श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
यह समझ हो गई, केवल 'महाभारत' ही एक भारत ग्रंथ है ; वर्तमान महाभारतकी पोथीमेंभी यह वर्णन मिलता है, कि व्यासजीने पहले अपने पुत्र - शुक - को और अनंतर अपने अन्य शिष्योंको भारत पढ़ाया था ( आ. १. १०३ ); और आगे यहभी कहा, कि सुमंतु, जैमिनि, पैल, शुक और वैशंपायन इन पाँच शिष्योंने पाँच भिन्न भिन्न भारतसंहिताओंकी अथवा महाभारतोंकी रचना की ( आ. ६३. ९० ) । इस विषयमें यह कथा पाई जाती है, कि इन पाँच महाभारतोंमेंसे वैशंपायनके महाभारतको और जैमिनीके महाभारतसे केवल अश्वमेधपर्वहीको व्यासजीने रख लिया । इससे अब यहभी मालूम हो जाता है, कि ऋषितर्पणमें 'भारत-महाभारत' शब्दोंके पहले सुमंतु आदि नाम क्यों रखे गये हैं। परंतु यहाँ इस विषयके इतने गहरे विचारका कोई प्रयोजन नहीं । रा. ब. चिंतामणराव वैद्यने महाभारतके अपने टीका- ग्रंथमें इस विषयका विचार करके जो सिद्धान्त स्थापित किया है, वही हमें संयु- क्तिक मालूम होता है । अतएव यहाँ परइतना कह देनाही यथेष्ट होगा, कि वर्तमान समयमें जो महाभारत उपलब्ध है, वह मूलमें वैसाही न था; भारत या महा- भारतके अनेक रूपांतर हो गये हैं; और उस ग्रंथको जो अंतिम स्वरूप प्राप्त हुआ, वह हमारा वर्तमान महाभारत है। यह नहीं कहा जा सकता, कि मूल भारतमेंभी गीता न रही होगी । हाँ, यह प्रकट है कि सनत्सुजातीय, विदुरनीति, शुकानुप्रश्न, याज्ञवल्क्य-जनक-संवाद, विष्णुसहस्रनाम, अनुगीता, नारायणीय धर्म आदि प्रकरणोंके समानही वर्तमान गीताकोभी महाभारतकारने पहले ग्रंथोंके आधारपरही लिखा है – नई रचना नहीं की है । तथापि, यहभी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, कि मूल गीतामें महाभारतकारने कुछभी हेरफेर न किया होगा । उपर्युक्त विवेचनसे यह बात सहजही समझमें आ सकती है, कि वर्तमान सात सौ श्लोकोंकी गीता वर्तमान महाभारतहीका एक भाग है; दोनोंकी रचनाभी एकनेही की है; और वर्तमान महा- भारतमें वर्तमान गीताको किसीने बादमें मिला नहीं दिया है । आगे यहभी बतलाया जायगा, कि वर्तमान महाभारतका समय कौन-सा है, और मूल गीताके विषयमें हमारा मत क्या है ।
भाग २ - गीता और उपनिषद्
अब देखना चाहिये, कि गीता और भिन्न भिन्न उपनिषदोंका परस्पर संबंध क्या है । वर्तमान महाभारतहीमें स्थान-स्थानपर सामान्य रीतिसे उपनिषदोंका उल्लेख किया गया है; और बृहदारण्यक ( बृ. १. ३ ) तथा छांदोग्य ( छां. १. २ ) में वर्णित प्राणेंद्रियोंके युद्धका हालभी अनुगीता ( अश्व. २३ ) मेंभी है; तथा “ न मे स्तेनो जनपदे ” आदि कैकेय-अश्वपति राजाके मुखसे निकले हुए शब्दभी ( छां. ५. ११. ५ ) शांतिपर्वमें उक्त राजाकी कथाका वर्णन करते समय ज्यों-के- त्यों पाये जाते हैं ( शा. ७७. ८ ) । इसी प्रकार शांतिपर्वके जनक-पंचशिख-संवादमें