भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 593

५४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वरको वासुदेव, जीवको संकर्षण, मनको प्रद्युम्न तथा अहंकारको अनिरुद्ध कहा है। इनमेंसे वासुदेव तो स्वयं श्रीकृष्णहीका नाम है; संकर्षण उनके ज्येष्ठ भ्राता बलरामका नाम है; तथा प्रद्युम्न और अनिरुद्ध श्रीकृष्णजीके पुत्र और पौत्रके नाम हैं। इसके सिवा इस धर्मका जो दूसरा नाम 'सात्वत' भी है, वह उस यादव-जातिका नाम है, जिसमें श्रीकृष्णजीने जन्म लिया था। इससे यह बात प्रकट होती है, कि जिस कुल तथा जातिमें श्रीकृष्णजीने जन्म लिया था, उसमें यह धर्म प्रचलित हो गया था; और तभी उन्होंने अपने प्रिय मित्र अर्जुनको उसका उपदेश किया होगा - और यही बात पौराणिक कथाओंमेंभी कही गई है। यहभी कथा प्रचलित है, कि श्रीकृष्णजीके साथही सात्वत जातिकाभी अंत हो गया। इस कारण श्रीकृष्णके बाद मान्वत जातिमें इस धर्मका प्रसार होनाभी संभव नहीं था। भागवतधर्मके भिन्न भिन्न नामोंके विषयमें इस प्रकारकी ऐतिहासिक उपपत्ति बतलाई जा सकती है, कि जिस धर्मको श्रीकृष्णजीने प्रवृत्त किया था, वह उनके पहले कदाचित् नारायणीय या पांचरात्र नामोंमें न्यूनाधिक अंशोंमें प्रचलित रहा होगा; और आगे सात्वत जातिमें उसका प्रसार होनेपर उसे 'सात्वत' नाम प्राप्त हुआ होगा। तदनंतर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको नर-नारायणके अवतार मानकर लोग इस धर्मको 'भागवत धर्म' कहने लगे होंगे। इस विषयके संबंधमें यह माननेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि तीन या चार भिन्न भिन्न श्रीकृष्ण हो चुके हैं; और उनमेंसे हर एकने इस धर्मका प्रचार करते समय अपनी ओरसे कुछ-न-कुछ सुधार करनेका प्रयत्न किया है - वस्तुतः ऐसा माननेके लिए कोई प्रमाणभी नहीं है। मूल धर्ममें न्यूनाधिक परिवर्तन हो जानेके कारणही यह कल्पना उत्पन्न हो गई है। बुद्ध, ईसा तथा मुहम्मद तो अपने अपने धर्मके स्वयं एकही एक संस्थापक हो गये हैं; और आगे उनके धर्मोंमें भले-बुरे अनेक परिवर्तनभी हो गये हैं। परंतु इससे कोई यह नहीं मानता, कि बुद्ध, ईसा या मुहम्मद अनेक हो गये। इसी प्रकार यदि मूल भागवत धर्मको आगे चलकर भिन्न भिन्न स्वरूप प्राप्त हो गये या श्रीकृष्णजीके विषयमें आगे भिन्न भिन्न कल्पनाएँ रूढ हो गईं, तो यह कैसे माना जा सकता है, कि उतनेही भिन्न Buddhism would not have come to birth at all." मेसर्सका यह लेख पूनेसे प्रकाशित होनेवाले The Indian Interpreter नामक मिशनरी त्रैमासिक पत्र अक्तूबर १९०९ और जनवरी १९१० के अंकोंमें प्रसिद्ध हुआ है; और ऊपर दिये गये वाक्य जनवरीके अंकके १३३ तथा १३८ पृष्ठों में हैं। डॉ. बुल्हरनेभी कहा है - The ancient Bhagavta, Satvata or Pancharatra sect devoted to the worship of Narayana and his defied teacher Krishna-Devakiputra dates from a period long anterior to the rise of Jainas the 8th Century B. C." -- Indian Antiquary Vol. XXIII. (1894), P. 248. इस विषयका अधिक विवेचन आगे चलकर इसी परिशिष्ट प्रकरणके छठें भागमें किया गया है।