श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभिन्न श्रीकृष्णभी हो गये ? हमारे मतानुसार ऐसा माननेके लिये कोई कारण नही है। कोईभी धर्म लीजिये, समयके हेरफेरमे उसका रूपान्तर हो जाना बिलकुल स्वाभाविक है, उसके लिये इस बातकी आवश्यकता नही, कि भिन्न भिन्न कृष्ण, बुद्ध या ईसा मसीह माने जावें।* कुछ लोग, और विशेषतः कुछ कुछ पश्चिमी तर्कज्ञानी - यह किया करते हैं, कि श्रीकृष्ण, यादव और पांडव, तथा भारतीय युद्ध आदि ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं हैं, ये सब कल्पित कथाएँ हैं; और कुछ लोगोंके मतमें तो महाभारत अध्यात्म विषयका एक बृहत् रूपकही है। परंतु हमारे प्राचीन ग्रंथोंके प्रमाणोंको देखकर किसीभी निष्पक्षपाती मनुष्यको यह मानना पड़ेगा, कि उक्त शंकाएँ बिलकुल निराधार हैं। यह बात निर्विवाद है, कि इन कथाओंके मूलमे इतिहासहीका आधार है। सारांश, हमारा मत यह है, कि श्रीकृष्ण चार-पाँच नहीं हुए, वे केवल एकही ऐतिहासिक पुरुष थे। अब श्रीकृष्णजीके अवतार-कालपर विचार करते समय ग ब. चिंतामणराव वैद्यने यह प्रतिपादन किया है, कि श्रीकृष्ण, यादव, पांडव तथा भारतीय युद्धका एकही काल - अर्थात् कलियुगका आरंभ-काल न होकर पुराणगणनाके अनुसार उस कालसे अबतक पाँच हजारसेभी अधिक वर्ष बीत चुके हैं। और यही श्रीकृष्णजीके अवतारका यथार्थ काल है।† परंतु पांडवोंसे लगाकर शक-काल तकके राजाओंकी पुराणोंमें वर्णित पीढ़ियोंसे इस कालका मेल नहीं दीख पड़ता। अतएव भागवत तथा विष्णु-पुराणमे जो यह वचन है, कि “परीक्षित राजाके जन्मसे नंदके अभिषेकतक १११५ अथवा १०१५ वर्ष होते हैं”
- श्रीकृष्णके चरित्रमें पराक्रम, भक्ति और वेदान्तके अतिरिक्त गोपियोंकी रासक्रीड़ाका समावेश होता है; और ये बातें परस्पर-विरोधी हैं। इसलिये आजकल कुछ विद्वान् यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि महाभारतका कृष्ण भिन्न, गीताका भिन्न और गोकुलका कन्हैयाभी भिन्न है। डॉ. भांडारकरने अपने वैष्णव, शैव आदि पंथ संबंधी अंग्रेजी ग्रंथमे इसी मतको स्वीकार किया है। परंतु हमारे मतमें यह ठीक नही है। यह बात नही, कि गोपियोंकी कथामे जो शृंगार-वर्णन है, वह बादमे न आया हो। परंतु केवल उतनेहीके लिये यह माननेकी कोई आवश्यकता नही, कि श्रीकृष्ण नामके कई भिन्न भिन्न पुरुष हो गये; और इसके लिये कल्पनाके सिवा कोई अन्य आधारभी नहीं है। इसके सिवा, यहभी नहीं, कि गोपियोंकी कथाका प्रचार पहले भागवत-कालहीमें हुआ हो; किंतु शककालके आरंभमें यानी विक्रम संवत् १३६ के लगभग अश्वघोष-विरचित 'बुद्धचरित' (४. १४) में और भास कविकृत 'बालचरित' नाटक (३ २) मेभी गोपियोंका उल्लेख किया गया है। अतएव इस विषयमे हमें डॉ. भांडारकरके कथनसे चिंतामणराव वैद्यका मत अधिक सयुक्तिक प्रतीत होता है। † रावबहादुर चिंतामणराव वैद्यका यह मत उनके महाभारतके टीकात्मक अंग्रेजी ग्रंथमें है। इसके सिवा इसी विषयपर आपने सन् १९१८ में डेक्कन कॉलिज एनिवर्सरीके समय जो व्याख्यान दिया था उसमेंभी इस बातका विवेचन किया था।