श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (गीता १०. ३५) कहकर इस मासको जिस प्रकार पहला स्थान दिया है, उसी प्रकार अनुशासनपर्वके दानधर्म-प्रकरणमें जहाँ उपवासके लिये महीनोंके नाम बतलानेका मौक़ा दो बार आया है, वहाँ प्रत्येक बार मार्गशीर्षसेही महिनोंकी गिनती आरंभ की गई है (अनु. १०६, १०९) । गीतामें वर्णित आत्मौपम्यकी या सर्वभूतहितकी दृष्टि, अथवा आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक भेद तथा देवयान और पितृयान-गतिका उल्लेख महाभारतके अनेक स्थानोंमें पाया जाता है, परंतु पिछले प्रकरणोंमें इनका विस्तृत विवेचन किया जा चुका है; अतएव यहाँपर पुनरुक्तिकी आवश्यकता नहीं। भाषा-सादृश्यकी ओर देखिये, या अर्थ-सादृश्यपर ध्यान दीजिये, अथवा गीताके विषय महाभारतमें जो छः-सात उल्लेख मिलते हैं, उन पर विचार कीजिये; अनुमान यही करना पड़ता है, कि गीता वर्तमान महाभारतकाही एक भाग है; और जिस पुरुषने वर्तमान महाभारतकी रचना की है, उसीने वर्तमान गीताकाभी वर्णन किया है। हमने देखा है, कि इन सब प्रमाणोंकी ओर ध्यान न देकर अथवा किसी तरह उनका अटकल-पच्चू अर्थ लगाकर, कुछ लोगोंने गीताको प्रक्षिप्त सिद्ध करनेका का यत्न किया है। परंतु जो लोग बाह्य प्रमाणोंको नहीं मानते; और अपने- ही संशयरूपी पिशाचको अग्रस्थान दिया करते हैं, हमारे मतसे, उनकी विचार-पद्धति सर्वथा अशास्त्रीय अतएव अग्राह्य है। हाँ, यदि इस बातकी उपपत्तिही मालूम न होती, कि गीताको महाभारतमें क्या स्थान दिया गया है, तो बात कुछ और थी । परंतु जैसे कि इस प्रकरणके आरंभमें बतला दिया गया है; गीता केवल वेदान्त- प्रधान अथवा भक्ति-प्रधान नहीं है; किंतु महाभारतमे जिन प्रमाणभूत श्रेष्ठ पुरुषोंके चरित्रोंका वर्णन किया गया है, उनके चरित्रोंका नीति-तत्त्व या मर्म बतलानेके लिये महाभारतमें कर्मयोग-प्रधान गीताका निरूपण अत्यंत आवश्यक था; और वर्तमान समयमें महाभारतके जिस स्थानपर वह पाई जाती है, उससे बढ़कर, काव्य-दृष्टि- सेभी कोई अधिक योग्य स्थान उसके लिये दीख नहीं पड़ता । इतना सिद्ध होनेपर अंतिम सिद्धान्त यही निश्चित होता है, कि गीता महाभारतमे उचित कारणसे और उचित स्थानपरही कही गई है - वह प्रक्षिप्त नहीं है। महाभारतके समानही रामा- यणभी सर्वमान्य और उत्कृष्ट आर्ष महाकाव्य है; और उसमेंभी कथा-प्रसंगानुसार सत्य, पुत्रधर्म, मातृधर्म, रणधर्म, आदिका मार्मिक विवेचन है। परंतु यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि वाल्मीकि ऋषिका मूल हेतु अपने काव्यको महाभारतके समान "अनेकसमयान्वित, सूक्ष्म धर्म-अधर्मके न्यायोंसे ओतप्रोत, और सब लोगोंको शील तथा सच्चरितकी शिक्षा देनेमें सब प्रकारसे समर्थ" बनानेका नहीं था, इसलिये धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य या नीतिकी दृष्टिसे महाभारतकी योग्यता रामायणसे कहीं बढ़कर है। महाभारत केवल आर्ष काव्यका केवल इतिहास नहीं है; किंतु वह एक संहिताही है, जिसमें धर्म-अधर्मके सूक्ष्म प्रसंगोंका निरूपण किया गया है; और