भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 956 में से

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पृष्ठ 573

५२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (कठ. २. ७) श्लोकके समान है; और “न जायते म्रियते वा कदाचित्०” (गीता २. २०) श्लोक तथा “यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरंति०” (गीता ८. ११) श्लोकार्ध, गीता और कठोपनिषद्‌में अक्षरशः एकही हैं (कठ. २. १९; २. १५)। यह पहलेही बतला दिया गया है, कि गीताका “इंद्रियाणि पराण्याहु०” (गीता ३. ४२) श्लोक कठोपनिषदसे (कठ. ३. १०) लिया गया है। इसी प्रकार गीताके पंद्रहवें अध्यायमें वर्णित अश्वत्थ वृक्षका रूपक कठोपनिषदसे और “न तद्भासयते सूर्यो०” (गीता १५. ६) श्लोक कठ तथा श्वेताश्वतर उपनिषदोंसे शब्दोंमें कुछ फेरफार करके लिया गया है।” श्वेताश्वतर उपनिषदकी अन्य बहुतेरी कल्पनाएँ तथा श्लोकभी गीतामें पाये जाते हैं। नवें प्रकरणमें कह चुके हैं, कि माया शब्दका प्रयोग पहले पहल श्वेताश्वेतरोपनिषदमें हुआ है; और वहीसे वह गीता तथा महा- भारतमें लिया गया होगा। शब्द-सादृश्यसे यहभी प्रकट होता है, कि गीताके छठे अध्यायमें योगाभ्यासके लिये योग्य स्थलका जो यह वर्णन किया गया है – “शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य०” (गीता ६. ११) – वह श्वेताश्वतरोपनिपदके “समे शुचौ” आदि (श्वे. २. १०) मंत्रसे लिया गया है, और “समं कायशिरोग्रीवं” (गीता ६. १३) ये शब्दभी श्वेताश्वतरोपनिपदके “त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम्” (श्वे. २. ८) मंत्रसे लिये हैं। इसी प्रकार “सर्वतः पाणिपादं” श्लोक तथा उसके आगेका श्लोकार्धभी गीता (गीता १३. १३) और श्वेताश्वतरोपनिपदमें शब्दशः मिलते हैं (श्वे. ३. १६); और “अणोरणीयांसं” तथा “आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्” पदभी गीतामें (८. ९) और श्वेताश्वतरोपनिषद् (श्वे. ३ ९. २०) में एकहीसे हैं। इनके अतिरिक्त गीता और उपनिषदोंका शब्द-सादृश्य यह है, कि “सर्वभूतस्थमात्मानम्” (गीता ६. २९) और “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो” (गीता १५. १५) ये दोनों श्लोकार्ध कैवल्योपनिपदमें (कैं. १. १०; २. ३) ज्यों-के-त्यो मिलते हैं। परंतु इस शब्द-सादृश्यके विषयपर अधिक विचार करनेकी कोई आवश्यकता नही। क्योकि इस बातका किसीकोभी संदेह नही है, कि गीताका वेदान्त-विषय उपनिषदोंके आधारपर प्रतिपादित किया गया है। हमें विशेष कर यही देखना है, कि उपनिषदोंके विवेचनमें और गीताके विवेचनमें कुछ अंतर है या नहीं; और यदि है, तो किस वातमें; अतएव अब उसीपर दृष्टि डालनी चाहिये। उपनिषदोंकी संख्या बहुत है। उनमेंसे कुछ उपनिषदोंकी भाषा तो इतनी अर्वाचीन है, कि उनका और पुराने उपनिषदोंका असमकालीन होना सहजही मालूम पड़ जाता है। अतएव गीता और उपनिषदोंमें प्रतिपादित विषयोंके सादृश्य का विचार करते समय, इस प्रकरणमें हमने प्रधानतासे उन्हीं उपनिषदोंको तुलनाके लिये लिया है, जिनका उल्लेख ब्रह्मसूत्रोंमें है। इन उपनिषदोंके अर्थको और गीताके अध्यात्मको जब हम मिलाकर देखते हैं, तब प्रथम यही बोध होता है, कि यद्यपि दोनोंमें निर्गुण परब्रह्मका स्वरूप एक-सा है, तथापि निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्तिका

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