श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवर्णन करते समय, 'अविद्या' शब्दके बदले 'माया' या 'अज्ञान' शब्दहीका उपयोग गीतामें किया गया है। नवें प्रकरणमें इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया गया है, कि 'माया' शब्द श्वेताश्वतरोपनिषदमें आ चुका है; नामरूपात्मक अविद्याके लियेही यह दूसरा पर्याय शब्द है; तथा यहभी ऊपर बतला दिया गया है, कि श्वेताश्वत- रोपनिषद्के कुछ श्लोक गीतामें अक्षरशः पाये जाते हैं। इससे पहला अनुमान यह किया जाता है, कि - "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छां. ३. १४. १) या "सर्वमात्मानं पश्यति" (बृ. ४. ४. २३) अथवा "सर्वभूतेषु चात्मानम्" (ईश. ६) इस सिद्धान्तका अथवा उपनिषदोंके सारे अध्यात्मज्ञानका यद्यपि गीतामें संग्रह किया गया है, तथापि गीता-ग्रंथ तब बना होगा, जब कि नामरूपात्मक अविद्याको उपनिषदोंमेंही 'माया' नाम प्राप्त हो गया होगा। अब यदि इस बातका विचार करें, कि उपनिषदोंके और गीताके उपपादनमें क्या भेद है, तो दीख पड़ेगा, कि गीतामें कापिल-सांख्यशास्त्रको विशेष महत्त्व दिया गया है। बृहदारण्यक या छांदोग्य, दोनों उपनिषद् ज्ञान-प्रधान हैं; परंतु उनमें तो सांख्य-प्रक्रियाका नामभी दीख नहीं पड़ता; और कठ आदि उपनिषदोंमें यद्यपि अव्यक्त, महान् इत्यादि सांख्योंके शब्द आये हैं, तथापि यह स्पष्ट है, कि उनका अर्थ सांख्य-प्रक्रियाके अनुसार न करके वेदान्त-पद्धतिके अनुसार करना चाहिये। मैत्र्युप- निषदके उपपादनकोभी यही न्याय उपयुक्त किया जा सकता है। इस प्रकार सांख्य- प्रक्रियाको बहिष्कृत करनेकी सीमा यहाँतक आ पहुँची है, कि वेदान्त-सूत्रोंमें पंची- करणके बदले छांदोग्य उपनिषदके आधारपर त्रिवृत्करणहीसे सृष्टिके नामरूपात्मक वैचित्र्यकी उत्पत्ति बतलाई गई है (वे. सू. २. ४. २०)। सांख्योंको एकदम अलग करके अध्यायके क्षर-अक्षरका विवेचन करनेकी यह पद्धति गीतामें स्वीकृत नहीं हुई है। तथापि स्मरण रहे, कि गीतामें सांख्योंके सिद्धान्त ज्यों-के-त्यों नहीं ले लिये गये हैं। त्रिगुणात्मक अव्यक्त प्रकृतिमे, गुणोत्कर्षके अनुसार, सारी व्यक्त-सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें सांख्योंके जो सिद्धान्त हैं, वे गीताको ग्राह्य हैं; और उनके इस मतसेभी गीता सहमत है, कि पुरुष निर्गुण हो कर द्रष्टा है। परंतु द्वैत-सांख्यज्ञानपर अद्वैत-वेदान्तका पहले इस प्रकार प्राबल्य स्थापित कर दिया है, कि प्रकृति और पुरुष स्वतंत्र नहीं हैं; वे दोनों उपनिषदमें वर्णित आत्मरूपी एकही परब्रह्मके रूप अर्थात् विभू- तियाँ हैं, और फिर सांख्योंके क्षर-अक्षर-विचारका वर्णन गीतामें किया गया है। उप- निषदोंके ब्रह्मात्मैक्यरूप अद्वैत-मतके साथ स्थापित किया हुआ द्वैती सांख्योंके सृष्ट्यु- त्पत्तिचक्रका यह मेल गीताके समान महाभारतके अन्य स्थानोंमें किये हुए अध्यात्मविवे- चनमेंभी पाया जाता है; और ऊपर जो अनुमान किया गया है, कि गीता और महाभारत, ये दोनों ग्रंथ एकही व्यक्तिके द्वारा रच गये हैं, वह इस मेलसे औरभी दृढ़ हो जाता है। उपनिषदोंकी अपेक्षा गीताके उपपादनमें जो दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता है, वह व्यक्तोपासना अथवा भक्तिमार्ग है। भगवद्गीताके समानही उपनिषदोंमेंभी गी. र. ३४