श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४-३५१). शाण्डिल्य-सूत्र, भागवत-पुराण, नारद-पांचरात्र, नारद-सूत्र, तथा रामानुजाचार्य आदिके ग्रंथ। इनमें रामानुजाचार्यके ग्रंथ तो प्रत्यक्षमें सांप्रदायिक दृष्टिसेही, अर्थात् भागवतधर्मके विशिष्टाद्वैत वेदान्तसे मेल करनेके लिये विक्रम संवत् १२३५ में (शालिवाहन शकके लगभग बारहवें शतकमे) लिखे गये हैं। अतएव भागवत धर्मका मूल-स्वरूप निश्चित करनेके लिये इन ग्रंथोंका सहारा नहीं लिया जा सकता; और यही बात मध्वादि के अन्य वैष्णव ग्रंथोंकीभी है। श्रीमद्भागवतपुराण इसके पहलेका है। परंतु इस पुराणके आरम्भमेंही यह कथा है (भाग. स्क. १ अ. ४, ५), कि जब व्यासजीने देखा, कि महाभारतमे, अत- एव गीतामेंभी, नैष्कर्म्य-प्रधान भागवत धर्मका जो निरूपण किया गया है, उसमे भक्तिका जैसा चाहिये वैसा वर्णन नहीं है; और "भक्तिके बिना केवल नैष्कर्म्य शोभा नहीं पाता", तब उनका मन कुछ उदास और अप्रसन्न हो गया; एवं अपने मनकी उस तलमलाहटको दूर करनेके लिये नारदजीकी सूचनासे उन्होंने भक्तिके माहात्म्यका प्रतिपादन करनेवाले भागवतपुराणकी रचना की। इस कथाका ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार करनेपर दीख पड़ेगा, कि मूल भागवत धर्ममें अर्थात् भारतान्तर्गत भागवत धर्ममें नैष्कर्म्यको जो श्रेष्ठता दी गयी थी, वह जब समयके हेरफेरसे कम होने लगी; और उसके बदले जब भक्तिको प्रधानता दी जाने लगी, तब भागवत धर्मके इस दूसरे स्वरूपका (अर्थात् भक्तिप्रधान भागवत धर्मका) प्रतिपादन करनेके लिये यह भागवतपुराणरूपी मेवा पीछे तैयार किया गया है। नारदपंचरात्र-ग्रंथभी इसी प्रकार का अर्थात् केवल भक्ति-प्रधान है; और उसमे द्वादश-स्कंधोंके भागवतपुराणका तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण, विष्णुपुराण, गीता और महाभारतका नामोल्लेख कर स्पष्ट निर्देश किया गया है (ना. प. २. ७. २८-३२; ३. १४. ३३; ४. ३. १५४)। इसलिये यह प्रकट है, कि भागवत धर्मके मूल-स्वरूपका निर्णय करनेके लिये इस ग्रंथकी योग्यता भागवत- पुराणसेभी कम दर्जेकी है। नारदसूत्र तथा शांडिल्य-सूत्र कदाचित् नारदपंचरात्र- सेभी कुछ प्राचीन हों; परंतु नारद-सूत्रमे व्यास और शुक (ना. सू ८३) का उल्लेख है, इसलिए वह भारत और भागवतके बादका है; और शांडिल्यसूत्रमें भगवद्गीताके श्लोक ही उद्धृत किये गये हैं (शा सू. ९. १५ और ८३)। अतएव यह सूत्र यद्यपि नारद-सूत्र (ना. सू ८३) से प्राचीनभी हो; तथापि उसमे संदेह नहीं, कि यह गीता और महाभारतके अनन्तर का है। अतएव, भागवत-धर्मके मूल तथा प्राचीन स्वरूपका निर्णय अंतमे भारतान्तर्गत नारायणीयाख्यानके आधारसेही करना पड़ता है। भागवतपुराण (भाग १. ३. २४) और नारद-पंचरात्र (ना पं. ४. ३ १५६-१५९; ४. ८ ८१) ग्रंथोमे बुद्धको विष्णुका अवतार कहा है। परंतु नारायणीयाख्यानमें वर्णित दशावतारोंमे बुद्धका समावेश नहीं किया गया है - पहला अवतार हंसका और आगे कृष्णके बाद एकदम कल्कि अवतार