भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 956 में से

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पृष्ठ 576

तत्त्वोंका प्रवेश होनेके लिये श्रीकृष्णका 'भागवत-धर्म' ही कारण हुआ होगा। अतएव यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि कम-से-कम बुद्धके पहले - अर्थात् ईसाई सनके पहले लगभग छः सौसे अधिक वर्ष - हमारे यहाँका 'भक्ति-मार्ग' पूरी तरह स्थापित हो गया था। नारद-पञ्चरात्र या शाण्डिल्य अथवा नारदके भक्ति-सूत्र उसके बादके हैं। परंतु उससे भक्ति-मार्ग अथवा भागवत धर्मकी प्राचीनतामे कुछभी बाधा हो नहीं सकती। गीतारहस्यमें किये गये विवेचनसे ये बातें स्पष्ट विदित हो जाती हैं, कि प्राचीन उपनिषदोंमें जिन सगुणोपासनाओंका वर्णन है, उसीसे क्रमशः हमारा भक्ति-मार्ग निकला है; पातजलयोगमें चित्तको स्थिर करनेके लिये किसी-न-किसी व्यक्त और प्रत्यक्ष वस्तुको दृष्टिके सामने रखना पड़ता है, इसलिये उससे भक्ति-मार्गकी ओरभी पुष्टि हो गई है; भक्ति-मार्ग किसी अन्य स्थानसे हिंदुस्थानमें नहीं लाया गया है और न उसे कहींसे लानेकी आवश्यकताभी थी। हिंदुस्थानहीमे इस प्रकारसे प्रादुर्भूत भक्ति-मार्गका और विशेषतः वासुदेव-भक्तिका उपनिषदोंमें वर्णित वेदान्तकी दृष्टिसे मंडन करनाही गीताके प्रतिपादनका एक विशेष भाग है। परंतु गीताका इससेभी अधिक महत्त्वपूर्ण भाग, कर्मयोगके साथ भक्ति और ब्रह्मज्ञानका मेल कर देनाही है। चातुर्वर्ण्यके अथवा श्रौतयज्ञयाग आदि कर्मोंको यद्यपि उपनिषदोंने गौण माना है, तथापि कुछ उपनिषत्कारोंका कथन है, कि उन्हें चित्त-शुद्धिके लिये तो करनाही चाहिये, और चित्त-शुद्धि होनेपरभी उन्हें छोड़ देना उचित नहीं। इतना होनेपरभी कहना चाहिये कि अधिकांश उपनिषदोंका झुकाव सामान्यतः कर्मसंन्यासकी ओरही है। ईशावास्योपनिषदके समान कुछ अन्य उपनिषदोंमेंभी "कुर्वन्नेवेह कर्माणि" जैसे आमरण कर्म करते रहनेके विषयमें वचन पाये जाते हैं; परंतु अध्यात्मज्ञान और सांसारिक कर्मोंके बीचका विरोध मिटाकर प्राचीन कालसे प्रचलित उस कर्मयोगका समर्थन जैसा गीतामें किया गया है, वैसा किसीभी अन्य उपनिषदमें नहीं पाया जाता। अथवा यहभी कहा जा सकता है, कि इसी विषयमें गीताका सिद्धान्त अधिकांश उपनिषत्कारोंके सिद्धान्तोंसे भिन्न है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें इस विषयका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है, इसलिये उसके बारेमें यहाँ अधिक लिखनेकी आवश्यकता नहीं। गीताके छठ्ठे अध्यायमें जिस योग-साधनका निर्देश किया गया है, उसका विस्तृत और ठीक ठीक विवेचन पातञ्जल-योग-सूत्रोंमें पाया जाता है, और इस समय ये सूत्रही इस विषयके प्रमाणभूत ग्रंथ समझे जाते हैं। इन सूत्रोंके चार अध्याय हैं। पहले अध्यायके आरंभमें ही योगकी व्याख्या इस प्रकार की गई है, कि "योगश्चित्त- वृत्तिनिरोधः"; और यह बतलाया गया है, कि "अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः"- यह निरोध अभ्यास तथा वैराग्यसे किया जा सकता है। आगे चलकर यमनियम- आसन-प्राणायाम आदि योगसाधनोंका वर्णन करके तीसरे और चौथे अध्यायोंमें इस बातका निरूपण किया है, कि संप्रज्ञात अर्थात् निर्विकल्प समाधिसे अणिमा-

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