श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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छांदोग्यादिकी अपेक्षा अर्वाचीन है। अतएव ऐतिहासिक दृष्टिसे यह कहना पड़ता है, कि छांदोग्यादि प्राचीन उपनिषदोंमे वर्णित कर्म, ज्ञान अथवा संन्यास, और ज्ञानकर्म-समुच्चय - इन तीनों दलोंका प्रादुर्भाव हो जानेपरही आगे योग-मार्ग और भक्ति-मार्गको श्रेष्ठता प्राप्त हुई है। परंतु योग और भक्ति, ये दोनों साधन यद्यपि उक्त प्रकारसे आगे श्रेष्ठ माने गये तथापि उनके पहलेके ब्रह्मज्ञानकी श्रेष्ठता उसमें कुछ कम नहीं हुई; और न उसका कम होना संभवही था। इसी कारण योग-प्रधान अथवा भक्ति-प्रधान उपनिषदोंमेंभी ब्रह्मज्ञानको भक्ति और योगका अंतिम साध्य कहा है। और ऐसा वर्णनभी कई स्थानोंमें पाया जाता है, कि जिन रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण तथा वासुदेव आदिकी भक्ति की जाती है, वेभी परमात्माके अथवा परब्रह्मके रूप हैं (मैत्र्यु. ७. ७; रामपू. १६; अमृतबिंदु २२ आदि)। सारांश वैदिक धर्ममें समय समयपर आत्मज्ञानी पुरुषोंने जिन धर्मांगोंको प्रवृत्त किया है, वे प्राचीन समयमे प्रचलित धर्मांगोंसेही प्रादुर्भूत हुए हैं; और नये धर्मांगोंका प्राचीन समयमें प्रचलित धर्मांगोंके साथ मेल करा देनाही वैदिक धर्मकी उन्नतिको पहलेसे मुख्य उद्देश्य रहा है, तथा भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनेके इसी उद्देश्यको स्वीकार करके, आगे चलकर स्मृतिकारोंने आश्रमव्यवस्था-धर्मका प्रतिपादन किया है। भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनेकी इस प्राचीन पद्धतिपर ध्यान दिया जाता है तब यह कहना सयुक्तिक नहीं प्रतीत होता, कि उक्त पूर्वापर पद्धतिको छोड़ केवल गीता-धर्मही अकेला प्रवृत्त हुआ होगा। ब्राह्मण-ग्रंथोंके यज्ञ-यागादि कर्म, उपनिषदोंका ब्रह्मज्ञान, कपिल-सांख्य, चित्त- निरोधस्पी योग तथा भक्ति, यही वैदिक धर्मके मुख्य मुख्य अंग हैं, और इनकी उत्पत्तिके क्रमका सामान्य इतिहास ऊपर लिखा गया है। अब इस बातका विचार किया जाएगा, कि गीतामें इन सब धर्मांगोंका जो प्रतिपादन किया गया है, उसका मूल क्या है? - अर्थात् वह प्रतिपादन साक्षात् भिन्न भिन्न उपनिषदोंसे गीतामें लिया गया है अथवा बीचमें एक-आध सीढ़ी और है। केवल ब्रह्मज्ञानके विवेचनके समय कठ आदि उपनिषदोंके कुछ श्लोक गीतामें ज्यों-के-त्यों दिये गये हैं; और ज्ञान- कर्म-समुच्चय-पक्षका प्रतिपादन करते समय जनक आदिके औपनिषदिक उदाहरणभी दिये गये हैं। इससे प्रतीत होता है, कि गीता-ग्रंथ साक्षात् उपनिषदोंके आधारपर रचा गया होगा। परंतु गीताहीमे गीता-धर्मकी जो परंपरा दी गई है, उसमें तो उपनिषदोंका कहींभी उल्लेख नहीं मिलता। जिस प्रकार गीतामें द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानमय यज्ञको श्रेष्ठ माना है (गीता ४ ३३), उसी प्रकार छांदोग्योप- निषदमेभी एक स्थानपर यह कहा है, कि मनुष्यका जीवन एक प्रकारका यज्ञही है (छां. ३. १६, १७)। और इस प्रकारके यज्ञकी महत्ताका वर्णन करते हुए यहभी कहा है, कि "यह यज्ञ-विद्या घोर आंगिरस नामक ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको बतलाई।" उस देवकीपुत्र कृष्ण तथा गीताके श्रीकृष्णको एकही व्यक्ति माननेके