भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 568

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२३ वनपर्वके आरंभमें द्रौपदीने युधिष्ठिरसे कहा है, कि अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है; कर्म न किया जाय, तो उपजीविकाभी न हो सकेगी । सो यही बातें (मभा. वन. ३२); और इन्ही तत्त्वोंका उल्लेख अनुगीतामेंभी फिरसे किया गया है। श्रौत-धर्म या स्मार्त-धर्म यज्ञमय है, यज्ञ और प्रजाको ब्रह्मदेवने एकही साथ निर्माण किया है, इत्यादि गीताका प्रवचन नारायणीय धर्मके अतिरिक्त शांतिपर्वके अन्य स्थानोंमें (शां. २६७) और मनुस्मृति (मनु. ३) मेंभी मिलता है। तुलाधार-जाजली- संवादमें तथा ब्राह्मण-व्याध-संवादमेंभी यही विचार मिलते हैं, कि स्वधर्मके अनुसार कर्म करनेमें कोई पाप नहीं है (मभा. शां. २६०-२६३; वन. २०६-२१५)। इसके सिवा, सृष्टिकी उत्पत्तिका जो थोड़ा वर्णन गीताके सातवें और आठवें अध्यायोंमें है, उसी प्रकारका वर्णन शांतिपर्वके शुकानुप्रश्नमेंभी पाया जाता है (शां. २३१); और छठे अध्यायमें पातंजलयोगके आसनोंका जो वर्णन है, उसीका फिरसे शुकानु- प्रश्न (शां. २३९) में और आगे चलकर शांतिपर्वके ३००वें अध्यायमें तथा अनुगीतामेंभी विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है (अश्व. १९)। अनुगीताके गुरुशिष्य-संवादमें किये गये मध्यमोत्तम वस्तुओंके वर्णन (अश्व. ४३, ४४) और गीताके दसवें अध्यायके विभूति-वर्णनके विषयमें तो यह कहा जा सकता है, कि इन दोनोंका प्रायः एकही अर्थ है। महाभारतमें कहा है, कि गीतामें भगवानने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखलाया था, वही संधि-प्रस्तावके समय दुर्योधन आदि कौरवोंको, और युद्धके बाद द्वारकाको लौटते समय मार्गमें उत्तंकको भगवानने दिखलाया; और नारायणने नारदको तथा दाशरथि रामने परशुरामको दिखलाया (उ. १३०; अश्व. ५५; शां. ३३९; वन ९९)। इसमें संदेह नहीं, कि गीताका विश्वरूप-वर्णन इन चारों स्थानोंके वर्णनोंसे कहीं अधिक सुरस और विस्तृत है; परंतु सब वर्णनोंको पढ़नेसे यह सहजही मालूम हो जाता है, कि अर्थ-सादृश्यकी दृष्टिसे उनमें कोई नवीनता नहीं है। गीताके चौदहवें और पंद्रहवें अध्यायोंमें इन बातोंका निरूपण किया गया है, कि सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंके कारण सृष्टिमें भिन्नता कैसे उत्पन्न होती है; इन गुणोंके लक्षण क्या हैं; और सब कर्तृत्व गुणोंहीका है, आत्माका नहीं; ठीक इसी प्रकार, इन तीनोंका वर्णन अनुगीता (अश्व. ३६-३९) और शांतिपर्वमेंभी अनेक स्थानोंमें पाया जाता है (शां. २८५, ३३०-३११); सारांश, गीतामें जिस प्रसंगका वर्णन किया गया है, उसके अनुसार उसमें कुछ विषयोंका विवेचन अधिक विस्तृत हो गया है, और गीताकी विषय- विवेचन-पद्धतिभी कुछ भिन्न है; तथापि यह दीख पड़ता है, कि गीताके सब विचारोंसे समानता रखनेवाले विचार महाभारतमेंभी पृथक् पृथक्, कहीं-न-कहीं, न्यूनाधिक पायेही जाते हैं; और यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि विचार-सादृश्यके साथ- ही-साथ थोड़ीबहुत समता शब्दोंमेंभी आप-ही आप आ जाती है। मार्गशीर्ष महीनेके संबंधकी सादृश्यता तो बहुतही विलक्षण है। गीतामें “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”