भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४३ भाष्योंमेंसे इस भेदको निकाल डालनेका प्रयत्न किया गया है। परंतु गीतारहस्यके ग्यारहवे प्रकरणके अंतमें किये गये विवेचनसे यह बात ध्यानमे आ जाएगी, कि शांकर-भाष्यमें ये साप्रदायिक अर्थ खीचातानीमे किये गये हैं, और इसलिये इन उपनिषदोंपर स्वतंत्र रीतिसे विचार करते समय वे अर्थ ग्राह्य नही माने जा सकते। यह नहीं कि, केवल यज्ञयागादि कर्म तथा ब्रह्मज्ञानहीमे मेल करनेका प्रयत्न किया गया हो; किंतु मैत्र्युपनिषदके विवेचनसे यह बातभी साफ़ साफ़ प्रकट होती है, कि कापिलसांख्यमे पहले पहल स्वतंत्र रीतिसे प्रादुर्भूत क्षराक्षरज्ञानकी तथा उप- निषदोंके ब्रह्मज्ञानकी एकवाक्यता - जितनी हो सकती थी - करनेकाभी प्रयत्न उसी समय आरंभ हुआ था। बृहदारण्यकादि प्राचीन उपनिषदोमे कापिल-सांख्यज्ञानको कुछ महत्त्व नहीं दिया गया है। परंतु मैत्र्युपनिषदमें सांख्योंकी परिभाषाका पूर्णतया स्वीकार करके यह कहा है, कि अंतमे एक परब्रह्महीमे सांख्योके चौबीस तत्त्व निर्मित हुए हैं। तथापि कापिल-सांख्यशास्त्रभी वैराग्य-प्रधान अर्थात् कर्मके विरुद्ध है। तात्पर्य यह है, कि प्राचीन कालमेंही वैदिक धर्मके तीन दल हो गये थे - ( १ ) केवल यज्ञयाग आदि कर्म करनेका मार्ग; ( २ ) ज्ञान तथा वैराग्यसे कर्म- संन्यास करना, अर्थात् ज्ञाननिष्ठा अथवा सांख्यमार्ग; और ( ३ ) ज्ञान तथा वैराग्य- बुद्धिहीसे नित्य कर्म करनेका मार्ग, अर्थात् ज्ञानकर्म-समुच्चय-मार्ग। इनमेंसे ज्ञानमार्ग- हीसे आगे चलकर दो अन्य शाखाएँ - योग और भक्ति - निर्मित हुई हैं। छांदो- ग्यादि प्राचीन उपनिषदोंमें यह कहा है, कि परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मचिंतन अत्यंत आवश्यक है; और यह चिंतन, मनन तथा ध्यान करनेके लिये चित्त एकाग्र होना चाहिये; और चित्तको स्थिर करनेके लिये परब्रह्मका कोई न कोई सगुण प्रतीक पहले नेत्रोके सामने रखना पड़ता है। इस प्रकार ब्रह्मोपासना करते रहनेसे चित्तकी जो एकाग्रता हो जाती है, उसीको आगे विशेष महत्त्व दिया जाने लगा और चित्तनिरोधरूपी योग एक जुदा मार्ग हो गया; और जब सगुण प्रतीकके बदले परमेश्वरके मानवरूपधारी व्यक्त प्रतीककी उपासनाका आरंभ धीरे धीरे होने लगा, तब अंतमे भक्ति-मार्ग उत्पन्न हुआ। यह भक्तिमार्ग औपनिषदिक ज्ञानसे अलग, बीचहीमे स्वतंत्र रीतिसे प्रादुर्भूत नहीं हुआ है; और न भक्तिकी कल्पना हिंदुस्थानमे किसी अन्य देशसे लाई गई है। सब उपनिषदोंका अवलोकन करनेसे यह क्रम दीख पड़ता है, कि पहले ब्रह्मचिंतनके लिये यज्ञके अंगोंकी अथवा ॐकारकी उपासना थी; आगे चलकर रुद्र, विष्णु आदि वैदिक देवताओंकी, अथवा आकाश आदि सगुण व्यक्त-ब्रह्म-प्रतीकोंकी, उपासनाका आरंभ हुआ; और अंतमें इसी हेतुसे अर्थात् ब्रह्मप्राप्तिके लियेही राम, नृसिंह, श्रीकृष्ण, वासुदेव आदिकी भक्ति, अर्थात् एक प्रकारकी उपासना, जारी हुई है। उपनिषदोंकी भाषामे यह बातभी साफ़ साफ़ मालूम होती है, कि उनमेंसे योगतत्त्वादि योग- विषयक उपनिषद् अथवा नृसिंहतापनी, रामतापनी आदि भक्तिविषयक उपनिषद्