके पहले परिशिष्टमें यह बतलाया है,* कि जो महाभारत ग्रंथ इस समय उपलब्ध है, उसमें उपरोक्त लाख श्लोकोंकी संख्यामे कुछ न्यूनाधिकता हो गई है; और यदि उनमें हरिवंशके श्लोक मिला दिये जावें, तोभी योगफल एक लाख नहीं होता। तथापि यह माना जा सकता है, कि भारतका महाभारत होनेपर जो वृहत् ग्रंथ तैयार हुआ, वह प्रायः वर्तमान यथरीमा होगा। ऊपर बतला चुके हैं, कि इस महाभारतमें यास्कके निरुक्त तथा मनुसंहिताका और भगवद्गीतामें तो ब्रह्मसूत्रों- काभी उल्लेख पाया जाता है। अब इसके अतिरिक्त, महाभारतके काल-निर्णय करनेके लिये जो प्रमाण पाये जाते हैं, वे ये हैं - (१) अठारह पर्वोंका यह ग्रंथ तथा हरिवंश, ये दोनों संवत् ५३५ और ६३५के बीच जावा और बाली द्वीपोंमें गये थे; तथा वहाँकी प्राचीन 'कवि' नामक भाषामें उनका अनुवाद हुआ है। इस अनुवादके ये आठ पर्व - आदि, विराट्, उद्योग, भीष्म, आश्रमवासी, मुसल, प्रास्थानिक और स्वर्गारोहण - बाली द्वीपमें इस समय
- The Mahabharata : A Criticism, p, 185 रा. ब. वैद्यके महाभारतके जिस टीकात्मक ग्रंथका हमने आगे कहीं कहीं उल्लेख किया है, वह यही पुस्तक है।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६१ उपलब्ध हैं; और उनमेंसे कुछ प्रकाशितभी हो चुके हैं। यद्यपि अनुवाद कवि-भाषामें किया गया है, तथापि उसमें स्थान-स्थानपर महाभारतके मूल संस्कृत श्लोकही रखे गये हैं। उनमेंसे उद्योगपर्वके श्लोकोंकी जाँच हमने की है। वे सब श्लोक वर्तमान महाभारतकी कलकत्तेमें प्रकाशित पोथीके उद्योगपर्वके अध्यायोंमें- बीच-बीचमें क्रमशः - मिलते हैं। इससे सिद्ध होता है, कि लक्ष-श्लोकात्मक महाभारत संवत् ५३५के लगभग दो सौ वर्ष पहले हिंदुस्थानमें प्रमाणभूत माना जाता था। क्योंकि, यदि वह यहाँ प्रमाणभूत न हुआ होता, तो जावा तथा वाली द्वीपोंमें उसे न ले गये होते। तिब्बतकी भाषामेंभी महाभारतका अनुवाद हो चुका है; परंतु वह उसके बादका है।* (२) गुप्त राजाओंके समयका एक शिलालेख हालमें उपलब्ध हुआ है, कि जो चेदि संवत् १९७ अर्थात् विक्रम संवत् ५०२ में लिखा गया था। उसमें इस बातका स्पष्ट रीतिसे निर्देश किया गया है, कि उस समय महाभारत ग्रंथ एक लाख श्लोकोंका था; और इससे यह प्रकट हो जाता है, कि विक्रम संवत् ५०२ के लगभग दो सौ वर्ष पहले उसका अस्तित्व अवश्य होगा।† (३) आजकल भास कविके जो नाटक-ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, उनमेंसे अधिकांश महाभारतके आख्यानोंके आधारपर रचे गये हैं। इससे प्रकट है, कि उस समय महाभारत उपलब्ध था; और वह प्रमाणभी माना जाता था। भास कविकृत 'बालचरित' नाटकमें श्रीकृष्णजीकी शिशु-अवस्थाकी बातोंका तथा गोपियोंका उल्लेख पाया जाता है। अतएव यह कहना पड़ता है, कि हरिवंशभी उस समय अस्तित्वमें होगा। यह बात निर्विवाद है, कि भास कवि कालिदाससे पुराना है। भास कविकृत नाटकोंके संपादक पंडित गणपतिशास्त्रीने स्वप्नवासवदत्ता नामक नाटककी प्रस्तावनामें लिखा है, कि भास चाणक्यसेभी प्राचीन है; क्योंकि भास कविके नाटकका एक श्लोक चाणक्यके अर्थशास्त्रमें पाया जाता है; और उसमें यह बतलाया है, कि वह किसी दूसरेका है। परंतु यह काल यद्यपि कुछ संदिग्ध माना जाय, तथापि हमारे मतसे यह बात निर्विवाद है, कि भासका समय सन ईसवीके दूसरे अथवा तीसरे शतकके औरभी इस ओरका नहीं माना जा सकता। (४) बौद्ध ग्रंथोंके द्वारा यह निश्चित किया गया है, कि शालिवाहन शकके आरंभमें अश्वघोष नामक एक बौद्ध कवि हो गया है, जिसने 'बुद्धचरित' और * जावा द्वीपके महाभारतका योग The Modern Review, July 1914 pp. 32-38 में दिया गया है; और तिब्बती भाषामें अनुवादित महाभारतका उल्लेख Rockhill's Life of the Buddha, p. 228 note 1 में किया है। † यह शिलालेख Inscriptionum Indicarum नामक पुस्तकके तृतीय खंडके पृष्ठ १३८ में पूर्णतया दिया हुआ है, और स्वर्गवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितने उसका उल्लेख अपने 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र' में (पृ. १०८) किया है। गी. र. ३६
५६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'सौंदरानंद' नामक दो बौद्ध धर्मीय संस्कृत महाकाव्य लिखे थे । अब ये ग्रंथ छापकर प्रकाशित किये गये हैं। इन दोनोंमेंभी भारतीय कथाओंका उल्लेख है। इनके सिवा 'वज्रसूचिकोपनिषद्'पर अश्वघोषका व्याख्यानरूपी एक और ग्रंथ है; अथवा यह कहना चाहिये, कि यह 'वज्रसूचिकोपनिषद्' उसीका रचा हुआ है। इस ग्रंथको प्रोफ़ेसर वेबरने सन १८६० में, जर्मनीमें प्रकाशित किया है। उसमें हरिवंशके श्राद्ध माहात्म्यमेंमें “सप्तव्याधा दशार्णेषु” (हरि. २४.२०, २१) इत्यादि श्लोक, तथा स्वयं महाभारतके कुछ अन्य श्लोक (उदाहरणार्थ, मभा. शां. २६१.१७); पाये जाते हैं। इससे प्रकट होता है, कि शक संवत्से पहले हरिवंशको मिलाकर वर्तमान लक्ष श्लोकात्मक महाभारत प्रचलित था। (५) आश्वलायन गृह्यसूत्रोंमें (३.४.४) भारत तथा महाभारतका पृथक् पृथक् उल्लेख किया गया है; और बौधायन धर्मसूत्रमें एक स्थान (२.२. २६) पर महाभारतमें वर्णित ययाति उपाख्यानका एक श्लोक मिलता है, (मभा. आ. ७८.१०)। वुल्हर साहबका कथन है, कि केवल एकही श्लोकके आधारपर यह अनुमान दृढ़ नहीं हो सकता, कि महाभारत बौधायनके पहले था।* परंतु यह शंका ठीक नहीं; क्योंकि बौधायनके गुह्य शेष-सूत्रमें विष्णुसहस्रनामका स्पष्ट उल्लेख है। (बौ. गृ शे १.२२.८) : और आगे चलकर इसी सूत्रमें (२.२२.९) गीताका “पत्रं पुष्पं फलं तोयं” श्लोकभी (गीता ९.२६) मिलता है। बौधायन सूत्रमें पाये जानेवाले इन उल्लेखोंको पहले पहल परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने प्रकाशित किया था।† और इन सब उल्लेखोंसे यही कहना पड़ता है, कि बुल्हर साहबकी शंका निर्मूल है; आश्वलायन तथा बौधायन और दोनोंभी महाभारतसे, परिचित थे। बुल्हरहीने अन्य प्रमाणोंसे निश्चित किया है, कि बौधायन सन् ईसवीके लगभग ४०० वर्ष पहले हुआ होगा। (६) स्वयं महाभारतमें जहाँ विष्णुके अवतारोंका वर्णन किया गया है, वहाँ बुद्धका नामतक नहीं; और नारायणीयोपाख्यानमें (मभा शा ३३९.१००) जहाँ दस अवतारोंके नाम दिये हैं, वहाँ हंसको प्रथम अवतार कहकर तथा कृष्णके बाद एकदम कल्कि को लाकर पूरे दस गिना दिये हैं। परंतु वनपर्वमें कलियुगकी भविष्यत् स्थितिका वर्णन करते समय कहा है, कि “एडूकचिन्हा पृथिवी न देवगृह- भूषिता” (मभा. वन १९०. ६८) पृथ्वीपर देवालयोंके बदले एडूक होंगे। बुद्धके बाल तथा दाँत प्रभृति किसी स्मारक वस्तुको जमीनमें गाड़कर उसपर जो खंभ, मीनार या इमारत बनाई जाती थी, उसे एडूक कहते थे, और आजकल उसे 'डागोबा'
- See ‘Sacred Books of the East Series’ Vol. XIV., Intro. p. xli. † परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेका पूरा लेख The Vedic Magazine and Gurukula Samachar, Vol. VII, Nos. 6-7, pp. 528-532, में प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखकका नाम प्रोफेसर काळे लिखा है; पर वह अशुद्ध है।
कहते हैं। डागोबा शब्द संस्कृत 'धातुगर्भ' ( = पाली डागव ) का अपभ्रंश है; और 'धातु' शब्दका अर्थ "भीतर रक्खी हुई स्मारक वस्तु" है, सीलोन तथा ब्रह्मदेशमें ये डागोबा कई स्थानोंपर पाये जाते हैं। इससे प्रतीत होता है, कि बुद्धके वाद, परंतु अवतारोंमें उसकी गणना होनेके पहलेही महाभारत रचा गया होगा। महाभारतमें 'बुद्ध' तथा 'प्रतिबुद्ध' शब्द अनेक बार मिलते हैं ( मभा. शा १९४.५८; ३०७. ४७; ३४३.५२ ) । परंतु वहाँ केवल ज्ञानी, जाननेवाला अथवा स्थितप्रज्ञ पुरुष इतनाही अर्थ उन शब्दोंमें अभिप्रेत है। प्रतीत नहीं होता, कि ये शब्द बौद्ध धर्मसे लिये गये हों; किंतु यह माननेके लिये दृढ़ कारणभी हैं, कि बौद्धोंनेही ये शब्द वैदिक धर्मसे लिये होंगे। ( ७ ) कालनिर्णयकी दृष्टिसे यह बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, कि महाभारतमें नक्षत्रगणना अश्विनी आदिसे नहीं है, किंतु वह कृत्तिका आदिसे है ( मभा. अनु. ६४.८९ ) ; और मेष-वृषभ आदि राशियोंका कहींभी उल्लेख नहीं है। क्योंकि इस बातसे यह अनुमान सहजही किया जा सकता है, कि यूनानियोंके सहवाससे हिंदुस्तानमें मेष, वृषभ आदि राशियोंके आनेके पहले — अर्थात् सिकंदरके पहलेही — महाभारत ग्रंथ रचा गया होगा। परंतु इससेभी अधिक महत्त्वकी बात श्रवण आदि नक्षत्रगणनाके विषयकी है। अनुगीतामें ( मभा. अश्व. ४४.२ ; और आदि. ७१.३४ ) कहा है, कि विश्वामित्रने श्रवण आदिकी नक्षत्रगणना आरंभ की और टीकाकारने उसका यह अर्थ किया हैं, कि उस समय श्रवण नक्षत्रमें उत्तरायणका आरंभ होता था; इसके सिवा उसका कोई दूसरा ठीक ठीक अर्थभी नहीं हो सकता। वेदांगज्योतिषके समय उत्तरायणका आरंभ धनिष्ठा नक्षत्रसे हुआ करता था। धनिष्ठामें उदगयन होनेका काल ज्योतिर्गणितकी रीतिसे शकके पहले लगभग १५०० वर्ष आता है; और ज्योतिर्गणितकी रीतिसे उदगयनको एक नक्षत्र पीछे हटनेके लिये लगभग हजार वर्ष लग जाते हैं। इस हिसाबसे श्रवणके आरंभमें उदगयन होनेका काल शकके पहले लगभग ५०० वर्ष आता है। सारांश, गणितके द्वारा यह बतलाया जा सकता है, कि शकके पहले ५०० वर्ष वर्षके लगभग वर्तमान महाभारत बना होगा। परलोकवासी शंकर बाळकृष्ण दीक्षितने अपने 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र' की विशेषता यह है, कि इसके कारण वर्तमान महाभारतका काल शकके पहले ५०० वर्षसे अधिक पीछे हटायाही नहीं जा सकता। ( ८ ) रावबहादुर वैद्यने महाभारतपर जो टीकात्मक ग्रंथ अंग्रेजीमें लिखा है, उसमें यह बतलाया है, कि चंद्रगुप्तके दरबारमें ( सन ईसवीसे लगभग ३२० वर्ष पहले रहनेवाले मेगस्थनीज़ नामक ग्रीक वकीलको महाभारतकी कथाएं मालूम थीं। मेगस्थनीजका पूरा ग्रंथ इस समय उपलब्ध नहीं है; परंतु उसके अवतरण कई ग्रंथोंमें पाये जाते हैं। वे सब एकत्रित करके, पहले जर्मन भाषामें प्रकाशित किये गये; और फिर मेक्रींडलने उनका अंग्रेजी अनुवाद किया है। इस
पुस्तकमें (पृ. २००-२०५) कहा है, कि उसमें वर्णित हेरेक्लीजही श्रीकृष्ण हैं; और मेगस्थनीजके समय शौरसेनीय लोग - जो मथुराके निवासी थे - उसीकी पूजा किया करते थे। उसमें यहभी लिखा है, कि हेरेक्लीज अपने मूलपुरुष डायोनिसससे पंद्रहवाँ था। इसी प्रकार महाभारतमेंभी (सभा. अनु. १४७. २५-३३) कहा है, कि श्रीकृष्ण दक्षप्रजापतिसे पंद्रहवें पुरुष हैं। और मेगस्थनीजने कर्णप्रावरण, एकपाद, ललाटाक्ष आदि अद्भुत लोगोंका (पृ. ७४) अथवा सोनेकी ऊपर निकालनेवाली चींटियोंका (पिपीलिकाओं) (पृ. ९४) वर्णन किया है, वहभी महाभारतहीमें (सभा. सभा. ५१, ५२) पाया जाता है। इन बातोंसे और अन्य बातोंसे प्रकट हो जाता है, कि मेगस्थनीजके समय न केवल महाभारत ग्रंथही न प्रचलित था, किंतु श्रीकृष्ण-चरित्र तथा श्रीकृष्ण-पूजाकाभी प्रचार हो गया था। यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि उपर्युक्त प्रमाण परम्परसापेक्ष अर्थात् एक दूसरेपर अवलंबित नहीं हैं, किंतु वे स्वतंत्र हैं, तो यह बात निस्संदेह प्रतीत होगी, कि वर्तमान महाभारत शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहले अस्तित्वमें जरूर था। इसके बाद कदाचित् किसीने उसमें कुछ नये श्लोक मिला दिये होंगे; अथवा उसमेंसे कुछ निकालभी डाले होंगे। परंतु इस समय कुछ विशिष्ट श्लोकोंके विषयमें कोई प्रश्न नहीं है - प्रश्न तो समूचे ग्रंथकेही विषयमें है; और यह बात सिद्ध है, कि यह समस्त ग्रंथ शककालके कम-से-कम पाँच शतक पहलेही रचा गया है। इस प्रकरणके आरंभहीमें हमने यह सिद्ध कर दिया है, कि गीता समस्त महाभारत ग्रंथकाही एक भाग है - वह कुछ उसमें पीछे नहीं मिलाई गई है। अतएव गीताकाभी वही काल मानना पड़ता है, जो कि महाभारतका है। संभव है, कि मूल गीता इसके पहलेकी हो; क्योंकि जैसे इसी प्रकरणके चौथे भागमें बतलाया गया है; उसकी परंपरा
- See M'Crindle's Ancient India-Megasthenes and Arrian, pp. 202-205 मेगस्थनीजका यह कथन एक वर्तमान खोजके कारण विचित्रतापूर्वक दृढ़ हो गया है। बम्बई सरकारके Archaeological Department की १९१४ ईसवी की Progress Report हालहीमें प्रकाशित हुई है। उसमें एक शिलालेख है, जो ग्वालियर रियासतके भेलसा शहरके पास बेसनगर गांवमें खाम्बबाबा नामक एक गरुड़ध्वज-स्तंभपर मिला है। इस लेखमें यह कहा है, कि हेलिओडोरस नामक एक हिंदू बने हुए यवन अर्थात् ग्रीकने इस स्तंभके सामने वासुदेवका मंदिर बनवाया था; और यह यवन वहांके भागभद्र नामक राजाके दरबारमें तक्षशिलाके ऐंटि- आल्किडस नामक ग्रीक राजाके एलचीकी हैसियतसे रहता था। ऐंटिआल्किडसके सिक्कोंसे अब यह सिद्ध किया गया है, कि वह ईसाके पहले १४० वें वर्षमें राज्य करता था। इससे यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है, कि उस समय वासुदेवभक्ति प्रचलित थी; केवल उतनीही नहीं; किंतु यवन लोगभी वासुदेवके मंदिर बनवाने लगे थे। यह पहलेही बतला चुके हैं; कि मेगस्थनीजहीको नहीं; किंतु पाणिनीकोभी वासुदेवभक्ति मालूम थी।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६५ बहुत प्राचीन समय तक हटानी पड़नी है। परंतु, चाहे जो कुछ कहा जाय; यह निर्विवाद सिद्ध है, कि उसका काल महाभारतके बादका नहीं माना जा सकता। यह नहीं, कि यह बात केवल उपर्युक्त प्रमाणोंहीसे सिद्ध होती है, किंतु इसके विषयमें स्वतंत्र प्रमाणभी दीख पड़ते हैं। अब आगे उन स्वतंत्र प्रमाणोंकाही वर्णन किया जाता है। गीता-कालका निर्णय : ऊपर जो प्रमाण बतलाये गये हैं, उनमें गीताका स्पष्ट अर्थात् नामतः निर्देश नहीं किया गया है; वहाँ गीताके कालका निर्णय महाभारत- कालसे किया गया है। अब यहाँ क्रमशः वे प्रमाण दिये जाते हैं, जिनमें गीताका स्पष्ट रूपसे उल्लेख है। परंतु पहले यह बतला देना चाहिये, कि परलोकवासी तेलंगने गीताको आपस्तम्बके पहलेकी अर्थात् ईसासे कम-से-कम तीन सौ वर्षसे अधिक प्राचीन कहा है। डॉक्टर भांडारकरने अपने 'वैष्णव, शैव आदि पंथ' नामक अंग्रेजी ग्रंथमें प्रायः इसी कालको स्वीकार किया है। प्रोफेसर गार्वेके* मतानुसार तेलंगद्वारा निश्चित किया गया काल ठीक नहीं। उनका यह कथन है, कि मूल गीता ईसाके पहले दूसरी सदीमें हुई; और ईसाके बाद दूसरे शतकमें उसमें कुछ सुधार किये गये हैं। परंतु नीचे लिखे प्रमाणोंसे यह बात भली भाँति प्रकट हो जायगी, कि गार्वेका उक्त कथन ठीक नहीं है। (१) गीतापर जो टीकाएँ तथा भाष्य उपलब्ध हैं, उनमें शांकरभाष्य अत्यंत प्राचीन है। श्रीशंकराचार्यने महाभारतके सनत्सुजातीय प्रकरणपरभी भाष्य लिखा है; और उनके ग्रंथोंमें महाभारतके मनु-बृहस्पति-संवाद, शुकानुप्रश्न और अनु- गीतामेंसे बहुतेरे वचन अनेक स्थानोंपर प्रमाणार्थ लिये गये हैं। इससे यह बात प्रकट है, कि उनके समयमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ प्रमाणभूत माने जाते थे। प्रोफेसर काशीनाथ बापू पाठकने एक सांप्रदायिक श्लोकके आधारपर श्रीशंकरा- चार्यका जन्मकाल ८८५ विक्रमी संवत् (शक ७१०) निश्चित किया है। परंतु हमारे मतमें इस कालको औरभी सौ वर्ष पीछे हटाना चाहिये। क्योंकि महानुभव पंथके 'दर्शन-प्रकाश' नामक ग्रंथमें यह कहा है, कि 'युग्मपयोधिरामान्वितशाके' अर्थात् शक ६४२ में (विक्रमी संवत् ७७७) श्रीशंकराचार्यने गुहामें प्रवेश किया; और उस समय उनकी आयु ३२ वर्षकी थी, अतएव यह सिद्ध होता है, कि उनका जन्म शक ६१० में (संवत् ७४५) हुआ। हमारे मतमें यही समय, प्रोफेसर पाठक- द्वारा निश्चित किये हुए कालसे, कहीं अधिक सयुक्तिक प्रतीत होता है। परंतु, यहाँ- पर उसके विषयमें विस्तारपूर्वक विवेचन नहीं किया जा सकता। गीतापर जो शांकर- भाष्य है, उसमें पूर्व समयके अधिकांश टीकाकारोंका उल्लेख किया गया है; और
- See Telang's Bhagavadgita, S. B. E. Vol. VIII, Intro. pp. 21 and 34; Dr. Bhandarkar's Vaishnavism, Shaivism and other Sects, P. 13; Dr. Garbe's Die Bhagavadgita, p. 64.
५६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उक्त भाष्यके आरंभहीमें श्रीशंकराचार्यने कहा है, कि इन टीकाकारोंके मतोंका खंडन करके हमने नया भाष्य लिखा है। अतएव आचार्यका जन्मकाल चाहे शक ६१० लीजिये या ७१०; इसमे तो कुछभी संदेह नहीं, कि उस समयके कम-से-कम दो-तीन सौ वर्ष पहले अर्थात् शक ४०० के लगभग गीता प्रचलित थी। अब देखना चाहिये, कि इस कालकेभी और पहले कैसे और कितना जा सकते हैं। (२) परलोकवासी तेलंगने यह दिखलाया है, कि कालिदास और बाणभट्ट गीतासे परिचित थे। कालिदासकृत रघुवंशमें (१०.३१) विष्णुकी स्तुतिके विषयमें जो “अनवाप्तमवाप्तव्यं न ते किंचन विद्यते” यह श्लोक है, वह गीताके (३.२२) “नानवाप्तमवाप्तव्यं” श्लोकसे मिलता है; और बाणभट्टकी कादंबरीके “महाभारतमिवानन्तगीताकर्णनानन्दितनरं” इस एक श्लेष-प्रधान वाक्यमें गीताका स्पष्ट-रूपसे उल्लेख किया गया है। कालिदास और भारविका उल्लेख स्पष्टरूपसे संवत् ६९१ के (शक ५५६) एक शिलालेखमें पाया जाता है; और अब यहभी निश्चित हो चुका है, कि बाणभट्टभी संवत् ६६३ के (शक ५२८) लगभग हर्ष राजाके पास था। इस बातका विवेचन परलोकवासी पांडुरंग गोविंद- शास्त्री पारखीने बाणभट्टपर लिखे हुए अपने एक मराठी निबंधमें किया है। (३) जावा द्वीपमें जो महाभारत ग्रंथ यहाँसे गया है, उसके भीष्मपर्वमें एक गीता प्रकरण है, जिसमें गीताके भिन्न भिन्न अध्यायोंके लगभग सौ-सव्वा सौ श्लोक अक्षरशः मिलते हैं। सिर्फ १२, १५, १६ और १७-इन चार अध्यायोंके श्लोक उसमें नहीं हैं। इससे यह कहनेमें कोई आपत्ति नहीं दीख पड़ती, कि उस समयभी गीताका स्वरूप वर्तमान गीताके सदृशही था। क्योंकि कवि-भाषामें गीताका यह अनुवाद है; और उसमें जो संस्कृत श्लोक मिलते हैं, वे बीच-बीचमें उदाहरण तथा प्रतीकके तौरपर ले लिये गये हैं। इससे यह अनुमान करना युक्तिसंगत नहीं, कि उस समय गीतामें केवल उतनेही श्लोक थे। जब डॉक्टर नरहर गोपाल सरदेसाई जावा द्वीपको गये थे, तब उन्होंने इस बातकी खोज की है। इस विषयका वर्णन कल- कत्तेके 'मॉडर्न रिव्यू' नामक मासिक पत्रके जुलाई १९१४के अंकमें तथा उसके पूर्व पूनाके 'चित्रमय-जगत्' मासिकपत्रमेंभी प्रकाशित हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है; कि शक चार-पाँच सौके कम-से-कम दो सौ वर्ष पहले महाभारतके भीष्मपर्वमें गीता थी; और उसके श्लोकभी वर्तमान गीताके श्लोकोंके क्रमानुसारही थे। (४) विष्णुपुराण और पद्मपुराण आदि ग्रंथोंमें भगवद्गीताके नमूनेपर बनी हुई जो अन्य गीताएं दीख पडती हैं, अथवा उनके उल्लेख पाये जाते हैं, उनका वर्णन इस ग्रंथके पहले प्रकरणमे किया गया है। इससे यह बात स्पष्टतया विदित होती है, कि उस समय भगवद्गीता प्रमाण तथा पूजनीय मानी जाती थी, इसीलिये उसका उक्त प्रकारसे अनुकरण किया गया है, और यदि ऐसा न होता, तो उसका कोईभी अनुकरण न करता। अतएव सिद्ध है, कि इन पुराणोंमें जो अत्यंत प्राचीन
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६७ पुराण हैं, उनमेंभी भगवद्गीता कम-से-कम सौ-दो-सौ वर्ष अधिक प्राचीन अवश्य होगी। पुराण-कालका आरंभ-समय सन ईसवीके दूसरे शतकसे अधिक अर्वाचीन नहीं माना जा सकता, अतएव गीताका काल कम-से-कम शकारंभके कुछ थोड़ा पहलेही मानना पड़ता है। (५) ऊपर यह बतला चुके हैं, कि कालिदास और बाण गीतासे परिचित थे। कालिदाससे पुराने भास कविके नाटक हालहीमें प्रकाशित हुए हैं। उनमेंसे 'कर्णभार' नाटकमें बारहवाँ श्लोक इस प्रकार है :- हतोऽपि लभते स्वर्गं जित्वा तु लभते यशः । उभे बहुमते लोके नास्ति निष्फलता रणे ॥ यह श्लोक गीताके “हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्” (गीता २.३७) श्लोकके समाना- र्थक है; और जब कि भास कविके अन्य नाटकोंमें यह प्रकट होता है, कि वह महा- भारतसे पूर्णतया परिचित था; तब तो यही अनुमान किया जा सकता है, कि उप- र्युक्त श्लोक लिखने समय उसके मनमें गीताका उक्त श्लोक अवश्य आया होगा। अर्थात् यह सिद्ध होता है, कि भास कविके पहलेभी महाभारत और गीताका अस्तित्व था। पंडित गणपतिशास्त्रीने यह निश्चित किया है, कि भास कविका काल शक-के दो-तीन सौ वर्ष पहले रहा होगा। परंतु कुछ लोगोंका मत है, कि वह शकके सौ-दो सौ वर्ष बाद हुआ है। यदि हम दूसरे मतको सत्य माने, तोभी उपर्युक्त प्रमाणसे सिद्ध हो जाता है, कि भाससे कम-से-कम सौ-दोसौ वर्ष पहले अर्थात् शक-कालके आरंभमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ सर्वमान्य हो गये थे। (६) परंतु प्राचीन ग्रंथकारों-द्वारा गीताके श्लोक लिये जानेका औरभी अधिक दृढ़ प्रमाण, परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने गुरुकुलकी 'वैदिक मेग- जीन' नामक अंग्रेजी मासिक पुस्तक (पुस्तक ३, अंक ६-७, पृष्ठ ५०८-५३२, मार्गशीर्ष और पौष, संवत् १९७०) में प्रकाशित किया है। इसके पहले पश्चिमी संस्कृत पंडितोंका यह मत था, कि संस्कृत काव्य-पुराणोंकी अपेक्षा किन्हीं अधिक अथवा प्राचीन ग्रंथोंमें, उदाहरणार्थ सूत्र-ग्रंथोंमेंभी, गीताका उल्लेख नहीं पाया जाता; और इसलिये यह कहना पड़ता है, कि सूत्र-कालके बाद, अर्थात् अधिकसे अधिक सन् ईसवीके पहले, दूसरी सदीमें गीता बनी होगी। परंतु परलोकवासी कालेने प्रमाणोंसे सिद्ध कर दिया है, कि यह मत ठीक नहीं है। बौधायन-गृह्यशेष- सूत्रमें (२.२२.९) गीताका (९.२६) निम्नलिखित श्लोक 'तदाह भगवान्' कहकर स्पष्ट रूपसे लिया गया है :- देशाभावे द्रव्याभावे साधारणे कुर्यान्मनसा वार्चयेदिति । तदाह भगवान् - पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ इति
५६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और आगे चलकर कहा है, कि भक्तिसे नम्र होकर इन मंत्रोंको पढ़ना चाहिये - “भक्तिनम्रः एतान्मन्त्रानधीयीत ।” इसी गृह्यशेष-सूत्रके तीसरे प्रश्नके अंतमें यह भी कहा है, कि “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर-मंत्रका जप करनेसे अश्वमेधका फल मिलता है। इससे यह बात पूर्णतया सिद्ध होती है, कि बौधायनके पहले गीता प्रचलित थी; और वासुदेव-पूजाभी सर्वमान्य समझी जाती थी। इसके- सिवा बौधायनके पितृमेध-सूत्रके तृतीय प्रश्नके आरंभहीमें यह वाक्य है :- जातस्य वै मनुष्यस्य ध्रुवं मरणमिति विजानीयात्तस्माज्जाते न प्रहृष्येन्मृते च न विषीदेत् । इससे सहजही दीख पड़ता है, कि वह गीताके “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥” इस श्लोकसे सूझ पड़ा होगा; और उसमें उपर्युक्त 'पत्रं पुष्पं' श्लोकका योग कर देनेसे तो कुछ शंकाही नहीं रह जाती। ऊपर बतला चुके हैं, स्वयं महाभारतका एक श्लोक बौधायन- सूत्रोंमें पाया जाता है। बुल्हर साहबने निश्चित किया है* कि बौधायनका काल आपस्तंबके सौ-दोसौ वर्ष पहले होगा; और आपस्तंबका काल ईसाके पहले तीन सौ वर्षसे कम हो नहीं सकता। परंतु हमारे मतानुसार उसे कुछ इस ओर हटाना चाहिये। क्योंकि महाभारतमें मेष-वृषभ आदि राशियाँ नहीं हैं और ‘काल- माधव’में तो बौधायनका “मीनमेषयोर्मेषवृषभोर्वा वसंतः” यह वचन दिया गया है; यही वचन परलोकवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितके ‘भारतीय ज्योतिषशास्त्र’ मेंभी (पृष्ठ १०२) लिया गया है। इससेभी यही निश्चित अनुमान किया जाता है, कि महाभारत बौधायनके पहलेका है, तथा शकारंभके कम-से-कम चार सौ वर्ष पहले बौधायनका समय होना चाहिये; और पाँच सौ वर्ष पहले महाभारत तथा गीताका अस्तित्व था। परलोकवासी कालेने बौधायनका काल ईसाके सात-आठ सौ वर्ष पहलेका निश्चित किया है; किंतु वह ठीक नहीं है। जान पड़ता है, कि बौधायनका राशिविषयक वचन उनके ध्यानमें न आया होगा। (७) उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह बात किसीकोभी स्पष्ट रूपसे विदित हो जायगी, कि वर्तमान गीता शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहले अस्तित्वमें थी; बौधायन तथा आश्वलायनभी उससे परिचित थे; और उस समयसे श्रीशंकराचार्यके समय- तक उसकी परंपरा अविच्छिन्न रूपसे दिखलाई जा सकती है। परंतु अब तक जिन प्रमाणोंका उल्लेख किया गया है, वे सब वैदिक धर्मके ग्रंथोंसे लिये गये हैं। अब आगे चलकर जो प्रमाण दिया जायगा, वह वैदिक धर्म-ग्रंथोंसे भिन्न अर्थात् बौद्ध साहित्यका है। इससे गीताकी उपर्युक्त प्राचीनता स्वतंत्र रीतिसे औरभी अधिक दृढ़ तथा
- See Sacred Books of the East Series, Vol. II, Intro. p. xliii and also the same Series, Vol. XIV, Intro. p. xliii.
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६९
निःसंदिग्ध हो जाती है। बौद्ध धर्मके पहलेही भागवत धर्मका उदय हो गया था, इस विषयमें बुल्हर और प्रसिद्ध फ्रेंच पंडित सेनार्तके मतोंका उल्लेख पहले हो चुका है; तथा प्रस्तुत प्रकरणके अगले भागमें इन बातोंका विवेचन स्वतंत्र रीतिसे किया जायगा, कि बौद्ध धर्मकी वृद्धि कैसे हुई? तथा हिंदू धर्मसे उसका क्या संबंध है? यहाँ केवल गीता-कालके संबंधमेंही आवश्यक उल्लेख संक्षिप्त रूपमें किया जायगा। भागवत धर्म बौद्ध धर्मके पहलेका है, तथापि केवल इतना कह देनेसेही इस बातका निश्चय नहीं किया जा सकता, कि गीताभी बुद्धके पहले थी। क्योंकि यह कहनेके लिये कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, कि भागवत धर्मके साथही गीता-ग्रंथकाभी उदय हुआ। अतएव यह देखना आवश्यक है कि बौद्ध ग्रंथकारोंने गीता-ग्रंथका स्पष्ट उल्लेख कहीं किया है या नहीं? प्राचीन बौद्ध ग्रंथोंमें यह स्पष्ट रूपसे लिखा है, कि बुद्धके समय चार वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास, निघंटु आदि वैदिक धर्मग्रंथ प्रचलित हो चुके थे; अतएव इसमें संदेह नहीं, कि बुद्धके पहलेही वैदिक धर्म पूर्णावस्थामें पहुँच चुका था। इसके बाद बुद्धने जो नया पंथ चलाया, वह अध्यात्मकी दृष्टिसे अनात्मवादी था; परंतु जैसे अगले भागमें बतलाया जायगा आचरण-दृष्टिसे उसमें उपनिषदोंके संन्यास-मार्गहीका अनुकरण किया गया था। परंतु अशोकके समय बौद्ध धर्मकी यह दशा बदल गई थी; बौद्ध भिक्षुओंने जंगलमें रहना छोड़ दिया था – धर्म प्रसारार्थ तथा परोपकारके काम करनेके लिये वे लोग पूर्वकी ओर चीनमें और पश्चिमकी ओर अलेक्जेंड्रिया तथा ग्रीसतक चले गये थे। बौद्ध धर्मके इतिहासमें यह एक अत्यंत महत्त्वका प्रश्न है, कि जंगलोंमें रहना छोड़कर लोकसंग्रहके काम करनेके लिये बौद्ध यति कैसे प्रवृत्त हो गये? बौद्ध धर्मके प्राचीन ग्रंथोंपर दृष्टि डालिये। सुत्तनिपातके खग्गविसाणसुत्तमें कहा है, कि जिस भिक्षुने पूर्ण अर्हतावस्था प्राप्त कर ली है, वह कोईभी काम न करे; केवल गेंडेके सदृश्य जंगलमें निवास किया करे; और महावग्गमें (५. १. २७) बुद्धके प्रमुख शिष्य सोनकोलीविसकी कथामें कहा है, कि जो भिक्षु निर्वाणपदतक पहुँच चुका है, उसके लिये न तो कोई कामही अवशिष्ट रह जाता है; और न किया हुआ कर्मही भोगना पड़ता है – “कतस्स पटिचयो नत्थि करणीयं न विज्जति।” यह शुद्ध संन्यास-मार्ग है, और हमारे औपनिषदिक संन्यास-मार्गसे इसका पूर्णतया मेल मिलता है। यह “करणीयं न विज्जति” वाक्य, गीताके “तस्य कार्यं न विद्यते” इस वाक्यसे केवल समानार्थकही नहीं है, किंतु शब्दशःभी एकही है। परंतु जब बौद्ध भिक्षुओंका यह मूल संन्यास-प्रधान आचार बदल गया और जब वे परोपकारके काम करने लगे, तब नये तथा पुराने मतमें झगड़ा हो गया; पुराने लोग अपनेको ‘थेरवाद’ (वृद्धपंथ) कहने लगे; और नवीन मत-वादी लोग अपने पंथका ‘महायान’ नाम रख करके पुराने पंथको ‘हीनयान’ (अर्थात् हीन पंथके) नामसे संबोधित करने लगे। अश्वघोष महायान पंथका था; और वह इस मतको मानता था, कि बौद्ध