श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकेवल यज्ञयाग आदि कर्म ज्ञान-दृष्टिसे गौण माने गये हैं ; परंतु व्यक्त मानव-देहधारी ईश्वरकी उपासना प्राचीन उपनिषदोंमें नहीं दीख पड़ती । उपनिषत्कार इस तत्त्वसे सहमत हैं, कि अव्यक्त और निर्गुण परब्रह्मका आकलन होना कठिन है, इसलिये मन, आकाश, सूर्य, अग्नि, यज्ञ आदि सगुण प्रतीकोंकी उपासना करनी चाहिये । परंतु उपासनाके लिये प्राचीन उपनिषदोंमें जिन प्रतीकोंका वर्णन किया गया है, उनमें मनुष्यदेहधारी परमेश्वरके स्वरूपका प्रतीक नहीं बतलाया गया है । मैत्र्युपनिषद् (मै. ३. ७) में कहा है, कि रुद्र, शिव, विष्णु, अच्युत, नारायण, – ये सब परमात्मा- हीके रूप हैं । श्वेताश्वतरोपनिषदमें 'महेश्वर' आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं; और “ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः” (श्वे. ५. १३) अथवा “यस्य देवे परा भक्तिः” (श्वे. ६. २३) आदि वचनभी श्वेताश्वतरमें पाये जाते हैं । परंतु यह निश्चय- पूर्वक नहीं कहा जा सकता, कि इन वचनोंके नारायण, विष्णु आदि शब्दोंसे विष्णुके मानव-देहधारी अवतारही विवक्षित हैं । कारण यह है, कि रुद्र और विष्णु ये दोनों देवता, वैदिक अर्थात् प्राचीन हैं ; तब यह कैसे मान लिया जाय, कि “यज्ञो वै विष्णुः” (तैं. सं. १. ७. ८) इत्यादि प्रकारसे प्राचीन यज्ञयागहीको विष्णुकी उपासनाका जो स्वरूप आगे दिया गया है, वही उपर्युक्त उपनिषदोंका अभिप्राय नहीं होगा ? तथापि यदि कोई कहे, कि मानव-देहधारी अवतारोंकी कल्पना उस समयभी होगी, तो वहभी बिलकुलही असंभव नहीं है । क्योंकि, श्वेताश्वतरोपनिषदमें जो 'भक्ति' शब्द है, उसे यज्ञरूपी उपासनाके विषयमें प्रयुक्त करना ठीक नहीं जँचता । यह बात सच है, कि महानारायण, नृसिंहतापनी, रामतापनी, तथा गोपालतापनी आदि उप- निषदोंके वचन श्वेताश्वतरोपनिषदके वचनोंकी अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्ट हैं, इस- लिये उनके विषयमें उक्त प्रकारकी शंका करनेके लिये कोई स्थानही नहीं रह जाता । परंतु इन उपनिषदोंका काल निश्चित करनेके लिये ठीक ठीक साधन नहीं है, इसलिये इन उपनिषदोंके आधारपर यह प्रश्न ठीक तौरसे हल नहीं किया जा सकता, कि वैदिक धर्ममें मानवदेहधारी विष्णुकी भक्तिका उदय कब हुआ ? तथापि अन्य रीतिसे वैदिक भक्ति-मार्गकी प्राचीनता अच्छी तरह सिद्ध की जा सकती है । पाणिनीका एक सूत्र है 'भक्तिः' – अर्थात् जिसमें भक्ति हो (पा. ४. ३. ९५); इसके आगे “वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्” (पा. ४. ३. ९८) सूत्रमें कहा गया है, कि जिसकी वासुदेवमें भक्ति हो, उसे 'वासुदेवक' और जिसकी अर्जुनमें भक्ति हो, उसे 'अर्जुनक' कहना चाहिये; और पतंजलिके महाभाष्यमें इसपर टीका करते समय कहा गया है, कि इस सूत्रमें 'वासुदेव' क्षत्रियका या भगवान्का नाम है । इन ग्रंथोंमेंसे पातंजलभाष्यके विषयमें डॉक्टर भांडारकरने यह सिद्ध किया है, कि वह ईसाई सनके लगभग ढाई सौ वर्ष पहले बना है; और इसमें तो संदेह नहीं, कि पाणिनीका काल इससेभी अधिक प्राचीन है । इसके सिवा भक्तिका उल्लेख बौद्ध धर्म-ग्रंथोंमेंभी किया गया है, और हमने आगे चलकर विस्तारपूर्वक बतलाया है, कि बौद्ध धर्मके महायान पंथमें भक्तिके