श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२५ यदि इस धर्म-संहितामें कर्मयोगका शास्त्रीय तथा तात्त्विक विवेचन न किया जाय, तो फिर वह कहाँ किया जा सकता है ? केवल वेदान्त-ग्रंथोंमें यह विवेचन नही किया जा सकता । उसके लिये योग्य स्थान धर्मसंहिताही है, और यदि महाभारत- कारने यह विवेचन न किया होता, तो यह धर्म-अधर्मका वृहत् संग्रह अथवा पाँचवाँ वेद उतनाही अपूर्ण रह जाता । इस अपूर्णताकी पूर्ति करनेके लियेही भगवद्गीता महाभारतमें रखी गई है । सचमुच यह बड़ा भाग्य है, कि इस कर्मयोगशास्त्रका मंडन महाभारतका जैसे उत्तम ज्ञानी सत्पुरुषनेही किया है, जो वेदान्तशास्त्रके समानही व्यवहारमें भी अत्यंत निपुण । इस प्रकार सिद्ध हो चुका, कि वर्तमान भगवद्गीता प्रचलित महाभारतहीका एक भाग है; तथापि अब उसके अर्थका कुछ अधिक स्पष्टीकरण करना चाहिये । भारत और महाभारत इन दो शब्दोंको हम लोग आजकल समानार्थक समझते हैं; परंतु वस्तुतः वे दो भिन्न भिन्न शब्द हैं । व्याकरणकी दृष्टिसे देखा जाय, तो 'भारत' नाम उस ग्रंथको प्राप्त हो सकता है, जिसमें भरतवंशी राजाओंके परा- क्रमका वर्णन हो । रामायण, भागवत आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति ऐसीही है; और, इस रीतिसे भारतीय युद्धका; जिस ग्रंथमें वर्णन है, उसे केवल 'भारत' कहना यथेष्ट हो सकता है; फिर वह ग्रंथ चाहे जितना विस्तृत हो । रामायण ग्रंथभी कुछ छोटा नही है; परंतु उसे कोई महारामायण नहीं कहता । फिर भारतहीको 'महाभारत' क्यो कहते हैं ? महाभारतके अंतमें यह बतलाया है, कि महत्त्व और भारतत्व इन दो गुणोंके कारण इस ग्रंथको महाभारत नाम दिया गया है ( स्वर्गा. ५. ४४ ) । परंतु 'महाभारत'का सरल शब्दार्थ 'बड़ा भारत' होता है; और ऐसा अर्थ करनेसे यह प्रश्न उठता है, कि 'बड़े' भारतके पहले क्या कोई 'छोटा' भारतभी था ? और, उसमें गीता थी या नहीं ? वर्तमान महाभारतके आदिपर्वमें लिखा है, कि उपाख्यानोंके अतिरिक्त महाभारतके श्लोकोंकी संख्या चौबीस हजार है ( महा. आ. १. १०१ ) ; और आगे चलकर यहभी लिखा है, कि पहले इसीका नाम 'जय' था ( आ. ६२. २० )। 'जय' शब्दसे भारतीय युद्धमें पांडवोंकी जयका बोध होता है; और ऐसा अर्थ करनेसे यही प्रतीत होता है, कि भारतीय युद्धका वर्णन 'जय' नामक ग्रंथमें पहले किया गया था; आगे चलकर उसी ऐतिहासिक ग्रंथमें अनेक उपाख्यान जोड़ दिये गये; और इस प्रकार महाभारत एक बड़ा ग्रंथ हो गया, जिसमें इतिहास और धर्म-अधर्म विवेचनकाभी निरूपण किया गया है । आश्वलायन गृह्यसूत्रोंके ऋषितर्पणमें “ सुमंतु-जैमिनी-वैशंपायन-पैल-सूत्र-भाष्यभारत-महाभारत धर्माचार्याः ” ( आ. गृ. ३. ४. ४ ) इस प्रकार भारत और महाभारत इन दो भिन्न भिन्न ग्रंथोंका स्पष्ट उल्लेख किया गया है; उनमेंभी उक्त अनुमानही दृढ़ हो जाता है । इस प्रकार छोटे भारतका बड़े भारतमें समावेश हो जानेमे कुछ कालके बाद, छोटा 'भारत' नामक स्वतंत्र ग्रंथ शेष नहीं रहा; और स्वभावतः लोगोंमें