श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४५ लिये कोई प्रमाण नहीं है। परंतु यदि कुछ देरके लिए दोनोंको एकही व्यक्ति लें; तोभी स्मरण रहे, कि ज्ञान-यज्ञको श्रेष्ठ माननेवाली गीतामें घोर आंगिरसका कहींभी उल्लेख नहीं किया गया है। इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषदमे यह बात प्रकट है, कि जनकका मार्ग यद्यपि ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक था, तथापि उस समय इस मार्गमें भक्तिका समावेश नहीं किया गया था। अतएव भक्तियुक्त ज्ञान-कर्म- समुच्चय पंथकी सांप्रदायिक परंपरामे जनककी गणना नही की जा सकती, और न वह गीतामें की गई है। गीताके चौथे अध्यायके आरंभमें कहा है (गीता ४. १-३), कि युगके आरंभमें भगवानने पहले विवस्वानको, विवस्वानने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको गीता-धर्मका उपदेश किया था; परंतु कालके हेरफेरसे उसका लोप हो जानेके कारण वह फिरसे अर्जुनको बतलाना पड़ा। गीता-धर्मकी परंपराका ज्ञान होनेके लिये ये श्लोक अत्यंत महत्त्वके हैं, परंतु टीकाकारोंने शब्दार्थ बतलानेके अतिरिक्त उनका विशेष रीतिसे स्पष्टीकरण नहीं किया है; और कदाचित् ऐसा करना उन्हे इष्टभी न रहा हो। क्योकि, यदि कहा जाय, कि गीता-धर्म मूलमें किसी एक विशिष्ट पंथका है; तो उससे अन्य धार्मिक पंथोंको कुछ-न-कुछ गौणता प्राप्त हो जाती है। परंतु हमने गीतारहस्यके आरंभमे तथा गीताके चौथे अध्यायके प्रथम दो श्लोकोंकी टीकामे प्रमाणसहित इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया है, कि गीतामें वर्णित परंपराका मेल उस परंपराके साथ पूरा दीख पडता है, कि जो महाभारतान्तर्गत नारायणीयोपाख्यानमे वर्णित भागवत धर्मकी परंपरा में अंतिम त्रेतायुग-कालीन परंपरा है। भागवत धर्म तथा गीता-धर्मकी परंपराकी एकताको देखकर कहना पड़ता है कि गीता-ग्रंथ भागवत-धर्मीय है; और यदि इस विषयमें कुछ शंका हो, तो महाभारतमें दिये गये वैशंपायनके इस वाक्य - "गीतामें भागवत धर्मही बतलाया गया है" (मभा. शां. ३४६. १०) से वह दूर हो जाती है। इस प्रकार जब यह सिद्ध हो गया, कि गीता औपनिषदिक ज्ञानका अर्थात् वेदान्तका स्वतंत्र ग्रंथ नही है, उसमे भागवत धर्मका प्रतिपादन किया गया है; तब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नही, कि भागवत धर्मसे अलग करके गीताकी जो चर्चा की जाएगी, वह अपूर्ण तथा भ्रममूलक होगी। अतएव, भागवत धर्म कब उत्पन्न हुआ और उसका मूल स्वरूप क्या था, इत्यादि प्रश्नोंके विषयमें जो बाते इस समय उपलब्ध हैं, उनकाभी विचार संक्षेपमें यहाँ किया जाना चाहिये। गीतारहस्यमें हम पहलेही कह चुके हैं, कि इस भागवतधर्मकेही नारायणीय, सात्वत, पांचरात्र-धर्म आदि अन्य नाम हैं। उपनिषत्कालके बाद और बुद्धके पहले जो वैदिक धर्म-ग्रंथ बने, उनमेंसे अधिकांश ग्रंथ लुप्त हो गये हैं, इस कारण भागवत धर्मपर वर्तमान समयमे जो ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनमेंसे, गीताके अतिरिक्त, मुख्य ग्रंथ येही हैं - महाभारतान्तर्गत शांतिपर्वके अंतिम अठारह अध्यायोंमे निरूपित नारायणीयोपाख्यान (मभा. शां. गी. र. ३५