श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४७ बतलाया है (महा. शा. ३३९. १००)। इससे यही सिद्ध होता है, कि नारा- यणीयाख्यान भागवतपुराणसे और नारद-पंचरात्रसे प्राचीन है। इस नारायणीया- ख्यानमे यह वर्णन है, कि नर तथा नारायण (जो परब्रह्महीके अवतार हैं) नामक दो ऋषियोंने नारायणीय अर्थात् भागवत धर्मको पहले पहल जारी किया और उनके कहनेसे जब नारद ऋषि श्वेतद्वीपको गये, तब वहाँ स्वयं भगवान्ने नारदको इस धर्मका प्रथम उपदेश किया। भगवान् जिस श्वेतद्वीपमें रहते हैं, वह क्षीर-समुद्रमें है; और क्षीर-समुद्र मेरुपर्वतकी उत्तरमे है; इत्यादि नारायणी- याख्यानकी बाते प्राचीन और पौराणिक ब्रह्मांडवर्णनके अनुसारही हैं; और इस विषयमें हमारे यहाँ किसीको कुछ कहनाभी नहीं है। परंतु वेवर नामक पश्चिमी संस्कृतज्ञ पंडितने इसी कथाका विपर्यास करके यह दीर्घ शंका की थी, कि भागवत धर्ममें वर्णित भक्ति-तत्त्व श्वेतद्वीपसे-अर्थात् हिंदुस्थानके बाहरके किसी अन्य देशसे-हिंदुस्थानमें लाया गया है; और भक्तिका यह तत्त्व इस समय ईसाई धर्मके अतिरिक्त और कहींभी प्रचलित नहीं था; इसलिए ईसाई देशोंसेही भक्तिकी कल्पना भागवत धर्मियोंको सूझी है! परंतु पाणिनीको वासुदेव-भक्तिका तत्त्व मालूम था; और बौद्ध तथा जैन धर्ममेंभी भागवतधर्म तथा भक्तिके उल्लेख पाये जाते हैं; एवं यह बातभी निर्विवाद है, कि पाणिनी और बुद्ध दोनों ईसाके पहले हुए थे। इसलिये अब पश्चिमी पंडितोंनेभी निश्चित किया है कि वेबर साहबकी उपर्युक्त शंका निराधार है। ऊपर यह बतला दिया गया है, कि भक्तिरूप धर्मका उदय हमारे यहाँ ज्ञान-प्रधान उपनिषदोंके अनंतर हुआ है। इससे यह बात निर्विवाद प्रकट होती है, कि ज्ञान-प्रधान उपनिषदोंके बाद तथा बुद्धके पहले वासुदेव- भक्तिसंबंधी भागवत धर्म उत्पन्न हुआ है। अब प्रश्न केवल इतनाही है, कि वह बुद्धके कितने शतक* पहले हुआ? अगले विवेचनमे यह बात ध्यानमे आ जाएगी, कि यद्यपि उक्त प्रश्नका पूर्णतया निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता; तथापि स्थूल-दृष्टिसे उस कालका अंदाज करना कुछ असंभव नहीं है। गीता (गी. ४. २) में यह कहा है, कि श्रीकृष्णने जिस भागवत धर्मका उपदेश अर्जुनको किया है, उसका पहले लोप हो गया था। भागवत धर्मके तत्त्वज्ञानमें
- भक्तिमान् (पाली = भत्तिमा) शब्द थेरगाथा (श्लो. ३७०) में मिलता है; और एक जातकमेंभी भक्ति का उल्लेख किया गया है। इसके सिवा, प्रसिद्ध फ्रेंच पाली-पंडित सेनार्त (Senart) ने 'बौद्ध धर्मका मूल' इस विषयपर सन १९०९ में एक व्याख्यान दिया था, जिसमें स्पष्ट रूपसे यह प्रतिपादन किया है, कि भागवत धर्म बौद्ध धर्मके पहलेका है। "No one will claim to derive from Buddhism' Vishnuism or the Yoga. Assuredly, Buddhism is the borrower",... "To sum up, if there had not previously, existed a religion made up of the doctrines of Yoga, of Vishnuite legends, of devo- tion to Vishnu-Krishna, worshipped under the title of Bhagavata