श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२७ बृहदारण्यक (बृ. ४. ५. १३) का यह विषय मिलता है, कि 'न प्रेत्य संज्ञास्ति' - मरनेपर ज्ञातको कोई संज्ञा नहीं रहती, क्योंकि वह ब्रह्ममें मिल जाता है; और वहीं अंतमें प्रश्न (प्रश्न. ६. ५) तथा मुंडक (मुं. ३. २. ८) उपनिषदोंमें वर्णित नदी और समुद्रका दृष्टान्त नाम-रूपसे विमुक्त पुरुषके विषयमें दिया गया है। इंद्रियोंको घोड़े कह कर ब्राह्मण-व्याध-संवाद (वन. २१०) में और अनुगीतामें बुद्धिको सारथीकी जो उपमा दी गई है, वहीभी कठोपनिषद्सेही ली गई है (कठ. १. ३. ३) ; और कठोपनिषद्के ये दोनों श्लोक - "एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा" (कठ. ३. १२) और "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात्" (कठ २. १४) - भी शांतिपर्वमें दो स्थानोंपर (शां. १८७. २९; ३३१. ४४) कुछ फेरफारके साथ पाये जाते हैं। श्वेताश्वतरका 'सर्वतः पाणिपादम्' श्लोकभी, जैसा कि पहले कह चुके हैं, महाभारतमें अनेक स्थानोंपर और गीतामेंभी मिलता है। परंतु केवल इतनेहीमें यह सादृश्य पूरा नहीं हो जाता, इनके सिवा उपनिषदोंके औरभी बहुत-से वाक्य महाभारतमें कई स्थानोंपर मिलते हैं। यहीं क्यों; यहभी कहा जा सकता है, कि महाभारतका अध्यात्मज्ञान प्रायः उपनिषदोंसेही लिया गया है। गीतारहस्यके नवें और तेरहवें प्रकरणोंमें हमने विस्तारपूर्वक दिखला दिया है, कि महाभारतके समानही भगवद्गीताका अध्यात्मज्ञानभी उपनिषदोंके आधार- पर स्थापित है; और गीतामें भक्ति-मार्गका जो वर्णन है, वहभी इस ज्ञानमे अलग नहीं है। अतएव यहाँ उसको दुबारा न लिखकर संक्षेपमें सिर्फ़ यही बतलाते हैं, कि गीताके द्वितीय अध्यायमें वर्णित आत्माका अशोच्यत्व, आठवें अध्यायका अक्षर- ब्रह्मस्वरूप और तेरहवें अध्यायका क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार तथा विशेष करके 'ज्ञेय' पर- ब्रह्मका स्वरूप - इन सब विषयोंका वर्णन गीतामें अक्षरशः उपनिषदोंके आधारपरही किया गया है। कुछ उपनिषद् गद्यमें हैं और कुछ पद्यमें हैं। उनमेंसे गद्यात्मक उप- निषदोंके वाक्योंको पद्यमय गीतामें ज्यों-का-त्यों उद्धृत करना संभव नहीं; तथापि जिन्होंने छांदोग्योपनिषद् आदिको पढ़ा है, उनके ध्यानमें यह बात सहजही आ जायगी, कि "जो है सो है; और जो नहीं, हो नहीं" (गीता २. १६) तथा "यं यं वापि स्मरन् भावम् ०" (गीता ८. ६) इत्यादि विचार छांदोग्योपनिषद्से लिये गये हैं; और "क्षीणे पुण्ये" (गीता ९. २१), "ज्योतिषां ज्योतिः" (गीता १३.१७) तथा "मात्रास्पर्शाः" (गीता २. १४) इत्यादि विचार और वाक्य बृहदारण्यक उपनिषदसे लिये गये हैं। परंतु गद्यात्मक उपनिषदोंको छोड़ जब पद्या- त्मक उपनिषदोंपर विचार करते हैं, तो यह समता इससेभी अधिक स्पष्ट हो जाती है। क्योंकि इन पद्यात्मक उपनिषदोंके कुछ श्लोक ज्यों-के त्यों भगवद्गीतामें उद्धृत किये गये हैं। उदाहरणार्थ, कठोपनिषदके छः-सात श्लोक अक्षरशः अथवा कुछ शब्दभेदसे गीतामें लिये गये हैं। गीताके द्वितीय अध्यायका "आश्चर्यवत्पश्यति ०" (गीता. २. २९) श्लोक, कठोपनिषद्की द्वितीय वल्लीके "आश्चर्यो वक्ता ०"